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चीन मुद्दे पर अमेरिका का रुख साफ, दबाव की नीति से इनकार

चीन मुद्दे पर अमेरिका का रुख साफ, दबाव की नीति से इनकार

वॉशिंगटन। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अपने साझेदार देशों से वैचारिक निष्ठा की कोई शर्त नहीं रखेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका दुनिया के हर देश से यह अपेक्षा करता है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे। साथ ही, अमेरिका किसी भी देश से यह नहीं कह रहा है कि वह चीन सहित किसी अन्य देश से खुद को अलग-थलग कर ले। मार्को रुबियो ने ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति को निर्देशात्मक के बजाय व्यावहारिक बताया, जबकि अमेरिका बीजिंग के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में भी बना हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति के नेतृत्व का उल्लेख करते हुए रुबियो ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप के तहत हमारी अपेक्षा है कि दुनिया का हर देश अपने राष्ट्रीय हित में काम करेगा।” बुडापेस्ट में हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता में उन्होंने संवाददाताओं से कहा, “हम दुनिया के किसी भी देश से यह नहीं कह रहे हैं कि वह खुद को किसी से अलग-थलग कर ले।”
मार्को रुबियो ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए अमेरिका और चीन के रिश्तों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, यह पागलपन होगा बल्कि पूरी तरह से अव्यवहारिक होगा, अगर अमेरिका और चीन के बीच संबंध और संवाद न हों।” उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अप्रैल में चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं।
मार्को रुबियो का ये बयान उस समय आया, आईं जब बुडापेस्ट के दौरे पर थे, जहां अमेरिका और हंगरी ने हंगरी के असैन्य परमाणु कार्यक्रम में सहयोग को सुगम बनाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। रुबियो ने अपने इस दौरे पर चीन के साथ आर्थिक या राजनीतिक संबंध बनाए रखने वाले सहयोगियों और साझेदारों के प्रति अमेरिका के बदलते नजरिए का संकेत दिया।
नाटो और यूरोपीय यूनियन के सदस्य हंगरी ने हाल के सालों में चीनी निवेश को बढ़ाया है और रूसी ऊर्जा खरीदने के लिए छूट बनाए रखी। ऐसे में रूपियो से पूछा गया कि आखिर अमेरिका बुडापेस्ट के बीजिंग के साथ अपने जुड़ाव को कम करने पर गहरे सहयोग की शर्त क्यों नहीं लगा रहा है? इस पर अमेरिकी नेता ने कहा, "हम समझते हैं कि दुनिया के हर देश को अपनी भौगोलिक, अपनी आर्थिक, अपने इतिहास और अपने भविष्य की चुनौतियों की सच्चाई से निपटना पड़ता है।"
अमेरिकी विदेश सचिव ने कहा, "यह दुनिया के लिए अच्छा नहीं है। यह किसी के लिए भी अच्छा नहीं है। किसी भी चीज के लिए 90 फीसदी किसी एक देश या एक अर्थव्यवस्था पर निर्भर रहना, खासकर जरूरी सप्लाई चेन जैसी चीजों के लिए, ज्यादा निर्भरता जियोपॉलिटिकल अच्छाई के बजाय एक कमजोरी है।"
रुबियो ने बार-बार राष्ट्रपति ट्रंप और ओर्बन के बीच बहुत करीबी व्यक्तिगत संबंध की ओर इशारा किया, जो एनर्जी से जुड़े छूट समेत दोनों देशों के फैसलों के पीछे एक बड़ी वजह थी। यह हमारे दोनों देशों के बीच के संबंध के लिए बहुत फायदेमंद रहा है।”
ओर्बन ने अमेरिकी विदेश सचिव का गर्मजोशी से स्वागत किया और मौजूदा समय को अमेरिका-हंगरी के संबंध में गोल्डन समय बताया। ओर्बन ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद दिया।
चीन के अलावा, दोनों नेताओं ने यूक्रेन में युद्ध पर भी बात की। रुबियो ने कहा कि वॉशिंगटन का मकसद सीधा था। अमेरिका का हित युद्ध को खत्म होते देखना है और हम इसे खत्म करने के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं, करना चाहते हैं।
उन्होंने तर्क दिया कि अमेरिका दोनों पक्षों को बातचीत की टेबल पर लाने के लिए खास स्थिति में है और हाल ही में सैन्य अधिकारियों के बीच तकनीकी-स्तर की बातचीत फिर से शुरू हो गई है। उन्होंने कहा, “हम किसी पर कोई समझौता थोपना नहीं चाहते हैं। हम बस उनकी मदद करना चाहते हैं।”
आज जिनेवा में ईरान और अमेरिका के बीच दूसरे दौरे की बैठक होने वाली है। ईरान के साथ अमेरिका की बातचीत को रुबियो ने चुनौतीपूर्ण बताया, लेकिन कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप हमेशा शांतिपूर्ण नतीजों को प्राथमिकता देते हैं।

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