किसी त्रासदी से कम नहीं है परीक्षाओं में प्रश्न डिलीट होना
हाल ही में राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा स्कूल लेक्चरर (स्कूल शिक्षा) वर्ष 2022 के विभिन्न विषयों की फाइनल आंसर-की जारी की गई है। जारी की गई इस फाइनल आंसर-की में राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा विभिन्न विषयों में अनेक प्रश्नों को डिलीट किया गया है। यह हमारी परीक्षा प्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाता है। वास्तव में, इतनी अधिक संख्या में प्रश्नों को डिलीट करने से अभ्यर्थियों पर बहुत ही नकारात्मक प्रभाव(नेगेटिव इफेक्ट)भी पड़ता है। सच तो यह है कि अभ्यर्थी एक प्रकार के मनोवैज्ञानिक दबाव में रहते हैं। परीक्षार्थी उलझन में रहता है और कई बार उसे यह लगता है कि उसकी तैयारी में कुछ कमी रह गई है। ऐसे में प्रश्न पत्र निर्माता को यह चाहिए कि वह परीक्षा हेतु ऐसे प्रश्न बनाएं जिसमें संशय या डाउट की कहीं भी कोई भी गुंजाइश ही ना हो। इतनी अधिक संख्या में प्रश्नों को डिलीट करने से प्रश्न पत्र लेने वाली संस्थाओं व प्रश्न पत्र निर्माताओं पर भी सवालिया निशान खड़े होते हैं। वास्तव में प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नों को डिलीट करना एक ग़लत परंपरा है लेकिन यह परंपरा काफी सालों से चली आ रही है। हाल ही में एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक के हवाले से यह खबर आई है कि आरपीएससी ने स्कूल लेक्चरर परीक्षा 2022 में 132 डिलीट किए हैं। इनमें केमेस्ट्री के 17, हिंदी के 16 और उर्दू के 11 प्रश्न शामिल हैं। दैनिक ने यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि इतनी बड़ी संख्या में प्रश्न डिलीट होने से मामला कोर्ट में जा सकता है। जानकारी देना चाहूंगा कि प्रश्नों पर ही नहीं आयोग के पेपर सेटरों पर भी उंगली उठती रही है। यहां पाठकों को यह जानकारी देना चाहूंगा कि स्कूल लेक्चरर के 26 विषयों पर भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित की गई थी। अब आयोग ने अंतिम परिणाम जारी करने के बाद विषयवार अंतिम आंसर की भी जारी की हैं। इन आंसर की के सामने आते ही अभ्यर्थियों में हलचल मच गई है। आयोग द्वारा इतनी बड़ी संख्या में प्रश्न डिलीट किए जाने से एक्सपर्ट भी असमंजस में हैं। यहां प्रश्न यह उठता है कि आखिर ऐसी नौबत ही क्यों आती है कि किसी भी आयोग को हरेक परीक्षा में प्रश्नों को डिलीट करना पड़े ? निर्धारित सिलेबस, निर्धारित अंकों के बावजूद आयोग को लगभग लगभग हरेक परीक्षाओं में प्रश्नों को डिलीट करना पड़ता है और भर्तियां माननीय न्यायालय में चली जाती हैं। बहुत बार तो आउट आफ सिलेबस प्रश्न पूछे जाते हैं। फिर सालों साल केस चलते हैं। यहां बात सिर्फ और सिर्फ राजस्थान लोक सेवा आयोग की ही नहीं है, देशभर में आयोजित की जाने वाली परीक्षाओं में अक्सर ऐसा होता है और यह बात मीडिया के हवाले से आई खबरों से हम सभी को पता चलती है।
यहां यक्ष प्रश्न यह उठता है कि क्या किसी भी आयोग के सब्जेक्ट एक्सपर्ट डेढ़ दो सौ ऐसे प्रश्नों का चुनाव नहीं कर सकते हैं जो कि किसी भी तरह से विवादों या संशय की स्थिति में न आने पाये ? आयोग की गलतियों का खामियाजा बहुत बार मेधावी छात्रों को भुगतना पड़ता है और वे प्रश्नों के डिलीट होने के कारण चयन से वंचित हो जाते हैं। अनेक बार यह देखा गया है कि अधिकतर आयोग परीक्षा आयोजन के बाद संबंधित परीक्षा की प्रोविजनल आंसर की जारी करते हैं और इसके बाद अभ्यर्थियों से आपत्तियां भी ली जाती हैं। आपत्तियां लेने के बाद कुछ समय बाद फाइनल आंसर-की जारी की जाती है, लेकिन आजकल फाइनल आंसर-की जारी करने से पहले ही नियुक्तियां तक दे दी जाती हैं, जबकि होना तो यह चाहिए कि नियुक्तियां देने से पहले ही फाइनल आंसर-की को जारी किया जाना चाहिए, ताकि अभ्यर्थियों को परीक्षा विशेष की आंसर-की से आत्मिक संतुष्टि मिल सके। नियुक्तियां देने के बाद किसी परीक्षा विशेष के अंक जारी करना व फाइनल आंसर-की जारी करना अभ्यर्थियों के लिहाज से ठीक व जायज नहीं ठहराया जा सकता है, क्यों कि इससे वे अपने द्वारा दी गई परीक्षा का सही से आंकलन नहीं कर पाते हैं। आयोग द्वारा पहले परिणाम जारी करना और फाइनल आंसर-की बाद में जारी करना क्या ठीक कहा जा सकता है ? जानकारी देना चाहूंगा कि पिछले साल यानी कि वर्ष 2023 के दौरान अगस्त महीने में परीक्षा परिणाम जारी किए गए थे और अब जनवरी 2024 के अंतिम सप्ताह में अभ्यर्थियों को उनके अंक दिखाये गये हैं। आज हर तरफ प्रतिस्पर्धा का एक कठिन दौर है और अभ्यर्थियों को परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ती है। कोचिंग का भी सहारा लेना पड़ता है। धन भी खर्च होता है । एक एक अंक का बहुत महत्व रहता है लेकिन क्वेश्चन डिलीट होने से अभ्यर्थियों को नुक्सान उठाना पड़ता है। प्रतिस्पर्धा के इस कठिन युग में आयोग द्वारा 15 से 17 क्वेश्चन को डिलीट करना बहुत बड़ी बात है। ऐसी परिस्थितियों में अभ्यर्थियों के पास कोर्ट में जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता है। राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा जो फाइनल आंसर-की जारी की गई है उसमें हिंदी के 16, कैमेस्ट्री के 17,उर्दू के 11 तथा इतिहास व संस्कृत के आठ-आठ प्रश्न डिलीट किए गए हैं। पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन सब्जेक्ट को छोड़कर कमोबेश अधिकतर सब्जेक्ट्स में प्रश्नों को डिलीट किया गया है। वर्तमान में अभ्यर्थी फाइनल आंसर-की से संतुष्ट नहीं है और वे कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं, क्यों कि आयोग द्वारा पहले आंसर-की जारी करके अभ्यर्थियों से आपत्तियां मांगी गई थी और इनमें से कुछ आपत्तियों को तो मान लिया गया जबकि अन्य को आयोग द्वारा नहीं माना गया, इससे अभ्यर्थियों को नुक्सान हुआ है। यह बहुत ही गंभीर व संवेदनशील विषय है कि सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी बहुत बार सही प्रश्नों को भी, जिनके प्रमाण उपलब्ध होते हैं,को भी डिलीट कर देती है और इससे अभ्यर्थियों को बहुत नुक्सान उठाना पड़ता है। नियुक्तियां देने के बाद कोई भी आयोग अभ्यर्थियों द्वारा प्रश्नों पर उठाई गई आपत्तियों को मानने के लिए तैयार नहीं होता, क्यों कि इससे संबंधित आयोग को दुबारा से रिजल्ट जारी करने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। नियुक्तियां तक देनी पड़ सकती हैं।
अभ्यर्थी फाइनल आंसर-की जारी होने के बाद माननीय न्यायालय में याचिकाओं पर याचिकाएं दायर करते हैं और इससे उनका कीमती समय और धन दोनों ही बर्बाद होते हैं। ऐसे में किसी भी परीक्षा को आयोजित करवाने वाली संस्था/बाडी/आयोग को यह चाहिए कि वह ऐसे प्रश्नपत्रों का निर्माण करें, जिससे विवादों की स्थितियां पैदा ही न होने पाएं। आपत्तियों के लिए भी अनेक बार यह देखा गया है कि एक एक प्रश्न के लिए हजार हजार रुपए की धनराशि मांगी जाती है,जो कि किसी बेरोजगार व गरीब अभ्यर्थी के लिए चुकाना बहुत बड़ी बात होती है। यदि कोई अभ्यर्थी आठ या दस प्रश्नों पर आपत्ति लगाना चाहता है तो ऐसी स्थिति में उसे आठ अथवा दस हजार रुपए सिर्फ और सिर्फ आपत्तियां लगाने के लिए भुगतान करना होता है,जो कि बेरोज़गार अभ्यर्थी के लिए बहुत मुश्किल होता है। यह विडंबना ही है कि आयोग, संस्था आदि डेढ़ दो या अधिकतम तीन घंटे के पेपर को भी ठीक से नहीं बना पाती है, जिस पर हजारों लाखों अभ्यर्थियों का भविष्य टिका होता है। तात्पर्य यह है कि यदि किसी परीक्षा में सौ प्रश्न होते हैं तो उनमें से आठ दस प्रश्नों के उत्तर या तो ग़लत होते हैं अथवा उनके एक या एक से अधिक आप्शन सही होते हैं और उन प्रश्नों को बाद में डिलीट कर दिया जाता है। बहुत बार तो यहां तक देखा गया है कि सही प्रश्नों तक को(जिनके प्रमाण यूनिवर्सल बुक्स, एनसीईआरटी, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, हिंदी ग्रंथ अकादमी या नामी गिरामी राइटर की किताबों में उपलब्ध होते हैं) भी सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी द्वारा ग़लत करार दे दिया जाता है और अभ्यर्थी मुंह मसोसकर रह जाते हैं। कोई भी अभ्यर्थी किसी भी परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए दिन रात हाड़ तोड़ मेहनत करता है और जीवन में सफल होने के सपने देखता है लेकिन परीक्षा आयोजित करवाने वाली बाडी, संस्था की गलतियों की वजह से वह निराश और हताश हो जाता है। क्या हमारे देश में ऐसा सिस्टम नहीं बनाया जा सकता है कि किसी भी परीक्षा में किसी भी प्रकार की कोई त्रुटी या गलती न रहे ? यह बहुत ही संवेदनशील और गंभीर है कि एक ही प्रश्न पत्र में इतनी अधिक संख्या में प्रश्नों को डिलीट कर दिया जाता है। प्रश्नों के डिलीट होने से बहुत बार प्रतिभाशाली छात्र चयन से वंचित रह जाते हैं और इस बार भी ऐसा हुआ है। एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक ने यह लिखा है कि 'यदि डिलीट होने वाले प्रश्न संबंधित प्रश्न पत्र में अत्यंत कठिन समझे जाने वाले प्रश्नों में शामिल होते हैं तो फिर प्रतियोगिता परीक्षा में मेहनत नहीं, किस्मत का खेल हो जाता है।' आज परीक्षाओं में नकल, पेपर आउट होना एक दूसरी बड़ी समस्या है। पिछले कुछ सालों में राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं में क्या क्या हुआ, कौन इनमें लिप्त पाए गए,यह तथ्य किसी से भी छिपा नहीं हुआ है। सच तो यह है कि राजस्थान में सरकारी नौकरियों में भर्ती के सिस्टम का हाल बेहाल रहा है। सिस्टम की इस ख़ामी का खामियाजा राजस्थान के लाखों बेरोज़गार भुगतते रहे हैं। यह बहुत बड़ी बात है कि बीते 12 साल 11 बड़ी परीक्षाओं के पेपर आउट हुए है। कई भर्तियां ऐसी रहीं हैं, जो पेपर आउट की वजह से विवादों में रहीं । यदि यहां यह बात कही जाये कि पेपर लीक होने के मामले में राजस्थान अन्य राज्यों से आगे निकल गया है, तो यह ग़लत नहीं होगा। यहां तक कि त्रुटि-रहित भर्तियां न करने पर कुछ समय पहले माननीय हाईकोर्ट ने भी सरकार पर तल्ख टिप्पणी की थी। कभी रीट पेपर लीक को लेकर तो कभी किसी अन्य पेपर लीक को लेकर ईडी तक को कार्रवाई करनी पड़ती है। प्रिंटिंग प्रेस से लेकर परीक्षा केंद्र तक नकल , पेपर चोरी के मामले सामने आते हैं। सरकारों को एस आई टी का गठन करना पड़ता है। परीक्षा प्रणाली कोई भी हो, कहीं भी हो, बिल्कुल निष्पक्ष और सही होनी चाहिए, क्यों कि यह अभ्यर्थियों के भविष्य से जुड़ी होती हैं। परीक्षाओं में धांधली, गड़बड़ी होना अभ्यर्थियों के हितों पर सीधा कुठाराघात है।