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उत्तराखंड का रहस्यमयी मंदिर, जहां शिव-पार्वती ने लिए थे सात फेरे

उत्तराखंड का रहस्यमयी मंदिर, जहां शिव-पार्वती ने लिए थे सात फेरे

सावन का पावन महीना चल रहा है। इस महीने में भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। महादेव से जुड़े कई फेमस स्थान हैं। ऐसे में हम आज आपको भगवान शिव के उस स्थान के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां पर मां पार्वती औऱ भगवान शिव की शादी हुई थी। मान्यता के अनुसार, मां पार्वती ने कई सालों तक भगवान शिव से विवाह करने के लिए कठिन तपस्या की थी। मां पार्वती द्वारा कठिन तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने उनसे विवाह किया था। बताया जाता है कि उत्तराखंड के त्रियुगीनारायण मंदिर में महादेव और पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको त्रियुगीनारायण मंदिर के इतिहास और यह कहां स्थित है इसके बारे में बताने जा रहे हैं।


त्रियुगीनारायण मंदिर
त्रियुगीनारायण मंदिर या स्थानीय रूप से 'त्रिजुगीनारायण' के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में स्थित है। त्रिजुगीनारायण मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यह मंदिर हरे-भरे और सुरम्य वातावरण से घिरा हुआ है। इस स्थान पर गढ़वाल क्षेत्र के बर्फ से ढके पहाड़ हैं, यह मंदिर केदारनाथ की तरह दिखता है। जोकि भगवान शिव का फेमस और महत्वपूर्ण मंदिर है। बता दें कि त्रियुगीनारायण मंदिर को 'अखंड धूनी' भी कहा जाता है। इस मंदिर में वह पवित्र अग्नि आज भी जल रही है, जो भगवान शिव और मां पार्वती के विवाह का गवाह है।


यहां लिए थे फेरे
मान्यताओं के अनुसार, त्रियुगीनारायण मंदिर में भोलेनाथ और मां पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ था। कहा जाता है कि महादेव को उनकी भक्ति के प्रति आश्वस्त करने के लिए मां पार्वती ने कई वर्षों तक कठोर तप किया था। मां पार्वती की अटूट भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने इसी मंदिर में उनसे विवाह किया। बताया जाता है कि इस मंदिर में आज भी वह पवित्र अग्नि जल रही है, जो महादेव और मां पार्वती के फेरों के समय जलाई गई थी।


भगवान विष्णु ने निभाई थी अहम भूमिका
शिव और पार्वती के मिलन में भगवना श्रीहरि विष्णु ने अहम भूमिका निभाई थी। मान्यता है कि विवाह से पहले मां पार्वती के पिता हिमालय ने अपनी पुत्री की भलाई के बारे में चिंता व्यक्त की थी। जिसके बाद उनको आश्वस्त करने के लिए भगवान श्रीहरि ने मां पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी और वह भी मां पार्वती के साथ त्रिगुणीनारायण गए। इसके बाद भगवान विष्णु ने वह सारे अनुष्ठान किए, जो एक भाई को करना चाहिए।

कुंड को लेकर मान्यताएं
त्रियुगीनारायण मंदिर में एक ऐसा कुंड है, जिसको ब्रह्म कुंड कहा जाता है। एक पौराणिक कथा के मुताबिक भगवान ब्रह्म देव ने भगवान शिव और माता पार्वती ने दिव्य जोड़े पर आशीर्वाद की वर्षा करते हुए, पवित्र कुंड के समारोह की अध्यक्षता की। भगवान ब्रह्म की उपस्थिति ने इनके मिलन को पवित्र कर दिया, जिसके कारण यह एक शाश्वत बंधन बन गया। भगवान ब्रह्मा ने विवाह से पहले मंदिर के अंदर बने ब्रह्म कुंड में स्नान किया था। इस मंदिर के परिसर के अंदर 3 जल कुंड हैं, जिनको विष्णु कुंड, रुद्र कुंड और ब्रह्मा कुंड के नाम से जाना जाता है।


कुंड में किया जाता है स्नान
हिन्दु समाज में त्रियुगीनारायण मंदिर को काफी फेमस है। जो युवा शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं, वह एक बार इस कुंड में आकर स्नान करते हैं। बहुत सारे लोगों का मानना है कि जब लोग त्रियुगीनारायण मंदिर में शादी करते हैं। तो समारोह में जाने से पहले उनको तीन कुंडों में स्नान करना पड़ता है। इस मंदिर के पास 'ब्रह्म शिला' नामक एक अनोखा पत्थर है, जिसके बारे में बताया जाता है कि यह वही स्थान है, जहां पर भगवान ब्रह्म देव ने विवाह अनुष्ठान किया था।

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