निरन्तरता तथा धैर्य ही लक्ष्य प्राप्ति के उत्तम साधन: पालीवाल
बाप। "कदम निरंतर चलते जिनके श्रम जिनका अविराम छत है। विजय सुनिश्चित होती उनकी घोषित यह परिणाम है।’ उक्त श्लोगन को धरातल पर साबित किया लता पालीवाल ने, सन 2009 में आज से 14 वर्ष पूर्व लता पालीवाल का विवाह मुकेश पालीवाल बाप के साथ हुआ। तब उनकी स्कूली शिक्षा 10वीं तक ही पूर्ण हुई थी। आगे का सफर तीन -चार वर्ष अन्तराल के पश्चात प्राइवेट शिक्षण एवं स्वाध्याय के चलते ही लता ने पूर्ण किया। लता ने 12वी कक्षा कला वर्ग से, स्नातक एवं स्नातकोत्तर राजनीति विज्ञान का शिक्षण जेएनवीयू विश्वविद्यालय से प्राइवेट पूर्ण की। बीएड बैचलर आफ एजुकेशन का शिक्षण गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए पूर्ण किया। लता पालीवाल ने सरकारी सेवा में शिक्षक बनने का अपना एक लक्ष्य निर्धारित कर लिया था।
कहते हैं ना इंसान जब कठोर व्रत मन से धारण करता है, तो उसको पूर्ण करने की जिम्मेदारी भी स्वयं की बनती हैं। स्वयं के लक्ष्य को पूरा करने के लिए पालीवाल ने नियमित दिनचर्या में स्वाध्याय को लेकर कठोर परिश्रम किया। पिछली प्रतियोगी परीक्षा में मात्र एक-दो अंको से प्राप्त विफलता को एक नई चुनौती के रूप में लेकर असफलता में क्या चूक रह गई उन भूलों को सुधारते हुए पुनः अपने लक्ष्य की ओर बढ़ी। फलस्वरुप स्कूल व्याख्याता (आरईएस) के रूप में शिक्षा विभाग के सर्वोच्च पद को सुशोभित किया।
लता पालीवाल के लिए दिनकरजी की उक्त पंक्तियां चरितार्थ हो रही है ......
हैं कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके आदमी के मग में
खम ठोक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़,जब इंसान जोर लगाता हैं तो पत्थर पानी बन जाता
राजस्थान के सुदूर पश्चिमी क्षेत्र फलोदी जिले के छोटे से गांव देहात मोखेरी से निकल शिक्षा विभाग में इतने लंबे सफर के पीछे लता पालीवाल की प्रेरणा सम्बलन कर्ता उनके पति मुकेश पालीवाल का रहा। प्रत्येक अनुकूल प्रतिकूल परिस्थिति में पालीवाल को पॉजिटिव सोच देने का कार्य मुकेश पालीवाल ने किया।
मुकेश पालीवाल पिछले 20 वर्षों से समाज सेवा में अनवरत कार्य कर रहे हैं। पालीवाल युवा मंडल के जिला अध्यक्ष संभागीय अध्यक्ष एवं प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए चिकित्सा क्षेत्र में समाज तथा राष्ट्र उत्थान में अपना अमूल्य समय दिया। कोरोना काल में मुकेश पालीवाल ने पल्स एंड इमेजिंग सेंटर खोलकर सीटी स्कैन जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं में मानवीय संवेदनाओं को प्रमुखता से रखकर जन सेवा में तत्पर रहे। लता पालीवाल ने अपनी सफलता का श्रेय अपने पति के साथ साथ अपने सास ससुर तथा स्वयं के माता पिता को दिया। जिन्होंने तत्कालीन ग्रामीण परिवेश में जहां लड़के लड़कियों में विभेद अपने चरम पर था तथा गांव के आस पास विद्यालय भी नहीं थे, फिर भी इनकी प्रतिभा को देखते हुए इनको माध्यमिक तक की शिक्षा प्राप्त करने में सहयोग किया।