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अपनी ही सरकार के खिलाफ अनशन कर पायलट ने कांग्रेस पार्टी की हालत ख़राब कर रखी है

अपनी ही सरकार के खिलाफ अनशन कर पायलट ने कांग्रेस पार्टी की हालत ख़राब कर रखी है

राजस्थान में सचिन पायलट ने एक बार फिर अपनी ही पार्टी की सरकार पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पायलट ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। उन्होंने कहा, "मैंने मुख्यमंत्री गहलोत से पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ शिकायत की थी, लेकिन गहलोत ने कोई एक्शन नहीं लिया।" पायलट ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जिस अंदाज में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को घेरा है, इसे कांग्रेस में फिर नई लड़ाई की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। पायलट ने कहा कि वो शहीद स्मारक पर एक दिन का उपवास रखेंगे। 11 अप्रैल को महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती है, जो सैनी समुदाय से थे, उसी समुदाय का गहलोत प्रतिनिधित्व करते हैं। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने कहा कि पायलट ने सही मांग उठाई है। जबकि दूसरों का कहना है कि उनके कृत्य से आगामी चुनाव में पार्टी को बहुत नुकसान होगा, खासकर जब पार्टी राज्य में सरकार को दोहराने की रणनीति के साथ काम कर रही है। कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि पायलट की घोषणा भी गहलोत के खिलाफ एक तरह का विद्रोह है और इससे निश्चित रूप से पार्टी को नुकसान होगा। दूसरी ओर, पायलट समर्थकों ने कहा कि पार्टी आलाकमान के समक्ष नेता द्वारा उठाए गए मुद्दों को अब तक संबोधित नहीं किया गया है, जिससे उन्हें निराशा हुई है। उन्होंने कहा कि पार्टी कार्यकर्ता पायलट को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन आलाकमान द्वारा कोई निर्णय नहीं लिया गया।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि चुनावी साल में पायलट खेमे के इस दांव के पीछे सियासी रणनीति है। कांग्रेस में चुनाव से आठ महीने पहले फिर अंदरूनी खींचतान इसी कारण बढ़ गई है। पायलट ने मुख्यमंत्री गहलोत से लेकर पार्टी और सरकार के लिए भी असहज हालात पैदा कर दिए हैं। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, पायलट खेमा अब पार्टी के भीतर रहकर लड़ाई को तेज करने की रणनीति पर चल रहा है। पायलट के ताजा बयान और अनशन के फैसले को चुनावी साल में 'प्रेशर पॉलिटिक्स' से जोड़कर देखा जा रहा है।पायलट खेमे की मुख्य डिमांड मुख्यमंत्री का पद थी। इस मामले को लगातार टाला गया। पहले 25 सितंबर को विधायक दल की बैठक बुलाई गई। गहलोत खेमे ने पैरेलल बैठक करके एक तरह से बागी तेवर दिखा दिए थे। उस घटना के बाद राजस्थान में मुख्यमंत्री बदलने का मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के कारण भी देरी हुई। जब राहुल की यात्रा के बाद भी राजस्थान पर कोई फैसला नहीं हुआ तो पायलट खेमे ने नई रणनीति के तहत अब मुद्दों के आधार पर मुख्यमंत्री गहलोत को घेरने की रणनीति बनाई है। पायलट ने उसी पॉपुलर नैरेटिव का सहारा लिया है, जो गहलोत और वसुंधरा विरोधी मिलीभगत के आरोप लंबे समय से लगाते रहे हैं।
गौरतलब है कि पायलट बीच में आक्रामक होने के बाद शांत हो गए थे। 8 अप्रैल को राहुल गांधी के समर्थन में यूथ कांग्रेस के मशाल जुलूस में हिस्सा लिया। रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक्शन नहीं होने का तर्क देकर अनशन की घोषणा कर दी। इसे सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।सचिन ने कांग्रेस हाईकमान के सामने डिमांड और सुझाव रखे थे। इनमें से कोर मुद्दों पर अब तक एक्शन नहीं हुआ। पायलट पर उनके समर्थकों और गहलोत विरोधी माहौल का भी दबाव था। इसलिए उन्हें कोई न कोई सियासी स्टैंड लेना जरूरी था। पायलट ने उसी रणनीति के तहत करप्शन का मुद्दा उठाकर मुख्यमंत्री को घेरने का प्रयास किया है। पायलट के हमले की टाइमिंग बहुत अहम है।
दरअसल विवाद वसुंधरा लेकर हुआ शुरू हुआ ।प्रदेश की सियासत में लंबे समय से गहलोत और वसुंधरा राजे के बीच मिलीभगत के आरोप लगते रहे हैं। कांग्रेस की बैठकों तक में ये आरोप लगे हैं। दूसरी पार्टियां भी लंबे समय से मिलीभगत के आरोप लगाती रही हैं। इन्हें सियासी आरोपों के तौर पर ही देखा गया।मिलीभगत का आरोप गहलोत और राजे के राजनीतिक विरोधियों का एक पसंदीदा नैरेटिव भी रहा है। इसका ही अब पायलट ने सहारा लिया है। पायलट ने भी विरोधियों के बहाने वही आरोप लगा दिया है। मिलीभगत के आरोप सियासी हैं, लेकिन विरोधी खेमा पुराने उदाहरण भी गिनाता है।
राजे के 2003 से 2008 के कार्यकाल में कांग्रेस ने घोटालों के खूब आरोप लगाए थे। गहलोत जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तब 2009 में भाजपा राज के घोटालों की जांच के लिए माथुर आयोग बनाया था। यह एक कमेटी थी।माथुर आयोग का गठन कमिश्नर ऑफ इन्क्वायरी एक्ट के तहत नहीं बनाकर एक प्रशासनिक आदेश से किया गया था। इसकी लीगल हैसियत आयोग जैसी नहीं थी। कानूनी खामियां छोड़ने के कारण माथुर आयोग पर हाईकोर्ट से ही रोक लग गई थी।आयोग के पास जमीनों और दूसरे घोटालों से जुड़ी फाइलों को बाद में लोकायुक्त को देना पड़ा। अगर इन्क्वायरी एक्ट में आयोग बनता तो जांच के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री, अफसरों तक को समन जाते।
उस समय सियासी हलकों में यह चर्चा थी कि जान-बूझकर आयोग को कमजोर रखा गया था, ताकि किसी के खिलाफ कार्रवाई भी नहीं हो और चुनाव के वक्त किया गया वादा भी पूरा हो जाए।उस वक्त गहलोत ने कहा था कि हमने जान-बूझकर इन्क्वायरी एक्ट में आयोग नहीं बनाया, क्योंकि उससे पूर्व मुख्यमंत्री को पूछताछ के लिए समन जारी होते। सियासी बदले की भावना से कार्रवाई की बात आती।
2014 में जब वसुंधरा की सरकार बनी तब पायलट कांग्रेस अध्यक्ष बने। पूरे पांच साल राजे सरकार पर खूब आरोप लगाए। खान घोटाले को लेकर कांग्रेस ने आंदोलन किया था। राष्ट्रपति भवन तक गए थे।राजे के शासनकाल में 108 एंबुलेंस घोटाले में गहलोत, पायलट सहित कई कांग्रेस नेताओं के खिलाफ CBI जांच तक की सिफारिश की गई थी। हालांकि उस केस में कुछ नहीं हुआ था। गहलोत के नजदीकी नेताओं पर मुकदमे चले थे। शांति धारीवाल पर एकल पट्टे के मामले में ACB में केस हुआ था।पिछले भाजपा राज में खान घोटाले और कुछ दूसरे घोटालों को कांग्रेस ने विपक्ष में रहते जोरदार तरीके से उठाया था। गहलोत ने उन आरोपों की जांच के लिए इस बार कोई कमेटी या आयोग नहीं बनाया।पायलट खेमे की बगावत के समय भाजपा के कुछ विधायकों का गहलोत को समर्थन होने की बात भी उठी थी। जब खान घोटाले पर एक्शन नहीं हुआ था।गहलोत खेमे के नेताओं ने राजे के पक्ष में बयान दिए तो मिलीभगत का माहौल फिर बनाया गया। पायलट ने उसी को आगे बढ़ाकर अब गहलोत को घेरा है। देखा जाय तो जब कोई नेता अगर करप्शन के मुद्दे को लेकर आवाज उठाता है तो जनता का एक बड़ा तबका जुड़ता है। सरकार के आखिरी साल में यह टेस्टेड फॉर्मूला है। पायलट की रणनीति अब चुनाव से पहले प्रेशर पॉलिटिक्स की है। पायलट खेमे ने हाईकमान के सामने जो भी मुद्दे उठाए, उनका पूरा समाधान अब भी नहीं हुआ।
बताया जाता है कि विधानसभा चुनावों में पायलट को अब टिकट वितरण के सिस्टम पर भी पकड़ बनानी है। समर्थकों को टिकट दिलवाने हैं। सियासी रूप से मजबूत रहने के लिए अच्छी संख्या में टिकट दिलवाना जरूरी है। चुनावी साल में करप्शन के मुद्दे पर पायलट देश-प्रदेश में माहौल बनाना चाहते हैं। साथ ही पार्टी को भी नए सिरे से नेगोशिएशन वाली हालत में लाना चाहते हैं। ताकि मांगों को मनवाया जा सके।गहलोत 25 सितंबर को विधायकों का संख्या बल और आंख दिखा चुके हैं। ऐसे में बदलाव की संभावना नहीं देख पायलट ने नई रणनीति का सहारा लिया है। भाजपा राज के करप्शन के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने का मुद्दा उठाकर पायलट ने पार्टी के भीतर गहलोत विरोधियों और एक बड़े तबके का समर्थन हासिल करने की कोशिश की है। कांग्रेस का यह तबका भाजपा के करप्शन पर सॉफ्ट रुख अपनाने का पहले भी विरोध करता आया है।
कांग्रेस के सूत्रों का दावा है कि पायलट और गहलोत के बीच लंबे समय से बातचीत नहीं हुई है। दोनों के बीच तल्खियां कम होने की जगह बढ़ी हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री गहलोत ने एक सवाल के जवाब में तंज भरे लहजे में पायलट को लेकर कहा था कि अभी तो वे कांग्रेस में ही हैं। गहलोत समर्थक मंत्री और नेता भी पायलट पर तंज कसते आ रहे हैं।मंत्री रामलाल जाट ने पायलट पर दोगलापन के आरोप लगाए थे। तब पायलट समर्थक मंत्री हेमाराम चौधरी ने कहा था कि ये सब लोग मिलकर सचिन को कांग्रेस से बाहर करना चाहते हैं, लेकिन ऐसा होगा नहीं। पायलट और गहलोत के बीच खींचतान बहुत आगे के लेवल पर पहुंच चुकी है।अब हाईकमान जब दोनों को आमने-सामने बैठाकर बात करेगा, तभी सुलह का रास्ता निकल सकता है। पायलट के मौजूदा स्टैंड के बाद अब हाईकमान को दखल देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।
कांग्रेस के लिए यह बहुत नाजुक वक्त है, कांग्रेस छोड़कर जाने वाले नेताओं की लाइन लगी है, ऐसे वक्त में हाईकमान नहीं चाहेगा कि जिस नेता को असेट कहा, उसके खिलाफ एक्शन लिया जाए। हालांकि इस पूरे मुद्दे पर गहलोत के साथ हाईकमान को भी डैमेज कंट्रोल का तरीका तो खोजना ही पड़ेगा । इस पूरे घटनाक्रम में नुकसान कांग्रेस को ही उठाना पड़ रहा है , क्योंकि चुनाव से आठ महीने पहले अगर पार्टी का स्टार प्रचारक अपनी ही सरकार के खिलाफ अनशन करे तो खींचतान का अंदाजा लगाया जा सकता है कि हालात कितने खराब हैं।

-अशोक भाटिया

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