खर्चीले होते चुनाव और सिद्धारमैया जी का सच
बकोल राजनीति में पद पर रहते हुए सच बोलने और उसे स्वीकार करने का साहस अब विरल होता जा रहा है। सत्ता में रहते हुए सच बोलने की कीमत कई बार पद गंवाकर या अपनी ही पार्टी में राजनीतिक एकांतवास झेलकर चुकानी पड़ती है। ऐसे समय में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिद्धारमैया जी का चुनावों के लगातार महंगे होते जाने पर चिंता जताना निश्चित रूप से गंभीर आत्ममंथन का विषय है। सिद्धारमैया जी ने अपने पुराने राजनीतिक दिनों को याद करते हुए कहा कि पहले लोग अपने प्रत्याशी को चुनाव जिताने के लिए चंदा एकत्र करते थे, जबकि आज स्थिति उलट हो गई है। अब कई जगह प्रत्याशी को चुनाव लड़ने के लिए ही करोड़ों रुपये की जरूरत महसूस होती है। यह बदलाव केवल चुनावी खर्च बढ़ने की कहानी नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में आम आदमी की राजनीतिक भागीदारी के सिकुड़ते दायरे का संकेत भी है।
देश ने वह दौर भी देखा है जब चुनाव कुछ हजार रुपये में लड़े और जीते जाते थे। प्रत्याशी बिना काफिले के गांव के ओटले पर बैठकर लोगों से संवाद करता था। न बड़े मंच की जरूरत थी, न टेंट की, न भीड़ जुटाने की और न ही सोशल मीडिया पर स्वयं का महिमामंडन करने की। उम्मीदवार की पहचान उसके व्यवहार, व्यक्तित्व, त्याग, समर्पण और वर्षों की जनसेवा से होती थी। जनता उम्मीदवार को जानती थी और उम्मीदवार जनता को। आज तस्वीर बदल गई है। महंगी गाड़ियों के काफिले, सुरक्षा का दिखावा, बड़े-बड़े मंच, भीड़ जुटाने की होड़ और सोशल मीडिया पर प्रचार ने चुनावों को लगातार खर्चीला बना दिया है। आम नागरिक के घर के ओटले पर बैठकर उसके सुख-दुख जानने की राजनीति पीछे छूटती जा रही है और कैमरों के सामने दिखाई देने वाली राजनीति आगे आ रही है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि राजनीति में प्रवेश का रास्ता आम मध्यमवर्गीय, गरीब और प्रतिभाशाली युवाओं के लिए कठिन होता जा रहा है। जिसके पास धन और संसाधन नहीं, उसके लिए जनसेवा की लंबी यात्रा तय करने के बावजूद चुनावी मैदान में उतरना मुश्किल हो जाता है। लोकतंत्र में यह स्थिति निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
हालांकि देश की राजनीति में आज भी ऐसे राजनेता मौजूद हैं, जो धनबल नहीं बल्कि अपने नाम, काम और जनविश्वास के बूते चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं। देश ने ऐसे नेताओं को भी देखा है जिन्होंने दशकों तक सत्ता के बड़े पद संभाले, लेकिन उनका जीवन आम नागरिक जैसा ही रहा। उनकी सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास था, करोड़ों रुपये का चुनावी खर्च नहीं। इसलिए सिद्धारमैया जी की बात को केवल एक वरिष्ठ नेता की पुरानी याद समझकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। राजनीतिक दलों को इस पर गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर चुनाव इतने महंगे क्यों होते जा रहे हैं? यदि राजनीति वास्तव में जनसेवा का माध्यम है तो उसमें प्रवेश की पहली शर्त आर्थिक सामर्थ्य क्यों बनती जा रही है?
राजनीति मूलतः जनसेवा और राष्ट्र सेवा का क्षेत्र है। प्रत्येक नागरिक को अपने समाज और देश की बेहतरी के लिए इसमें योगदान देने का अवसर मिलना चाहिए। इसलिए यदि राजनीति में धनबल और बाहुबल के प्रभाव को कम किया जाए और उम्मीदवार की लोकप्रियता, स्वच्छ छवि, जनसेवा तथा जनता से उसके सीधे जुड़ाव को महत्व दिया जाए, तो निश्चित रूप से भारतीय राजनीति अपने उस पुराने दौर की सादगी और जनविश्वास की ओर लौट सकती है, जहां चुनाव जीतने के लिए धन से ज्यादा जनता का विश्वास जरूरी हुआ करता था। चुनावों को सस्ता करना केवल चुनाव आयोग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों और नेताओं की सामूहिक राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रश्न है। यदि दल सचमुच लोकतंत्र को आम नागरिक तक पहुंचाना चाहते हैं तो उन्हें दिखावे, अनावश्यक खर्च और धनबल की राजनीति पर स्वयं अंकुश लगाना होगा। लोकतंत्र की ताकत बड़े पंडालों, महंगी गाड़ियों और विशाल काफिलों में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में होती है। राजनीति को फिर उसी विश्वास तक लौटना होगा जहां उम्मीदवार की सबसे बड़ी ताकत उसका धन नहीं, उसका चरित्र और जनसेवा हो।