कच्चे तेल में उछाल, ब्रेंट क्रूड 116 डॉलर के पार पहुंचा
नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर दिखाई देने लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित सैन्य टकराव की आशंकाओं के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड छह महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) की कीमत भी 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई।
उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार, शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स करीब 2.60 प्रतिशत चढ़कर 116.13 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। यह स्तर 30 अप्रैल के बाद सबसे ऊंचा बताया गया। वहीं, डब्ल्यूटीआई क्रूड में लगभग 2.90 प्रतिशत की तेजी आई और इसकी कीमत 102.56 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
साप्ताहिक कारोबार के दौरान भी दोनों बेंचमार्क में बढ़त दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड की कीमत में लगभग 6 प्रतिशत की तेजी रही, जिससे लगातार तीसरे सप्ताह इसमें बढ़त बनी रही। डब्ल्यूटीआई क्रूड भी सप्ताह के आधार पर करीब 3.5 प्रतिशत मजबूत हुआ।
अमेरिका-ईरान तनाव से बाजार में बढ़ी चिंता
तेल की कीमतों में तेजी की प्रमुख वजह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ना और सैन्य कार्रवाई की आशंकाएं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हालिया बयान में कहा था कि अमेरिका फिलहाल ईरान के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि जल्द ही कुछ बड़ा हो सकता है। इन बयानों से क्षेत्र में हालात बिगड़ने की आशंका और गहरा गई है।
इसी बीच, द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि अमेरिका और इजरायल ने संभावित सैन्य अभियान की तैयारी के तहत सैन्य अभ्यास तेज किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन गतिविधियों में इराक के ऊपर से उड़ान भरना भी शामिल था, ताकि संभावित हमले की रणनीतियों का अभ्यास किया जा सके।
रिपोर्ट में संभावित लक्ष्यों के रूप में ईरान के ऊर्जा केंद्रों, परमाणु सुविधाओं और मिसाइलों तथा ड्रोन के भंडार का उल्लेख किया गया। हालांकि, संभावित सैन्य कार्रवाई और उसके दायरे को लेकर स्थिति अनिश्चित बनी हुई है।
ईरान ने भी दिखाई तैयारी
दूसरी ओर, ईरान की सरकारी मीडिया एजेंसी तस्नीम की रिपोर्ट के अनुसार, देश के सेना प्रमुख ने कहा है कि सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने के बाद ईरानी सेना युद्ध के लिए तैयार है। इस बयान से क्षेत्र में बढ़ते तनाव की तस्वीर और स्पष्ट होती है।
बाजार की चिंता केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा और तेल आपूर्ति को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। यदि संघर्ष का दायरा बढ़ता है या तेल उत्पादन तथा परिवहन प्रभावित होता है, तो वैश्विक बाजार में आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है, इसलिए लंबे समय तक तेल महंगा रहने पर आयात बिल बढ़ सकता है और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का असर पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों पर तुरंत या समान अनुपात में पड़े, यह जरूरी नहीं है। घरेलू कीमतों पर रुपये और डॉलर की विनिमय दर, कर, तेल कंपनियों की लागत और सरकारी नीतियों का भी प्रभाव रहता है।
फिलहाल बाजार की नजर मध्य पूर्व के घटनाक्रम, अमेरिका और ईरान के अगले कदम तथा वैश्विक तेल आपूर्ति की स्थिति पर बनी हुई है। यदि तनाव और बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।