लोकसभा से बसपा का सूपड़ा साफ़ होने का खतरा
बसपा सुप्रीमो मायावती आजकल सियासी सुर्ख़ियों में है। लोकसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने
रहे है, ऐसे में मायावती ने अपने पार्टी संगठन को सुदृढ़ बनाने की दिशा में काम शुरू कर दिया
है। बसपा के मौजूदा सांसद भी इन दिनों बेचैन है। उनका कहना है बसपा ने किसी एक मोर्चे
का दामन नहीं थामा तो विधानसभा की तरह लोकसभा से भी पार्टी का सूपड़ा साफ़ हो जायेगा।
यूपी सहित देशभर में बसपा के वोट बैंक में लगातार गिरावट आई है। मायावती ने पिछले दिनों
अपने भतीजे आकाश आनंद को बहुजन समाज पार्टी में अपना उत्तराधिकारी बनाया। आकाश
आनंद के हाथों में बसपा के निर्णय लेने की ताकत आने के बाद से ही माना जा रहा था कि
पार्टी के तेवर में बदलाव होंगे। आकाश ने अब अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है।
मायावती के जन्मदिन को बड़े स्तर पर मनाने की तैयारी बसपा में चल रही है। इस समय
मायावती की पार्टी किसी गठबंधन या मोर्चे में नहीं है। मायावती की पार्टी का यूपी सहित देश
के कई राज्यों में जनाधार है। हालाँकि यूपी में बसपा की कमजोर स्थिति किसी से छिपी नहीं है।
मायावती इस समय एकला चलो की राह पर है। विपक्ष में होते हुए भी वह विपक्षी गठबंधन
इंडिया में शामिल नहीं हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लोकसभा चुनाव से पहले बसपा
अपने नए कलेवर में नजर आएगी। 15 जनवरी को इस बदले स्वरूप की योजना पर काम शुरू
किया जाएगा। इंडिया गठबंधन में शामिल होने के सवाल को बसपा प्रमुख मायावती ने कई बार
सिरे से खारिज किया है। देश के उत्तर भारत में बसपा दलितों पर कुछ हद तक अपना प्रभाव
रखती है। विशेषकर यूपी में दलितों के एक वर्ग विशेष सहित अल्पसंख्यक मतदाता मायावती को
अपना नेता स्वीकार करते है। मगर पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बसपा का
आधार घटा है। विधान सभा में बसपा का सूपड़ा साफ़ हो गया। मायावती ने उनकी पार्टी के
सम्बन्ध में सपा नेताओं की टिप्पणियों पर नाराजगी व्यक्त करते हुए साफ़ किया की राजनीति
में कब किसको किसकी जरुरत पड जाये यह याद रखना चाहिए ताकि बाद में शर्मिंदा न होना
पड़े। इसी बीच बसपा के एक सांसद ने बयान जारी कर कहा है मायावती को प्रधान मंत्री का
चेहरा घोषित करने पर उनकी पार्टी इंडिया बठबन्धन में शामिल होने को तैयार है।
वह भी एक समय था जब मायावती का समर्थन पाने के लिए लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों
में होड़ मची थी। भाजपा हो या समाजवादी पार्टी अथवा कांग्रेस मायावती का समर्थन पाने के
लिए सभी बेचैन रहते थे। उस दौरान बहनजी किसी को भाव नहीं देती थी। यदि किसी को
समर्थन देती तो अपनी शर्तों पर। उनके दरवाज़े पर विभिन्न विचारधारा वाले नेताओं की क़तार
देखी जा सकती थी। यूपी विधानसभा चुनाव में बहनजी की पार्टी का भट्टा बैठ गया था और
उनके अस्तित्व पर सवालिया चिन्ह लगने लगे थे। आज की बात करे तो उनके मुख्य
सिपहसालार सतीश मिश्रा भी उनसे छिटक गए है। विभिन्न चुनावी सर्वेक्षणों में भी बसपा की
हालत काफी कमजोर आंकी जा रही है। बसपा इस समय किसी गठबंधन में शामिल नहीं है
जबकि कहा जा रहा है इंडिया और एनडीए दोनों गठबंधन बसपा को अपने समूह में शामिल
करना चाहते है। मायावती ने दोनों से अलग रहने का फैसला किया है। मायावती की पार्टी कोई
आंदोलनकारी पार्टी नहीं है। इस पार्टी को कभी किसी मुद्दे पर धरना प्रदर्शन करते नहीं देखा
गया। बसपा केवल बयानों तक सीमित रहती है। बसपा की पहचान केवल जातीय पार्टी की है।
मुस्लिमों के साथ साथ दलित भी उनकी पार्टी से अलग हो गए है। मुस्लिमों का झुकाव सपा की
तरफ और दलित भाजपा की झोली में चले गए है।
गौरतलब है यूपी विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती एक बारगी
सियासत के नेपथ्य में चली गयी थी। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती
ने 2007 के विधानसभा चुनाव में जब अपने दम पर सरकार बनाई, तो उनको राष्ट्रीय मंच पर
दलित राजनीति के सिरमौर के रूप में देखा गया था । लोग यहाँ तक कहने लगे थे मायावती
एक दिन देश की प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो सकती हैं। लेकिन यूपी में 2012 के चुनाव
के बाद से लगातार खराब प्रदर्शन करने वाली बसपा का बुरा दौर जारी है। मायावती की हार को
दलित राजनीति की धार कमज़ोर होने के तौर पर भी देखा जा रहा है। गत यूपी चुनाव में बसपा
सिर्फ एक सीट पर सिमट गई है और दलित और मुस्लिम गठजोड़ तिनके की तरह बिखर गया।
- बाल मुकुन्द ओझा