7.8% GDP ग्रोथ पर घमासान, पक्ष-विपक्ष आमने-सामने
नई दिल्ली। भारतीय अर्थव्यवस्था की हालिया 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। सरकार जहां इस आंकड़े को आर्थिक प्रगति की तस्वीर के तौर पर देख रही है, वहीं विपक्षी नेताओं ने इसकी विश्वसनीयता और आम लोगों पर पड़ने वाले असर को लेकर सवाल उठाए हैं।
राजद सांसद मनोज झा ने जीडीपी वृद्धि के आंकड़े पर सरकार के दावे पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को आर्थिक वृद्धि की बात समाज के निम्न और गरीब वर्ग के बीच जाकर करनी चाहिए, तभी इसकी वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।
मनोज झा ने संविधान के अनुच्छेद 39 का हवाला देते हुए कहा कि आर्थिक नीतियों और व्यवस्थाओं का मूल्यांकन समाज के व्यापक हित को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि जीडीपी के आंकड़ों को इसी नजरिए से देखा जाए तो आर्थिक विकास के दावे की अलग तस्वीर सामने आ सकती है।
वहीं, सीपीआई(एम) के महासचिव एम.ए. बेबी ने जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों की गणना और प्रस्तुति पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि पूर्व वित्त सचिव और कई अर्थशास्त्रियों ने भी इन आंकड़ों को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
बेबी ने अर्थशास्त्री रघुराम राजन का भी उल्लेख करते हुए कहा कि आंकड़ों के साथ किस तरह काम किया जाता है, यह बेहद महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक, केवल आंकड़ों के आधार पर बड़ी आर्थिक वृद्धि दिखाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि उन आंकड़ों की वास्तविकता क्या है।
उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरह से जीडीपी में जबरदस्त बढ़ोतरी दिखाई जा रही है, उसके पीछे आंकड़ों के इस्तेमाल का तरीका महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, बेबी ने अपने आरोपों के समर्थन में इस बातचीत के दौरान कोई विस्तृत आंकड़ा पेश नहीं किया।
सीपीआई(एम) नेता ने कहा कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और जानकारी सामने आ सकती है। उन्होंने बताया कि पार्टी की पोलित ब्यूरो बैठक में भी जीडीपी के आंकड़ों पर चर्चा होगी और बैठक के बाद जारी होने वाले बयान में पार्टी अपना विस्तृत रुख स्पष्ट करेगी।
दूसरी ओर, बिहार सरकार में मंत्री श्रवण कुमार ने विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए राज्य के विकास का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि बिहार की स्थिति को समझने के लिए 2005 से पहले और उसके बाद के दौर की तुलना की जानी चाहिए।
श्रवण कुमार के अनुसार, 2005 से पहले बिहार के गांवों में सड़क, स्कूल, बिजली, पानी और अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी थी। उनका दावा है कि समय के साथ इन क्षेत्रों में विकास हुआ है और आज राज्य के ग्रामीण इलाकों में भी कई सुविधाएं उपलब्ध हैं।
उन्होंने कहा कि जब विकास होता है तो सवाल उठना स्वाभाविक है, लेकिन किसी भी आंकड़े या विकास के दावे को समझने के लिए उसके व्यापक प्रभाव को देखना चाहिए। उन्होंने बिहार के गांवों में हुए बदलाव को राज्य में विकास की गति से जोड़कर पेश किया।
इस तरह 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ का आंकड़ा अब आर्थिक बहस के साथ राजनीतिक मुद्दा भी बनता नजर आ रहा है। जहां सरकार और उसके समर्थक इसे विकास की रफ्तार से जोड़ रहे हैं, वहीं विपक्ष आंकड़ों की विश्वसनीयता और आम लोगों तक विकास के लाभ पहुंचने पर सवाल उठा रहा है।