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पशुधन को सर्दी से बचाव के लिए पशुपालन विभाग ने जारी की एडवाइजरी

पशुधन को सर्दी से बचाव के लिए पशुपालन विभाग ने जारी की एडवाइजरी

  • पशुधन को सर्दी से बचाने के पुख्ता इंतजाम करें
  • शीत ऋतु से पूर्व किए जाने वाले टीकाकरण को करने के निर्देश

बालोतरा। राजस्थान सरकार के आपदा प्रबन्धन एवं सहायता विभाग के निर्देशानुसार राज्य में पाला व शीतलहर की स्थिति की सभावना के मद्देनजर पशुधन के सुरक्षात्मक उपाय हेतु उचित प्रबंधन किया जाना आवश्यक है। पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. विजयमोहन खत्री ने बताया कि जिले में में धीरे-धीरे सर्दी बढने से वर्तमान में दिन व रात्रि के तापक्रम में आ रहे परिवर्तन (Fluctuation) से पशुओं के स्वास्थ्य एवं उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव रहना तथा पशु रोगों की प्रायिकता में वृद्धि होना संभावित है। पशु स्वास्थ्य संरक्षण के दृष्टिगत रोगों की रोकथाम व अन्य सुरक्षात्मक उपाय हेतु उचित प्रबंधन के लिये निम्नानुसार निर्देश प्रसारित किये जाते है-

1. शीत ऋतु में होने वाले रोगों से पशुधन वो बचाव हेतु विभागीय अधिकारी/कर्मचारी तत्पर सक्रिय एवं संवेदी रहे विभिन्न स्त्रोतों से उग्रराप्त पशुरोग संबंधित सूचनाओं पर त्वरित रोग नियत्रण एवं रोग निदान कार्य सम्पन्न कराये। मोबाइल चिकित्सा दलों का समुचित उपयोग करते हुवे रोग निदान एवं नियंत्रण में लगने वाले समय को न्यूनतम किया जाए।

2. सम्भावित पशु रोगों की रोकथाम एवं उपचार हेतु उसवश्यक टीकों एवं औषधियों की पशु चिकित्सा संरथाओं में उपलब्धता सुनिश्चित की जायें तथा आपातकालीन स्थिति के लिये इनकी र्याप्त मात्रा जिला स्तर पर आरक्षित रखी जाये।

3. सर्दी के मौसम में गलघोंटू (HS) ,पी.पी.आर. (PPR) भेड माता (Sheep Pox) एफ.एम. डी. (FMD) मिश्रित संक्रमण (Mixed infection) इत्यादि रोगों की संभावना अधिक रहती है। अतः सन्क्रामक रोगों की रोकथाम हेतु एन्डेमिक चार्ट अनुसार आवश्यक टीकाकरण समयबद्ध कराया जाये तथा पशुपालकों को इन रोगों से बचाव के उपायों के बारे में जागरूक किया जाये।

4. वैक्सीन एवं ताप संवेदी औषधियों की गुणवत्ता बनाये रखने हेतु इनका भण्डारण, परिवहन एव उपवीन उपयुक्त तापमान पर संचारित करते हुये किया जावे अर्थात कोल्डचेन सधारण का पूरा ध्यान रखा जावे। इस हेतु वॉक इन कूलर पूयं जनरेटर की कार्यशीलता सुनिश्चित की जावे। टीकों एवं औषधियों के समयबद्ध वितरण एवन उपयोग पर विशेष ध्यान दिया जाये।

5. आकाशवाणी, दूरदर्शन, प्रेसनोट, प्रकाशन, पम्पलेट वितरण, पशुधन प्रदर्शनी एवं पशुपालक गोष्ठियों जैसे विस्तार माध्यमों का उपयोग करते हुए शीत ऋतु में पशुओं में होने वाले विभिन्न रोगों से बचाव के उपायों के संबंध में पशुपालकों को जागरूक एवं संवेदनशील बनाया जायें।
6. पशुओं को शीत आघात (Cold Wave) से सुरक्षित रखे जाने हेतु पशु आवालों, पशु गृहों एवं पशु बाड़ों में निम्नानुसार समुचित व्यवस्था सुनिश्चित किये जाने हेतु पशुपालकों को अवगत करवाया जावे।
7. एनिमल शेड्स में जूट की टाटपट्टी लिवाल आदि का उपयोग किया जायें ताकि पशुओं विशैषकर छोटे पशुओं एवं पोल्ट्री आदि को विशेष सुरक्षा प्रदान की जा सके।
8. पशु आंवास गृहों में सूखी हास/चारे आदि की बिछावट की जाये।
9. छोटे पशुओं एवं पोल्ट्री आदि को सर्दी के समय पशु गृह के भीतर ही रखा जाये।
10. पशु आवासों में हवा तथा प्रकाश की व्यवस्था रखी जायें ताकि समुचित वेटिलेशन तथा नमी रहित (without dampness) रखा जा सके।
11. पशुओं को सर्दी के मौसम में गुणवत्तापूर्ण हरा वसा युक्त पौष्टिक संतुलित आहार उपलब्ध कराने हेतु पशुपालकों को प्रेरित किया जायें। सम्बन्धित पशु चिकित्सक उनके क्षेत्र में बहुलता से प्राप्त होने वाले इस तरह के पशु आहार सामग्री के उपयोग बाबत् पशुपालकों को One To One Interaction) Whatsapp व अन्य संचार माध्यमों यथा रेडियो वार्ता, प्रेस नोट आदि की सहायता से जागरूक बनाया जायें।
12. गौशालाओं में संधारित पशुधन का सामयिक एवं नियमित स्वास्थ्य परीक्षण निकटवर्ती पशुचिकित्सक से कराया जावे। गौशाला में टीकाकरण, डीबर्मिंग एवं उपचार इत्यादि कार्य गौशाला प्रबन्धन के सहयोग से सुनिश्चित किये जावे।
13. जिला संयुक्त निदेशक / उपनिदेशक अथवा कार्यालय में पदस्थापित पशु चिकित्सा अधिकारी द्वारा माह में कम से कम 5 प्रतिशत गौशालाओं का निरीक्षण किया जाना सुनिश्चित करेगें।
14. पशु स्वास्थ्य संरक्षण के साथ-साथ गौशालाओं में संधारित पशुओं के समुचित पशु प्रबन्धन (पशु आहार, एवं पशु आवासों में सूखी घास बिछाकर रखने, शीत लहर से बचाने हेतु जूट की पट्टी तिरपाल आदि व्यवस्थाओं हेतु गौशाला संचालकों तथा गौशाला में कार्य करने वाले कार्मिकों को अवगत कराया जायें।
15. विगत वर्षों में शीत ऋतु में क्षेत्र के कई भागों में ऊंटों में श्वसन तंत्र सम्बन्धी बीमारियां पाई गई थी जिसमें नाक से स्त्राव, खासी, निमोनिया, तेज बुखार श्वांस लेने में तकलीफ तथा जोड़ों में अकडन इत्यादि लक्षण प्रमुखतया पाये गये थे। अतः उष्ट्र सम्पदा की स्वास्थ्य रक्षा हेतु विशेष निगरानी रखी जावे।
16. एवियन इन्पलूऐन्जा, इंक्वाइन इन्पलूऐन्जा, बोवाइन-स्पॉन्जीफार्म एन्सेफेलोपैथी (BSE), पशुमाता (RP), सी.बी.पी.पी-इत्यादि का नियमित सर्वेक्षण किया जावे एवं नमूनों का संकलन प्रिजर्वेशन तथा संदेषण कार्य वैज्ञानिक विधि एवं निर्धारित मापदण्डानुसार किया जावे।
17. क्षेत्र के जल स्त्रोतों (वाटर बॉडीज अभयारण्यों वेट मार्केट तथा व्यवसायिक मुर्गी फार्मों से एवियन इन्फ्लूएन्जा रोग सर्वेक्षण हेतु सैम्पल्स का संकलन रोग निदान प्रयोगशालाओं के माध्यम से किया जायें तथा उक्त सैम्पल्स उच्चतर प्रयोगशालाओं को अग्रेषित किये जायें।
18. पशु रोग प्रकोप के सम्बन्ध में विभाग द्वारा की गई कार्यवाही रिपोर्ट (एक्शन टेकन) संयुक्त निदेशक कार्यालय को प्रेषित की जाये। पशु रोग प्रकोप की विस्तृत मासिक रिपोर्ट निर्धारित प्रारूप (Format&Animal Disease Surveillance Report) में निदेशालय को प्रेषित की जाये।
19. पशु रोग प्रकोप की सूचना प्राप्त होने की स्थिति में प्रभावित क्षेत्र में रोग सर्वेक्षण निदान उपचार एवं नियंत्रण की कार्यवाही सम्पादित करवाये जाने का समस्त उत्तरदायित्व संबंधित जिला संयुक्त निदेशक / उपनिदेशक पशुपालन विभाग का रहेगा।
20. जिला स्तरीय मोबाईल इकाईयों के माध्यम से संस्था विहिन एवं दूरस्थ ग्राम पंचायतों में पशु रोगों से बचाव हेतु आवश्यक टीकाकरण एवं उपचार कार्य सम्पादित करावे।

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