लालू परिवार के खिलाफ नई चार्जसीट से गरमाई बिहार की सियासत
बिहार में सत्तासुख भोग रहे लालू यादव के परिवार की मुश्किलें कम होने के बजाय बढ़ती ही जा
रही है। जमीन के बदले नौकरी घोटाले में लालू यादव के परिवार के विरुद्ध सीबीआई ने एक
नए जोन में नया आरोप पत्र दाखिल किया है। नए आरोप पत्र से बिहार में एकाएक ही सियासत
गरमा गई है। इस सियासी गरमा गर्मी के बीच राजयसभा के उप सभापति हरवंश ने मुख्यमंत्री
नीतीश से मुलाकात की है। इस मुलाकात के कई अर्थ निकले जा रहे है। नए मामले में बिहार
के उप मुख्यमंत्री और लालू के बेटे तेजस्वी को भी आरोपित किया गया है। सीबीआई ने जो
चार्जशीट दाखिल की है वह एक फ्रेश चार्जशीट है। यह सप्लीमेंट्री चार्जशीट नही है। लैंड फॉर
जॉब घोटाले में तेजस्वी यादव, लालू यादव, राबड़ी देवी, मीडिल मैन, अलग-अलग तत्कालीन
सरकारी अधिकारियों के खिलाफ फ्रेश चार्जशीट दाखिल हुई है। इससे पहले लैंड फॉर जॉब के एक
अलग जोन में लालू और राबड़ी के खिलाफ चार्जशीट अलग दाखिल हो चुकी है। इस मामले में
वो जमानत पर हैं। अब तीनों के खिलाफ फ्रेश चार्जशीट दाखिल की गई है। अब इस मामले में
राऊज एवेन्यू कोर्ट में 12 जुलाई को कोर्ट में फ्रेश चार्जशीट पर सुनवाई होगी। यह कथित
घोटाला उस समय हुआ था, जब लालू यादव 2004-09 की अवधि के दौरान केंद्र यूपीए-1 नीत
सरकार में रेल मंत्री थे। सीबीआई का आरोप है कि भारतीय रेलवे के विभिन्न क्षेत्रों में समूह 'डी'
के पदों पर विभिन्न व्यक्तियों को नियुक्त किया गया था और इसके बदले में संबंधित
व्यक्तियों ने तत्कालीन रेल मंत्री लालू यादव के परिवार के सदस्यों को और इस मामले में
लाभार्थी कंपनी 'एके इंफोसिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड' को अपनी जमीन हस्तांतरित की थी।
बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सियासी रूप से कमजोर होते ही लालू यादव के परिवार ने
बिहार की सत्ता पर एक बार फिर अपना कब्जा जरूर जमा लिया मगर जमीन के बदले रेलवे की
नौकरी के मामले में बुरी तरह फंस गए है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के
परिवार के खिलाफ एक बार केंद्रीय जाँच एजेंसियां मुखर हो गई है। लालू की पार्टी राजद ने
आरोप लगाया है राजनीतिक प्रतिशोध में नौ वर्षों बाद प्राथमिकी दर्ज की गई, जबकि सीबीआइ
को इस मामले में कोई साक्ष्य नहीं मिला था। बताया जाता है नीतीश की पार्टी ने भाजपा के
साथ गठजोड़ के ज़माने में आज के सहयोगी लालू के खिलाफ भ्रष्टाचार की अनेक शिकायतें दर्ज़
कराई थी जिनमें रेल मंत्री रहने दौरान जमीन के बदले रेलवे की नौकरी का मामला भी शामिल
था। खुद नीतीश ने लालू पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे और कहा था वे भ्रष्टाचार से किसी
हालत में समझौता नहीं कर सकते। और आज वे उसी लालू परिवार के साथ दमखम के साथ
खड़े है। इसी के साथ देश और प्रदेश की सियासत गरमा गयी है। लालू ने पूर्व की तरह फिर
खुद के पाक साफ़ होने का दावा किया है। मगर उनके विरोधियों का कहना है इसे कहते है चोरी
और सीनाजोरी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 1974 में भ्रष्टाचार के खिलाफ बिहार में
सिंहनाद किया था। लालू ने जेपी के एक सेनानी के रूप में इस आंदोलन में अपनी सक्रीय
भागीदारी दी थी और आज भ्रष्टाचार रूपी इसी अज़गर ने लालू और उनके परिवार को निगल
लिया है। जेपी के आंदोलन से निकले लालू यादव को बहुचर्चित चारा घोटाले के पांच मामले में
हुई सजा ने भ्रष्टाचार के इतिहास में एक नई इबारत लिख दी। राजद सुप्रीमो लालू यादव को
चारा घोटाले से जुड़े पांच मामलों कुल साढ़े 32 साल की सजा सुनाई जा चुकी है। वे फिलहाल
जमानत पर है। लालू की चार्जशीट पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा के समय हुई थी तो पहली सजा मनमोहन सिंह
की सरकार के समय हुई। फिर भी फंसा दिए जाने का राग अलापा जा रहा है।
गौरतलब बिहार का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार चारा घोटाला था जिसमें पशुओं को खिलाये जाने वाले
चारे के नाम पर 950 करोड़ रुपये सरकारी खजाने से फर्जीवाड़ा करके निकाल लिये गये। केंद्र
सरकार गरीब आदिवासियों को अपनी योजना के तहत गाय, भैंस, मुर्गी और बकरी पालन के
लिए आर्थिक मदद मुहैया करा रही थी। इस दौरान मवेशी के चारे के लिए भी पैसे आते थे।
लेकिन गरीबों के गुजर-बसर और पशुपालन में मदद के लिए केंद्र सरकार की तरफ से आए पैसे
का गबन कर लिया गया था । 1996 में चारा घोटाले का मामला बाहर निकला 1996 में बिहार
के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे । लालू के मुख्यमंत्री रहते ही चारा घोटाला सामने आया।
आश्चर्य इस बात का है जन धन पर डाका डालने वालों को अपने किये पर कोई पछतावा नहीं
है। लगातार जेल की हवा खाने वाले ये नेता जातीय राजनीति के बड़े पुरोधा है। गरीब गुरबों का
हक डकारने के बावजूद इसी वर्ग की सियासत में जुटे है। वे खुलेआम इसे राजनीति से जोड़कर
अपने पाप के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहरा रहे है। अब एक बार फिर केंद्रीय जाँच दलों की
राडार पर लालू परिवार का भ्रष्टाचार है जिसमें जेल जाने की तलवार लटकी हुई है।
-बाल मुकुन्द ओझा