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2024 के पहले समाजवादी पार्टी को झटके पर झटके लग रहे है !

2024 के पहले समाजवादी पार्टी को झटके पर झटके लग रहे है !

समाजवादी पार्टी मिशन 2024 की तैयारियों में जुटी हुई है और इसी बीच उसको वाराणसी में बड़ा झटका लगा है। साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ने वाली शालिनी यादव सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गई हैं। शालिनी यादव ने उत्तरप्रदेश भाजपा अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक की मौजूदगी में सोमवार को लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। शालिनी यादव का भाजपा में शामिल होना सपा को बड़ा झटका है। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में शालिनी यादव ने वाराणसी लोकसभा सीट से पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। सपा ने पूर्वांचल में यादव वोट बैंक का ध्यान रखते हुए चुनावी मैदान में उतारा था और इस चुनाव में शालिनी यादव दूसरे नंबर पर रही थीं। प्रधान मंत्री मोदी को 6 लाख से अधिक वोट मिले थे और उन्होंने वाराणसी सीट पर दोबारा जीत दर्ज की थी। वहीं शालिनी यादव के खाते में इस चुनाव में 2 लाख के करीब वोट आए थे। जहां अखिलेश यादव विपक्षी एकता में जुटे हुए हैं इसी बीच शालिनी यादव ने भाजपा में शामिल होकर सपा मुखिया को बड़ा झटका दिया है।

इसके पूर्व लोकसभा चुनाव से ठीक पहले दारा सिंह चौहान का इस्तीफा और ओम प्रकाश राजभर की भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में वापसी उत्तरप्रदेश की सियासत में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए बड़ा झटका है। 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने जातीय आधार वाले छोटे-छोटे दलों को साथ लेकर एक मजबूत कुनबा तैयार किया था, जो अब पूरी तरह बिखर चुका है। भाजपा छोड़कर सपा में आए नेता एक-एक कर साथ छोड़ रहे हैं और महान दल से लेकर सुभासपा जैसे सहयोगी दल भी दूर छिटक चुके हैं।

अखिलेश यादव न ही अपनी पार्टी नेताओं को रोक पा रहे हैं और न ही सहयोगी दलों को साथ में रख पा रहे हैं। इस तरह सपा के बिखरते कुनबे के बीच पूर्वांचल में भाजपा का गठबंधन मजबूत हो गया है। ओबीसी की मजबूत नेता अनुप्रिया पटेल से लेकर संजय निषाद और ओम प्रकाश राजभर तक भाजपा के साथ खड़े नजर आ रहे हैं जबकि सपा पूर्वांचल में अकेले रह गई है। ऐसे में अखिलेश यादव 2024 की चुनावी जंग में भाजपा गठबंधन से कैसे मुकाबला कर पाएंगे?

महान दल, सुभासपा और आरएलडी को सपा ने साथ लिया था तो स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी जैसे ओबीसी चेहरे और योगी सरकार के मंत्री ने सपा का दामन थामा था, लेकिन चुनाव के बाद से अखिलेश का कुनबा बिखरने लगा। उसी तरह से भाजपा 2024 के चुनाव से पहले सियासी माहौल को अपने पक्ष में बनाने के लिए विपक्षी दलों को एक के बाद एक झटका दे रही है और सपा हाथ पर हाथ धरे बैठी है।

धर्म सिंह सैनी ने पहले अखिलेश यादव का साथ छोड़ा और अब दारा सिंह चौहान ने सपा को अलविदा कह दिया है। दारा सिंह चौहान की भाजपा में एंट्री हो गई है जबकि धर्म सिंह सैनी पार्टी की सदस्यता लेते लेते रह गए थे। महान दल और सुभासपा का भी सपा के साथ गठबंधन टूट गया है। अखिलेश यादव न सियासी समीकरण को संभालकर रख पा रहे हैं और न ही सहयोगी दलों को। मुस्लिम मतदाता पहले से ही अखिलेश की उदासीनता से नाराज माने जा रहे हैं। इस तरह उत्तरप्रदेश की राजनीतिक पटरी पर अखिलेश यादव कैसे अपने फॉर्मूले पीडीए यानि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय को एक साथ लेकर चल पाएंगे।

पूर्वांचल की सियासत अभी भी कॉस्ट पॉलिटिक्स के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। ऐसे में सुभासपा का सपा खेमे से हटकर भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के साथ जाने का अखिलेश यादव के लिए सियासी तौर पर बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि भाजपा के साथ पूर्वांचल के वो दल हैं, जिनका ओबीसी समुदाय के बीच अपनी जातीय में अच्छी खासी पकड़ मानी जाती है। ओम प्रकाश राजभर ओबीसी की अतिपिछड़ी राजभर जाति से आते हैं तो संजय निषाद भी मल्लाह, बिंद, निषाद, कश्यप, सहनी जैसे पिछड़े वर्ग के बीच पकड़ है। इसी तरह से अनुप्रिया पटेल कुर्मी समुदाय से हैं, जो यादव के बाद दूसरी सबसे बड़ी ओबीसी जाति है।

भाजपा ने तीनों ही ओबीसी नेताओं के जरिए अपने सियासी समीकरण को दुरुस्त करने की कवायद की है, जिसके चलते अब अखिलेश यादव किस दम पर ओबीसी वोटों को अपने पाले में रखने की कोशिश करेंगे। ओम प्रकाश राजभर के जरिए ही सपा की जीत का स्ट्राइक रेट पश्चिमी उत्तरप्रदेश से बेहतर पूर्वांचल इलाके में रहा था। इसीलिए जयंत चौधरी को सपा ने राज्यसभा भेजा तो राजभर ने भी अपने बेटे के लिए एमएलसी सीट की डिमांड रख दी थी, जिसे नहीं दिए जाने के बाद ही बागी रुख अपनाया था।

बताया जाता है कि अखिलेश यादव ने ओपी राजभर को अपने साथ जोड़े रखने के लिए किसी तरह की कोई कोशिश नहीं की, उसी का नतीजा है कि सुभासपा का भाजपा के साथ गठबंधन हो गया और आज पूर्वांचल में सपा के साथ कोई भी दल नहीं है। इतना ही नहीं मुख्तार अंसारी परिवार के पक्ष में भी अखिलेश यादव कभी खुलकर नहीं खड़े हो सके। अंसारी परिवार का पूर्वांचल में अपना सियासी आधार है। गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, जौनपुर, वाराणसी, बलिया क्षेत्र के मुस्लिम समुदाय के बीच मजबूत पकड़ मानी जाती है। 2022 में अंसारी परिवार का गठबंधन के साथ खड़े रहने का फायदा सपा और राजभर दोनों को मिला था। इसके बाद भी अखिलेश ने अंसारी परिवार से दूरी बनाकर रखी और अतीक अहमद के मामले में भी सपा का स्टैंड बहुत क्लियर नहीं था।

यह भी बताया जाता हैं कि मुस्लिमों के मुद्दे पर अखिलेश यादव चुप्पी साधकर रखते हैं, जबकि सबसे ज्यादा चुनौतियों से वो गुजर रहे हैं। अखिलेश यादव ऐसे में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों के साथ सियासी समीकरण बनाना चाहते हैं, लेकिन वो अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर खामोश रहते हैं। पिछड़ों में भी सिर्फ यादव समुदाय को तरजीह देते हैं और दलितों के साथ भी रवैया वैसा ही है। कांग्रेस खुलकर मुस्लिमों के मुद्दे पर बोल रही है, जिसके चलते मुसलमानों का दिल कांग्रेस के लिए बदल रहा है। कांग्रेस के नेता सपा के बजाय बसपा के साथ गठबंधन चाहते हैं, क्योंकि अखिलेश का यादव वोट ट्रांसफर नहीं होता है जबकि दलित मतदाता आसानी से हो जाता है।

अखिलेश यादव के साथ जिस तरह से एक-एक कर सहयोगी दल छिटके हैं, उससे 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में सपा को उत्तरप्रदेश में सियासी तौर पर नुकसान होना लाजमी हैं । पूर्वांचल में सपा के पास यादव और मुस्लिम के सिवा कोई दूसरा वोट अभी फिलहाल नहीं दिख रहा है। सपा का पल्लवी पटेल के साथ जरूर गठबंधन है, लेकिन अनुप्रिया पटेल की तरह अभी कुर्मी समुदाय के बीच उनकी पकड़ नहीं है। आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी का सियासी आधार पश्चिमी उत्तरप्रदेश तक ही सीमित है।यह भी माना जा रहा है कि माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव 2024 से पहले रालोद मुखिया जंयत चौधरी सपा मुखिया अखिलेश यादव से अलग हो सकते हैं। ऐसे में मुस्लिम और यादव वोटों के दम पर अखिलेश यादव पूर्वांचल में भाजपा से कैसे मुकाबला करेंगे। वहीं, छोटे-छोटे दलों को एनडीए में लेकर भाजपा एक मजबूत सोशल इंजीनियरिंग के साथ चुनावी रणभूमि में उतरना चाहती है।

भाजपा सूत्रों की माने तो पार्टी के राज्य मुख्यालय में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह चौधरी और उत्तर प्रदेश सरकार के दोनों उप मुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद मौर्य व ब्रजेश पाठक ने राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) छोड़कर आये पूर्व सांसद राजपाल सैनी (मुजफ्फरनगर), समाजवादी पार्टी छोड़कर आए प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री साहब सिंह सैनी (सहारनपुर), सपा के पूर्व सांसद अंशुल वर्मा (हरदोई) ,सपा की पूर्व विधायक सुषमा पटेल (जौनपुर), पूर्व मंत्री जगदीश सोनकर (जौनपुर), पूर्व विधायक गुलाब सरोज (जौनपुर), पूर्व कांग्रेस मीडिया चेयरमैन राजीव बक्शी (लखनऊ), आगरा से बसपा के पूर्व चेयरमैन जिला सहकारी बैंक गंगाधर कुशवाहा, हमीरपुर से सपा के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष जितेंद्र मिश्रा, हापुड़ से सपा के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सत्यपाल यादव, हापुड़ से सपा की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सुनीता यादव समेत कई प्रमुख नेताओं भी को भाजपा की सदस्यता दिलाई है ।

गौरतलब है कि भाजपा में शामिल होने वाले ज्यादातर नेता अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समाज से आते हैं। अभी हाल ही में प्रमुख ओबीसी नेताओं सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख व पूर्व मंत्री ओमप्रकाश राजभर के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा बनने और पूर्व मंत्री व समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायक दारा सिंह चौहान (घोसी-मऊ) के भाजपा में शामिल होने के बाद इसे सत्ता पक्ष की ओर से विपक्ष को तगड़ा झटका माना जा रहा है।

अशोक भाटिया,

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