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‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान’ का उल्टा हो रहा है बिहार में !

‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान’ का उल्टा हो रहा है बिहार में !

 

भारत में सदियों से महिलाओं को शिक्षा एवं समाज में बराबरी के अधिकार से वंचित रखा गया था पर आज संवैधानिक अधिकार के तहत भारत की लाखो बेटियों ने अपनी प्रतिभा से देश का नाम रोशन करने में कामयाब हुई तब जाकर सरकार ने भी लोगो को जागरूक करने हेतु बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का संचालन प्रारंभ किया। और शिक्षा ही एकमात्र ऐसा शस्त्र है जिसके बल पर संपूर्ण विश्व में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया जा सकता है। इसलिए इस अभियान का नाम ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान’ रखा गया है। पर इस समय बिहार में बेटी न मार से न बच रहीं है न पढ़ पा रही है । सोचिए, जिस देश में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की मुहिम चल रही हो, जिस देश की बेटियां दुनिया में नाम रौशन कर रही हों, जिस देश की बेटियां फाइटर जेट उड़ा रही हों, जिस देश की महिला वैज्ञानिक चन्द्रयान को चांद पर पहुंचा रही हों, उस देश में अगर बेटियों को अपनी पढ़ाई के अधिकार के लिए सड़क पर आना पड़े, तो इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या हो सकती है?

हाल ही में बिहार के वैशाली जिले से बहुत ही शर्मनाक घटना सामने आई है । टी वी व बिहार के स्थानीय समाचार पत्रों में आ रही ख़बरों के अनुसार वैशाली जिले में गर्ल्‍स हाई स्‍कूल मनहार की छात्राओं ने शाला में बैठने की की बहुत खराब व्‍यवस्‍था है जिसको लेकर वहां की छात्राओं जमकर हंगामा किया। इस दौरान नाराज छात्राओं ने नारेबाजी की और एक सरकारी वाहन पर पथराव किया। हालांकि वाहन में कोई बैठा नहीं था। छात्राओं के हंगामें को लेकर महनार के एसडीओ ने कहा कि स्कूल में क्षमता से अधिक छात्राओं का प्रवेश हुआ है। इस संबंध में बताया गया कि उच्च विद्यालय महनार बालिका की छात्राएं लगातार विद्यालय आ रही हैं, लेकिन विद्यालय में छात्राओं का नामांकन अधिक होने और उनके बैठने की व्यवस्था नहीं की गई है। विद्यालय में 2080 छात्राओं का नामांकन है, जबकि 600 से 700 छात्राओं के ही बैठने की व्यवस्था है। शिक्षा विभाग की ओर से छात्राओं की 75 प्रतिशत उपस्थित अनिवार्य करने के कारण छात्राएं भारी संख्या में विद्यालय पहुंच रही हैं। इसके कारण उन्हें बैठने तक की जगह नहीं मिल पाती है। प्रत्येक दिन लगभग यही स्थिति बनती है।

इन्हीं सब बातों से आक्रोशित छात्राओं ने गुरुवार को शिक्षा विभाग के विरुद्ध बगावत करते हुए विद्यालय के सामने सड़क पर निकाल कर हाजीपुर-महनार एनएच 122 बी को जाम कर दिया था । सड़क जाम करने के बाद कुछ छात्राएं मदन चौक पर आ गई और यहां भी उन्होंने सड़क को जाम कर दिया, जिससे पूरे बाजार में अपरा-तफरी की स्थिति बन गई। मदन चौक से लेकर विद्यालय तक का इलाका रणक्षेत्र में तब्दील हो गया। सड़क जाम कई घंटों तक चला। आक्रोशित छात्र-छात्राओं का कहना था कि जब विद्यालय में बैठने की जगह ही नहीं है तो ऐसे में इस आदेश के आलोक में वह विद्यालय आएंगे तो बैठेंगे कहां। सरकार को चाहिए कि पहले वह विद्यालय में बैठने की व्यवस्था करें बाद वह इस प्रकार के आदेशों को निकाले।

छात्राओं में सरकार के 75 प्रतिशत उपस्थित को अनिवार्य बनाने को लेकर भारी आक्रोश नजर आया। छात्राओं ने यह भी कहा कि वह दूर दराज के क्षेत्र से काफी परेशानियों का सामना कर स्कूल पहुंचती हैं, लेकिन यहां बैठने का जगह उन्हें नहीं मिल पाता है, जिससे उनकी पढ़ाई भी नहीं होती और उन्हें परेशान होना पड़ता है।

इन छात्र-छात्राओं का दर्द, उनका गुस्सा, उनकी पीड़ा, उनकी तड़प देखकर हर कोई चौंक रहा है । स्कूलों में बेहोश होकर गिरतीं छात्राओं को देखकर लोगों के रोंगटे खड़े हो हो रहे है । स्कूलों का हाल इतना बुरा है कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। जहां स्कूल है, वहां क्लासरूम नहीं है। अगर कहीं क्लासरूम है, तो वहां शिक्षक नहीं है। क्या आप सोच सकते हैं कि एक-एक क्लास रूम में 200 बच्चों को भर दिया जाए? गणित, विज्ञान, गृह विज्ञान, इतिहास, भूगोल, हिन्दी, उर्दू, सारे विषयों के छात्र एक ही क्लासरूम में एक साथ बैठे दिखाई दे रहे हैं और स्कूल में एकमात्र शिक्षक सिर्फ जीवविज्ञान का है।

बिहार के सरकारी स्कूलों की ये बेहाली, ये बेबसी केवल सामने नहीं आई है और न ही बात सिर्फ एक दो जिले की है, वैशाली, जहानाबाद, गोपालगंज, हाजीपुर और औरंगाबाद जैसे कई जिलों से से सरकारी स्कूलों का जो कड़वा सच सामने आया, वो रोंगटे खड़े करने वाला है। आप बिहार की बेटियों की बात सुनेंगे तो आपको गुस्सा भी आएगा और दुख भी होगा।

स्कूल की लड़कियों के इतने उग्र प्रदर्शन के बाद बिहार के स्कूलों की हालत पर चर्चा शुरू हो गई, लेकिन सवाल ये उठा कि लड़कियों ने सिर्फ प्रोटेस्ट किया। क्या वाकई में स्कूल की हालत ऐसी है कि लड़कियों को पथराव करना पड़ा? इसकी हकीकत जानने के लिए अख़बार के संवाददाता जब वैशाली के महनार इलाके के उसी स्कूल में गए जहां की छात्राओं ने प्रोटेस्ट किया था। जिस वक्त अख़बार के संवाददाता इस स्कूल में पहुंचे, उस वक्त भी कई लड़कियां चक्कर खाकर गिरीं। स्कूल के शिक्षक उन्हें इलैक्ट्राल पिलाने की कोशिश कर रहे थे। स्कूल में अफरातफरी का माहौल था। जिस क्लास में पचास लड़कियों के बैठने का इंतजाम था, उस क्लास में दो सौ से ज्यादा लड़कियां बैठी थी। जिस डेस्क पर तीन लड़कियों के बैठने की जगह होती है।, उसमें छह से सात लड़कियों को बैठाया गया था। क्लासरूम में जबरदस्त गर्मी और उमस थी । पंखे चल रहे थे, लेकिन लड़कियों के कपड़े पसीने से भीगे हुए थे। ज्यादा हैरानी की बात ये थी कि जितनी लड़कियां क्लासरूम में थी, उतनी ही लड़कियां क्लासरूम के बाहर थीं क्योंकि क्लास में बैठने की जगह ही नहीं थी। लड़कियों बताती है कि वो सिर्फ अटेंडेस लगाने के लिए स्कूल आ रही हैं। स्कूल में न पढ़ाई होती है, न कोई सुविधा है और स्कूल से कई लड़कियां रोज अस्पताल पहुंच रही हैं। स्कूल के शिक्षक ने बताते है कि आज ही छह लड़कियां गर्मी के कारण बेहोश चुकी हैं। वैशाली के इस सरकारी गर्ल्स स्कूल में 2083 स्टूडेंट्स के नाम हैं। लेकिन इतनी लड़कियों के बैठने का इंतजाम कभी किया ही नहीं गया। अब लड़कियों की अटेंडेंस बढ़ गई तो स्कूल के प्रिसींपल ने लड़कियों को बैठाने का एक नया तरीका निकाला। एक ही क्लासरूम को दो हिस्से में बांटकर दो अलग-अलग क्लास के स्टूडेंट्स को एकसाथ बैठा दिया।

सोचिए जिस क्लास में एक तरफ नौवीं में पढ़ने वाली लड़कियों को गणित पढ़ाई जा रही हो, उसी क्लास में दूसरी तरफ ग्यारहवीं में पढ़ने वाली लड़कियां जीवविज्ञान की पढ़ाई कर रही हों, तो पढ़ाई कैसे होती होगी? लेकिन बच्चियों के हाथ में कुछ नहीं है, वो मजबूर हैं क्योंकि अटेंडेंस जरूरी है और इम्तेहान देकर पास भी होना है। स्कूल के शिक्षक भी मानते है कि स्कूल की हालत खराब है, बच्चों की संख्या ज्यादा है, गर्मी बढ़ती है तो कोई न कोई बच्ची बेहोश हो जाती है। इस स्कूल में सिर्फ क्लासरूम में ही नहीं, कॉरिडोर में भी कक्षाएं चलती है और इससे भी ज्यादा हैरानी की बात ये है कि अर्थशास्त्र की कक्षा में इतिहास, राजनीति विज्ञान, और दूसरे विषय की लड़कियां भी बैठी हैं, क्योंकि उनके बैठने के लिए कोई और जगह नहीं है। ग्यारहवीं की जिस कक्षा में सिर्फ पांच लड़कियां अर्थशास्त्र की हैं, वहीं उससे दस गुना लड़कियां दूसरे विषयों की बैठी हैं। शिक्षकों का मानना है कि वो क्या करें, मजबूर हैं।

जब प्रशासन को ये पता लगा कि मीडिया की टीम महनार के सरकारी स्कूल में पहुंची है, तो शिक्षा विभाग के अफसर दौड़ते भागते स्कूल पहुंचे, हालात का जायजा लिया, फिर ये तय किया गया कि स्कूल को दो शिफ्ट में चलाया जाएगा। कुछ क्लास की छात्राओं को सुबह की शिफ्ट में बुलाया जाएगा, कुछ को दोपहर की शिफ्ट में, लेकिन इस फैसले पर लड़कियों ने आपत्ति जताई। कहा, वो दूर दूर से पैदल चल कर या साइकिल से स्कूल आती हैं, इतनी गर्मी में, उमस में, दोपहर के वक्त साइकिल से स्कूल आना मुश्किल है। जब तमाम लड़कियों ने दो शिफ्ट का विरोध किया तो ये तय हुआ कि फिलहाल नौवीं की क्लास को सस्पेंड रखा जाए। कुछ दिनों तक नौवीं की क्लास नहीं होगी। नौवीं के तीन सेक्शंस के बच्चों को छुट्टी दे दी गई लेकिन लड़कियों ने इसका भी विरोध किया। कहा, कि अगर स्कूल में छात्राएं ज्यादा हैं, क्लासरूम में बैठने की जगह नहीं है, तो ये उनकी गलती नहीं है। उन्हें इसकी सज़ा क्यों दी जा रही है?उनकी पढ़ाई का नुकसान क्यों किया जा रहा है? अगर अटैंडेंस कम होगी तो परीक्षा देने से रोंकेंगे। अगर अटैंडेंस में छूट भी दे दी तो बिना पढ़े वो परीक्षा कैसे देंगी? कुछ अख़बारों का मानना है कि अपने हक़ के लिए हंगामा मचाने वाली लड़कियों पर कानूनी कार्यवाही भी हो सकती है ।

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