कांग्रेस का राष्ट्रव्यापी आंदोलन, 10 जनवरी से 'मनरेगा बचाओ संग्राम' का ऐलान
नई दिल्ली । अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने मनरेगा के अधिकार आधारित स्वरूप की रक्षा के लिए देशभर में बड़े जनआंदोलन की घोषणा की है। कांग्रेस महासचिव और सांसद केसी वेणुगोपाल ने सभी प्रदेश कांग्रेस समितियों (पीसीसी) को पत्र लिखकर 'मनरेगा बचाओ संग्राम' के राष्ट्रव्यापी शुभारंभ की जानकारी दी है। यह आंदोलन केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नए विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम के खिलाफ शुरू किया जा रहा है, जिसे कांग्रेस ने ग्रामीण रोजगार और आजीविका पर सीधा हमला बताया है। केसी वेणुगोपाल ने पत्र के जरिए कहा कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) वर्ष 2005 में यूपीए सरकार द्वारा लागू किया गया एक अधिकार-आधारित कानून है। यह कानून ग्रामीण परिवार को मजदूरी रोजगार की मांग करने का कानूनी अधिकार देता है। इसके तहत राज्य सरकारों को 15 दिनों के भीतर काम देना अनिवार्य है, अन्यथा बेरोजगारी भत्ता देना पड़ता है। यही वैधानिक गारंटी मनरेगा की सबसे बड़ी पहचान है। कांग्रेस का कहना है कि मनरेगा ग्रामीण आजीविका की रीढ़ रहा है, जिससे हर साल 5 से 6 करोड़ परिवारों को रोजगार मिलता है। इससे मजबूरी में होने वाला पलायन घटा है, ग्रामीण मजदूरी बढ़ी है और गांवों में टिकाऊ सामुदायिक संपत्तियों का निर्माण हुआ है। इस योजना से महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और वंचित वर्गों को विशेष लाभ मिला है। कुल कार्यदिवसों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत बताई गई है। कांग्रेस ने नए विकसित भारत जी राम जी अधिनियम पर आपत्ति जताई है। पार्टी का आरोप है कि यह नया कानून मनरेगा की मूल भावना से पूरी तरह अलग है। इससे काम की वैधानिक गारंटी खत्म हो जाती है, फैसलों का केंद्रीकरण केंद्र सरकार के हाथों में चला जाता है और ग्राम सभाओं और पंचायतों की भूमिका कमजोर होती है। साथ ही केंद्र सरकार का मजदूरी योगदान लगभग 90 प्रतिशत से घटाकर 60 प्रतिशत करने की बात कही गई है, जिससे आर्थिक बोझ राज्यों और मजदूरों पर पड़ेगा। बजट-सीमित आवंटन, कृषि के व्यस्त मौसम में काम पर रोक और मजदूरी सुरक्षा प्रावधानों के कमजोर होने से रोजगार में कमी और ग्रामीण संकट बढ़ने की आशंका जताई गई है। कांग्रेस ने यह भी कहा कि योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाना श्रम की गरिमा और ग्राम स्वराज के मूल्यों को कमजोर करने जैसा है। इन्हीं कारणों से कांग्रेस कार्यसमिति ने 27 दिसंबर को हुई बैठक में सर्वसम्मति से 'मनरेगा बचाओ संग्राम' नाम से राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। इस आंदोलन के तहत चरणबद्ध कार्यक्रम तय किए गए हैं। कार्यक्रम के अनुसार, पहले पीसीसी मुख्यालयों में बैठकें होंगी, जिनमें नए कानून के असर पर चर्चा की जाएगी और जिला-वार जिम्मेदारियां तय होंगी। सभी जिलों में 10 जनवरी को डीसीसी कार्यालयों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अभियान का औपचारिक शुभारंभ किया जाएगा। 11 जनवरी को जिला मुख्यालयों या प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर एक दिवसीय उपवास और प्रतीकात्मक विरोध होगा, जिसमें पार्टी नेता, निर्वाचित प्रतिनिधि और मनरेगा श्रमिक शामिल होंगे। पंचायत स्तर पर 12 से 29 जनवरी तक चौपालें, जनसंपर्क कार्यक्रम, नुक्कड़ सभाएं और पर्चा वितरण किए जाएंगे। वार्ड और ब्लॉक स्तर पर 30 जनवरी को शांतिपूर्ण धरने होंगे। 31 जनवरी से 6 फरवरी के बीच जिला कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट कार्यालयों पर धरना देकर ज्ञापन सौंपे जाएंगे। 7 से 15 फरवरी तक राज्य स्तर पर विधानसभा घेराव किया जाएगा। अभियान के अंतिम चरण में 16 से 25 फरवरी के बीच एआईसीसी की ओर से चार बड़ी क्षेत्रीय रैलियां आयोजित होंगी।