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महाराष्ट्र के बाद अब बिहार में भी कुछ बड़ा होने वाला है !

महाराष्ट्र के बाद अब बिहार में भी कुछ बड़ा होने वाला है !

महाराष्ट्र में हुई राजनीतिक उथल - पुथल के बाद के बाद लगता है कि बिहार में भी कुछ बड़ा होने वाला है क्योकि जॉब के लिए जमीन घोटाले मामले में सीबीआई ने बिहार के डिप्टी मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव समेत कई अन्य के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी हैं । दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करने के बाद एक बार फिर से बिहार में सियासी हलचल तेज हो गई है। साल 2017 में भी जब सीबीआई ने आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और तत्कालीन डिप्टी मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव समेत 11 लोगों को आरोपी बनाया गया था। उस वक्त भी तेजी से राजनीतिक परिस्थितियां बदली थी। एक बार फिर राजनीतिक हलचल बढ़ गई है।

लोगों को फिर छह साल पहले की ऐसी ही घटना याद आने आने लगी है। उस समय भी सीबीआई ने आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और तत्कालीन डिप्टी मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव समेत 11 लोगों को आरोपी बनाया गया था। जिसके बाद परिस्थितियां इतनी तेजी से बदली कि नीतीश कुमार ने न सिर्फ तेजस्वी को इस्तीफा देने के लिए कहा, बल्कि बाद में राजद के साथ गठबंधन भी तोड़ दिया और भाजपा के साथ फिर से सरकार बना लिया।

अब एक बार फिर बिहार में वही स्थिति है,जॉब के लिए जमीन घोटाले में तेजस्वी यादव के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी गई है, तो लालू परिवार पर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है। जिसके बाद राजनीतिक विश्लेषक यह अनुमान लगाने में व्यस्त हैं कि वर्ष 2017 की तरह मुख्यमंत्री नीतीश फिर से तेजस्वी यादव को कोई सलाह देंगे, या फिर इस बार वे चुप्पी साधे रखेंगे।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक ऐसे राजनेता माने जाते हैं, जो करप्शन के खिलाफ कार्रवाई करने से नहीं चुकते हैं। फिर चाहे वह अधिकारियों के खिलाफ हो, या अपने मंत्रियों के विरुद्ध।यही कारण है कि वर्ष 2017 में जब सीबीआई ने रेलवे होटल टेंडर मामले में तेजस्वी यादव समेत 11 लोगों को आरोपी बनाया था। तो उन्होंने तेजस्वी यादव से जवाब मांगा था। नीतीश कुमार का तब भी यह कहना था कि सारी बातें जनता के डोमेन में आनी चाहिए। लेकिन जब तजस्वी यादव सभी सवालों का जवाब बिन्दुवार देने में असमर्थ रहे, तो नीतीश कुमार ने महागठबंधन की सरकार से नाता तोड़ कर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। 

बिहार में सीबीआई और ईडी की सक्रियता अचानक बढ़ गई थी । इसे लेकर खुद तेजस्वी यादव ने भी सार्वजनिक तौर पर कहा था कि पुराने मामले में उनके खिलाफ आरोप पत्र भी दाखिल हो सकता है। अब राजनीतिक विश्लेषकों की ओर से यह आशंका जताई जा रही है कि कहीं भाजपा की यह सुनियोजित योजना  तो नहीं है।

हाल ही में हुई राजभवन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा सांसद सुशील मोदी के बीच हुई मुलाकात को भी राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी अहम माना जा रहा है। हालांकि सुशील मोदी ने बाद में इसे अचानक हुई मुलाकात करार दिया। वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मुलाकात पर कुछ नहीं कहा, लेकिन राजभवन की ओर से इसे शिष्टाचार भेंट करार दिया गया। अब जब जिस तरह से तेजी से राजनीतिक घटनाक्रम में बदलाव हो रहा है, उसे देखते हुए आने वाले कुछ दिनों में बड़े राजनीतिक परिवर्तन की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।वहीं राजभवन से लौटने के दो दिन बाद ही नीतीश कुमार ने अपने सभी विधायकों और सांसदों को घर पर मिलने के लिए बुलाया। बताया गया कि वह सभी से चुनाव को लेकर फीडबैक ले रहे थे। लेकिन तेजस्वी पर चार्जशीट दायर होने के बाद अब इस मुलाकात के मायने भी सामने आ गए हैं।

बताया जाता है कि लालू परिवार पर चार्ज शीट दाखिल होना भाजपा के लिए बिल्ली के भागे छिका टूटने वाली कहावत को चरितार्थ कराती है । जातिगत समीकरणों में उलझी बिहार की राजनीति में भाजपा को अकेले दम पर कुछ नहीं कर पाएगी इस हकीकत से पार्टी के नेता पूरी तरह परिचित हैं। लेकिन भाजपा यहां आसानी वॉक ओवर दे देगी यह भी मानना बड़ी भूल है। भाजपा ने पूरा ध्यान हिंदी पट्टी के इस बड़े राज्य पर केंद्रित कर दिया है क्योंकि इस राज्य में लोकसभा की 40 सीटें हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा और नीतीश कुमार की पार्टी ने मिलकर 39 सीटें जीत ली थीं। लेकिन अब नीतीश कुमार आरजेडी के साथ हैं। आरजेडी और जेडीयू कुल वोट बैंक भाजपा से बहुत ज्यादा है।

एक तरफ लालू यादव के परिवार पर चार्जशीट दाखिल होने की हलचल के बीच दूसरी तरफ  गृह मंत्री अमित शाह लगातार बिहार की रैली कर रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले ही वो चंपारण के चनपटिया गए थे और उसके बाद लखीसराय गए।  शाह का दौरा पिछले हफ्ते पटना में 15 विपक्षी दलों के 32 नेताओं की बैठक के बाद हुआ। 

शाह की रैली में बिहार भाजपा अध्यक्ष सम्राट चौधरी और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह सहित राज्य में पार्टी के सभी शीर्ष नेता मौजूद थे। लखीसराय मुंगेर लोकसभा क्षेत्र के अंदर आता है जिसका प्रतिनिधित्व जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह करते हैं। 

 सभी दौरों में अमित शाह ने नीतीश कुमार पर जमकर हमला करते  रहे। ऐसे में ये सवाल उठने लगा है कि कहीं भाजपा की नजर नीतीश कुमार पर तो नहीं है या फिर महाराष्ट्र की तरह बिहार में भी बिसात बिछाए जाने की तैयारी है। दरअसल विपक्षी एकता के लिए कवायद नीतीश कुमार के साथ ही शरद पवार भी कर रहे थे। भाजपा ने महाराष्ट्र में एनसीपी को तगड़ा झटका दे दिया है। इस घटनाक्रम के बाद शरद पवार कमजोर हो गए हैं लेकिन अभी नीतीश कुमार की ओर से चुनौती बरकरार है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 29 जून को लखीसराय दौरे पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए उन्हें 'पलटू बाबू' करार दिया, उन्होंने कहा कि नीतीश लालू प्रसाद की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। शाह ने नीतीश कुमार के बारे में कहा, 'पलटू बाबू नीतीश कुमार पूछ रहे थे कि नौ साल में (केंद्र द्वारा) क्या किया गया। कम से कम उन लोगों के लिए कुछ सम्मान रखें जिनके साथ आप बैठे और जिनकी वजह से आप मुख्यमंत्री बने। नीतीश के बारे में अमित शाह के इस बयान के बाद ये कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या भाजपा की नजर नीतीश कुमार पर है।

बताया  जाता है कि ये तो साफ है कि बिहार पर गृह मंत्री अमित शाह खास ध्यान दे रहे हैं। अमित शाह के तेवर से ये साफ हो गया है कि पार्टी 2024 लोकसभा के चुनाव की तैयारी कर रही है। अमित शाह ने जिस तरह विपक्ष पर निशाना साधा वो ये साफ बता रहा था कि महाविपक्ष के जुटान को भाजपा गंभीरता से ले रही है। हो सकता है कि भाजपा बिहार में भी जेडीयू को भी तोड़ दे।केन्द्रीय गृह मंत्री ने 27 मिनट के अपने भाषण में 8 बार नीतीश कुमार का नाम लिया। ये इस बात की तरफ इशारा है कि भाजपा नीतीश पर ध्यान दे रही है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भाजपा नीतीश को भाजपा में लाना चाहेगी, इससे पार्टी को नुकसान के सिवाए नफा नहीं होगा। वो नीतीश की पार्टी को तोड़ना चाह रही है, भाजपा का मकसद नीतीश की पार्टी को तोड़ कर विपक्षी एकता को कमजोर करना है। 

कुछ जानकारों ने बताया कि भाजपा ने राजनीति के लिए कुछ मॉडल बनाए हैं, जिसमें से एक हिंदू राष्ट्र बनाना है। भाजपा लोकसभा 2024 से पहले इसी का इस्तेमाल कर रही है। समान नागरिक संहिता इसी का एक उदाहरण है। जिन राज्यों में इस कानून की मुखालफत की जा रही है भाजपा पहले इन्हीं राज्यों को टारगेट कर रही है। भाजपा एनसीपी के मॉडल को नष्ट करने के लिए पूरी कोशिश कर रही है। इसी तरह जेडीयू भी भाजपा के निशाने पर है। लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा बिहार में नीतीश को अप्रसांगिक बनाना चाहती है।

बिहार पर खास ध्यान इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि यूपी और बिहार हिंदी पट्टी के दो ऐसे राज्य हैं जहां पर सबसे ज्यादा सीटें हैं। भाजपा को ये लगता है कि यूपी में भाजपा पूरी तरह से कामयाब है, लेकिन बिहार में वो खुद को हारा हुआ महसूस कर रही है, और जीतने के लिए सबसे पहले नीतीश को तोड़ना जरूरी है। बताया जाता है  कि विपक्षी एकता की कवायद के बीच बिहार में अब तक जेडीयू में टूट होती रही है। करीब दर्जन भर नेता जेडीयू छोड़ कर जा चुके हैं।  इस बीच विपक्षी एकता को सबसे बड़ा झटका महाराष्ट्र में लगा है। भाजपा पूरी कोशिश कर रही है कि जेडीयू से और लोग भी नीतीश का साथ छोड़ दें। 

 पिछले करीब 20 साल में ज्यादातर समय तक बिहार में जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन का शासन रहा है। बिहार एकमात्र हिन्दी भाषी राज्य है, जहां भाजपा कभी अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई। भाजपा जब भी सरकार में रही है, नीतीश कुमार के पीछे खड़ी रही है। चुनावों से पहले भाजपा लगातार आम लोगों से संपर्क और समर्थन हासिल करने में जुटी है। भाजपा चुनावों के प्रयोगशाला है वो हर दिन चुनाव की ही तैयारी करती है।

ऐसे में अब बिहार में जिस तरह से विपक्ष को साथ लाने की कवायद शुरू की गई जवाब में भाजपा भी नए-नए पैंतरे आजमा रही है। भाजपा ने बिहार में शुरू से ही अपने पुराने नेताओं को तरजीह नहीं दी । हमेशा नीतीश की ‘बी’ टीम बनी रही। अब लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह नीतीश विपक्ष को साथ ला रहे थे  वो कहीं न कहीं भाजपा को परेशान करती रही   हैं और वो नीतीश की पार्टी को अपना निशाना बनाने की कवायद शुरू कर चुकी  है।

बिहार के मौजूदा राजनीतिक हालात साल 2015 में हुए विधानसभा चुनावों की तरह है। साल 2015 में महागठबंधन ने एकजुट होकर चुनाव लड़ा था और भाजपा को बिहार में 53 सीटें ही मिल पाई थी। इन चुनावों में आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस ने ही 243 में से 178 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। भाजपा बिहार में महागठबंधन की ताकत से डर रही थी । इन सब हालातों के बीच स्पष्ट है कि बिहार की राजनीति में जल्द ही कुछ परिवर्तन होगा ।

 अशोक भाटिया,

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