श्रद्धा और विवेक से क्रिया करनी चाहिए- साध्वीजी श्री विशुद्ध प्रज्ञा
फलोदी . शहर के आराधना भवन में चल रहे चातुर्मास प्रवचन में पूज्य स्वाध्वी जी ने बताया कि मनुष्य जन्म अनमोल है ,इसमें हम जितना चाहें धर्म ध्यान दान पुण्य कर सकते हैं। जैन समाज के आराधना भवन महावीर स्वामी जी मंदिर के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के दौरान साध्वीजी विशुद्ध प्रज्ञा जी म.सा. साध्वीजी उर्विता जी म. सा और साध्वी जी रूविता जी म. सा. ने प्रवचन के दौरान आज बताया कि हमारे पूर्वजन्म में किये गये अच्छे पुण्य के प्रभाव से हमें इस भव में मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है। इसलिए हमें इस मनुष्य जन्म में जितना हो सके धर्म ध्यान दान पुण्य तप व जप करना चाहिए क्योंकि मनुष्य जन्म ही एक ऐसा सुअवसर है ,जिसमें हम यह सब अपने विवेक से कर सकते हैं। तिर्यन्च गति और नरक गति के जीव भी अब ध्यान धर्म करना चाहते हैं लेकिन वे नहीं कर पाते क्योंकि उनमें विवेक की कमी होती हैं। हमें स्वाध्याय करके अपनी आत्मा के कल्याण के पथ की और अग्रसर होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने श्रावक जीवन के 36 कर्तव्य बताइए जिसमें उन्होंने बताया कि श्रावक शब्द तीन अक्षर से बना है श्र- श्रद्धा व- विवेक क-क्रिया से। हमें श्रद्धा और विवेक से क्रिया करनी चाहिए। धर्म स्थान पवित्र जगह होती है इसलिए धर्म स्थान में हमेशा सभ्य परिधान में हमें आना चाहिए। उन्होंने भवदेव के बारे में बताया कि प्रवचन श्रवन से उसमें वैराग्य की भावना उत्पन्न हुई और उन्होने संयम मार्ग अपनाया।