नौनिहालों का सबसे बड़ा दुश्मन है बाल मजदूरी
बाल श्रम से हमारा तात्पर्य ऐसे कार्यों से है जिसमें काम करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित
उम्र से छोटा होता है और इस प्रथा को अनेक देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने शोषित करने वाली
माना है। बाल मजदूरी के प्रति विरोध एवं जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से हर साल 12 जून को
विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। साथ ही 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से श्रम न
कराकर उन्हें पढ़ने लिखने के लिए जागरूक और प्रेरित करना है। 2023 में विश्व बाल श्रम निषेध
दिवस की थीम अब कार्यवाही करें: बाल मजदूरी को समाप्त करें रखी गई है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम
संगठन के अनुसार, बाल श्रम वह कार्य है जो बच्चों को उनके बचपन, उनकी क्षमता और उनकी
गरिमा से वंचित करता है और जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यह इस
प्रकार का कार्य है जो बच्चों को उनके शिक्षा के अधिकार और सम्मानजनक जीवन से वंचित करता
है।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार विश्व भर में 16 करोड़ बच्चे यानि हर दस में से एक बच्चा, बाल
श्रम का शिकार है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों के अनुसार अब भी
दुनियाभर में करीब 152 मिलियन बच्चे बाल मजदूरी करते हैं जिसमें 72 मिलियन बच्चे
बेहद खतरनाक स्थिति में काम करते हैं। यूनिसेफ से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार दुनिया
भर में बाल श्रम में बच्चों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है, गत वर्ष यह संख्या
लगभग 160 मिलियन थी। पिछले चार वर्षों में बाल मजदूरों की संख्या में 8.4
मिलियन की वृद्धि हुई है। इसमें 5 से 11 वर्ष की आयु के बच्चों की संख्या में
उल्लेखनीय वृद्धि बताई जा गई थी, जो आज कुल वैश्विक आंकड़े के आधे से अधिक हैं।
एक अनुमान के अनुसार विश्व के बाल श्रमिकों का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा भारत में है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 2 करोड़ बाल मजदूर हैं और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के
अनुसार तो भारत सरकार के आंकडों से लगभग ढाई गुना ज्यादा 5 करोड़ बच्चे बाल मजदूर हैं।
भारत सरकार ने बालश्रम पर विभिन्न कानूनों को अमलीजामा पहना कर निषेध घोषित किया है।
भारत के संविधान में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से ऐसे कार्य या
कारखाने आदि में नहीं रखा जाये। कारखाना अधिनियम, बाल श्रम निरोधक कानून आदि में भी
बच्चों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की गई है। कानूनों के बावजूद आज भी करोड़ो बच्चों का बचपन बाल
श्रम की भेंट चढ़ रहा है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे स्तर पर होटल, घरों व फैक्टरी में काम कर या
अलग अलग व्यवसाय में मजदूरी कर हजारों बाल श्रमिक अपने बचपन को तिलांजलि दे रहें हैं
जिन्हे न तो किसी कानून की जानकारी है और न ही पेट पालने का कोई और तरीक पता है। इन्हें न
तो समाज का कोई संरक्षण मिला है और न ही सरकारी स्तर पर प्रभावी रोक की कोई व्यवस्था है।
घरेलू कार्य के अलावा इन बालश्रमिकों को पटाखे बनाना, कालीन बुनना, वेल्डिंग करना, ताले
बनाना, पीतल उद्योग में काम करना, कांच उद्योग, हीरा उद्योग, माचिस, बीड़ी बनाना, खेतों में
काम करना ,कोयले की खानों में, पत्थर खदानोंं, सीमेंट उद्योग, दवा उद्योग तथा होटलों व ढाबों में
झूठे बर्तन धोना आदि सभी काम मालिक की मर्जी के अनुसार करने होते हैं। आज पूरी दुनिया में
बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जा रहा है। बाल मजदूरी खत्म करने के लिए लाख प्रयास किये जा
रहे हों लेकिन हकीकत कुछ और है। इस दिवस से अनजान छोटे छोटे बच्चे होटलों, फैक्टरियों,
दुकानों और घरों में मजदूरी करने को मजबूर हैं। अपने और अपने परिवार के पेट की आग को
बुझाने के लिए मासूम बच्चों को छोटी उम्र में मजदूरी करनी पड़ रही है। चाहे तपती गर्मी हो या फिर
कड़कड़ाती ठण्ड, बच्चे मजदूरी कर अपना और अपने घर का पेट पालने को मजबूर होते हैं। शिक्षा
की रोशनी से मरहूम इन बच्चों के खेलने कूदने के दिन मजदूरी में बीतते है। भारत में बाल मजदूरी
बहुत बड़ी समस्या है। यह समस्या सदियों से चली आ रही है। कहने को देश में बच्चों को भगवान
का रूप माना जाता है। फिर भी बच्चों से बाल मजदूरी कराई जाती है। जो दिन बच्चों के पढ़ने,
खेलने और कूदने के होते हैं, उन्हें बाल मजदूर बनना पड़ता है। इससे बच्चों का भविष्य अंधकारमय
होता जा रहा है।
अशिक्षा, गरीबी, अंधविश्वास आदि अनेक कारणों के विश्लेषण से पता चलता है कि बच्चे बाल श्रम
करने पर मजबूर हैं। ये बच्चे मजदूरी नहीं करना चाहते मगर मजबूरी इन्हें इन कार्यों को करने पर
मजबूर कर रही है। बच्चों को पढ़ने लिखने और खेलने कूदने से वंचित करना सबसे बड़ा अपराध है।
बाल श्रम को केवल कानून बनाकर ही नहीं रोका जा सकता। आवश्यकता इच्छा शक्ति की है। हमें
अपने प्रयासों को तेज करना चाहिये और बच्चों का भविष्य संवारने के लिए वह हर जतन करना
चाहिये जिससे बच्चे बाल श्रम की इस कुत्सित प्रथा और मजबूरी से मुक्त हो सकें।
-बाल मुकुन्द ओझा