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ईरान हमले पर कांग्रेस में मतभेद, संदीप दीक्षित का थरूर पर निशाना

ईरान हमले पर कांग्रेस में मतभेद, संदीप दीक्षित का थरूर पर निशाना

नई दिल्ली। कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने 20 मार्च को अपने सहयोगी शशि थरूर की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने ईरान पर अमेरिका-इजराइल के हमले की निंदा करने में मोदी सरकार के संयम का समर्थन किया था। दीक्षित ने कहा कि केरल के सांसद को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए क्योंकि वे मुद्दों को समझे बिना ही अपनी राय रखते हैं। उन्होंने अपनी आलोचना को और तीखा करते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी थरूर नेहरूवादी विदेश नीति की परंपरा का पालन करने के बजाय पेंशन और दूसरों से विनम्रतापूर्वक बात करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।


दीक्षित ने एएनआई को बताया कि मेरा मानना है कि उन्हें (शशि थरूर को) चीजों की ज्यादा समझ नहीं है। अगर कोई बिना समझे कोई राय रखता है, तो उसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। मेरी राय में, इस मुद्दे पर थारूर की समझ और टिप्पणियां एक गंभीर व्यक्ति की सोच को नहीं दर्शाती हैं। दीक्षित ने ऐसी घटनाओं को चुपचाप स्वीकार न करने की चेतावनी देते हुए कहा कि अगर हम चुपचाप सब कुछ देखते रहेंगे, तो अपवाद भी आम बात हो जाएगी। वेनेजुएला में अमेरिका ने उसके राष्ट्रपति को देश की धरती से उठा लिया। ईरान में उन्होंने राष्ट्राध्यक्ष की हत्या कर दी। अगर हम ऐसी घटनाओं पर चुप रहेंगे तो अमेरिका को दूसरे देशों में ऐसा करने से कौन रोकेगा? किसी भी देश का यह कर्तव्य नहीं है कि वह दूसरे देश के मामलों में दखल दे, चाहे वहां लोकतंत्र हो या न हो।

कांग्रेस नेता ने आगे तर्क दिया कि कुछ परिस्थितियों में किसी देश की तटस्थता के नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि हर देश अपने हितों की रक्षा करता है। हालांकि, कुछ बड़े सिद्धांत भी मायने रखते हैं, और अगर आप कोई रुख नहीं अपनाते हैं, तो एक समय ऐसा आता है... जब हिटलर का शासन था, तब कई यूरोपीय देशों ने कुछ न कहने का फैसला किया था। लेकिन इसके परिणामों को देखिए। अगर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं, तो ऐसी तटस्थता नुकसानदायक साबित हो सकती है।


दीक्षित ने दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास में भारत की ओर से शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने वाले सरकारी अधिकारी और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर प्रधानमंत्री की चुप्पी के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि पुस्तक पर हस्ताक्षर करना एक बात है, लेकिन ऐसी घटना पर प्रधानमंत्री का चुप रहना बिल्कुल अलग बात है। विदेश सचिव की विदेश नीति बनाने में कोई भूमिका नहीं होती। किसी देश की विदेश नीति का प्रतिबिंब प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री होते हैं। समय का विशेष महत्व होता है।

 

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