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सतत् विकास की बड़ी चुनौतियों में से एक है मरूस्थलीकरण की चुनौती

सतत् विकास की बड़ी चुनौतियों में से एक है मरूस्थलीकरण की चुनौती

17 जून को हर साल 'मरूस्थलीकरण एवं अनावृष्टि की रोकथाम हेतु अन्तर्राष्ट्रीय दिवस' के रूप में मनाया जाता है। विभिन्न मानवीय गतिविधियों जैसे कि वनों की अंधाधुंध कटाई, अत्यधिक चराई, जगह जगह कंक्रीट की दीवारों के खड़े होने(निर्माण कार्यों के कारण), तीव्र औधौगिकीकरण, शहरीकरण के कारण चरागाहों व सिंचित भूमि की कमी, और जलवायु परिवर्तन के कारण आज संपूर्ण विश्व भूमि क्षरण का सामना कर रहा है और सूखा(मरूस्थलीकरण)एक बड़ी समस्या होती चली जा रही है। आज मरूस्थलीकरण के कारण भूमि अपना उपजाऊपन खो रही है और लगातार बंजर भूमि में बदलती चली जा रही है,जो मानवता के लिए एक बड़ा और गंभीर खतरा है। मरूस्थलीकरण या भूमि क्षरण सामाजिक आर्थिक असमानता को जन्म देती है। संक्षेप में कहें तो मरुस्थलीकरण भूमि, जल, जैव विविधता और मानव जीवन को प्रभावित करता है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि 17 जून का दिन वैश्विक स्तर पर लोगों में मरुस्थलीकरण और सूखे जैसी गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने और इनसे निपटने के लिए उपायों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हर साल मनाया जाता है और पहली बार यह दिवस 1995 में मनाया गया था। दरअसल, वर्ष 1992 के रियो पृथ्वी सम्मलेन के दौरान जलवायु परिवर्तन और जैवविविधता के नुकसान के साथ मरुस्थलीकरण को सतत् विकास के लिये सबसे बड़ी चुनौतियों के रूप में पहचाना गया था और दो साल बाद यानी कि वर्ष 1994 में महासभा ने संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेज़र्टिफिकेशन (यूएनसीसीडी) की स्थापना की, जो पर्यावरण और विकास को स्थायी भूमि प्रबंधन से जोड़ने वाला एकमात्र कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय समझौता है तथा 17 जून को 'विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस' घोषित किया गया। वास्तव में यह दिवस हमें भूमि के क्षरण, मरुस्थलीकरण और सूखे के खतरों से अवगत कराता है।सच तो यह है कि यह दिवस स्थायी भूमि प्रबंधन, पारिस्थितिकीय संतुलन और जलवायु अनुकूलन की दिशा में वैश्विक प्रयासों को प्रोत्साहित करता है। गौरतलब है कि हर साल इसकी एक थीम या विषय रखा जाता है। पिछले वर्ष 2024 की थीम: 'भूमि के लिए एकजुट। हमारी विरासत। हमारा भविष्य' रखी गई थी जबकि इस वर्ष यानी कि 2025 के लिए इसकी थीम- 'भूमि को पुनःस्थापित करें। अवसरों को खोलें'(रिस्टोर द लैंड, अनलाक द अपोर्चुनीटीज) रखी गई है। बहरहाल, कहना चाहूंगा कि हमारे पारिस्थितिकी तंत्र(इको सिस्टम) और मानवता को बचाने के लिए आज सूखे की स्थितियों अथवा मरूस्थलीकरण से निपटने के लिए एक मजबूत सामुदायिक भागीदारी के साथ ही सभी स्तरों पर सहयोग बहुत ही आवश्यक है, क्यों कि मरूस्थलीकरण से भूमि की उत्पादकता कम होती और जैव-विविधता व धरती की पारिस्थितिकी तंत्र पर बहुत व्यापक असर पड़ता है। दूसरे शब्दों में कहें तो सूखे(मरूस्थलीकरण) के कारण धरती पर जल की कमी पड़ती है और इससे धरती के सभी प्राणियों/जीवों, वनस्पतियों और मानव जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आज हमारे देश में ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में सूखे की घटनाओं और अवधि में अभूतपूर्व वृद्धि हो रही है। आंकड़े बताते हैं कि 55 मिलियन आबादी हर साल सूखे के कारण प्रभावित होती है और वर्ष 2050 तक तीन-चौथाई आबादी के प्रभावित होने की आशंका है और 2.3 अरब लोग पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा आज के समय में सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में से हैं, तथा विश्व भर में 40% भूमि क्षेत्र पहले से ही क्षरित माना जाता है। भूमि को स्वस्थ रखने के लिए जल की आवश्यकता होती है और यदि भूमि स्वस्थ हैं तभी मानव, जीवों व वनस्पतियों का अस्तित्व संभव है। वास्तव में स्वस्थ भूमि ही संपूर्ण विश्व में संपन्न अर्थव्यवस्थाओं का आधार है, और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का आधा से अधिक हिस्सा प्रकृति पर ही निर्भर है, लेकिन यह विडंबना ही है कि आज हम इस प्राकृतिक पूंजी को खतरनाक दर से नष्ट कर रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि हर मिनट, भूमि क्षरण के कारण चार फुटबॉल मैदानों के बराबर भूमि नष्ट हो जाती है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि भारत की कुल भूमि का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण से प्रभावित है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भारत ने वर्ष 2019 में यूएनसीसीडी कोप-14 सम्मेलन की मेजबानी की थी, जिसमें भूमि बहाली को लेकर कई अहम वैश्विक निर्णय लिए गए थे। यहां पाठकों को बताता चलूं कि भारत ने वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर भूमि को बहाल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। बहरहाल, पाठकों को बताता चलूं कि मरूस्थलीकरण से हमारी जैव विविधता का नुकसान होता है, सूखे का खतरा बढ़ता है और इससे समुदाय विस्थापित होते हैं। जल की कमी होती है तो उत्पादन पर व्यापक असर पड़ता है और फसल उत्पादन में अभूतपूर्व कमी आती है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी होती है और अस्थिरता और पलायन जन्म लेते हैं। बहरहाल, आज मरूस्थलीकरण रोकने के लिए ज़रूरत इस बात की है कि हम पर्यावरण संरक्षण की ओर पर्याप्त ध्यान दें। इसके लिए त्वरित वनीकरण और वृक्षारोपण की आवश्यकता तो है ही, जो वन हैं,उनको बनाए रखने की दिशा में भी हम काम करें। इतना ही नहीं हमें जल प्रबंधन की ओर भी पर्याप्त ध्यान देना होगा और वर्षा जल संरक्षण भी करना होगा।जल उपचारण, जल को व्यर्थ बहने से रोकना,जल का विवेकपूर्ण और पुन: उपयोग, विलवणीकरण या लवणीय पौधों के लिये समुद्री जल का प्रत्यक्ष उपयोग बहुत जरूरी और आवश्यक है। इतना ही नहीं, हमें रेत की बाड़, हवा के झोंकों आदि से होने वाले मृदा क्षरण को भी रोकना होगा। मिट्टी के समृद्ध और अति उर्वरीकरण की आवश्यकता है। वास्तव में सतत् भूमि प्रबंधन और जागरूकता बहुत ही महत्वपूर्ण और आवश्यक है।फार्मर मैने नेचुरल रीजेनरेशन (एफएमएनआर), टहनियों की चयनात्मक छँटाई के माध्यम से अंकुरित वृक्षों की वृद्धि को सक्षम बनाता है। पेड़ों की छँटाई से उपलब्ध अवशेषों का उपयोग खेतों को मल्चिंग प्रदान करने के लिये किया जा सकता है, जिससे मिट्टी में पानी की अवधारण क्षमता बढ़ जाती है और वाष्पीकरण कम हो जाता है। वास्तव में हमें संवहनीय कृषि प्रथाओं को अपनाना और रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग करना होगा। यहां पाठकों को बताता चलूं कि संवहनीय कृषि (सस्टेनेबल एग्रीकल्चर) एक ऐसी कृषि प्रणाली है जो हमारे पर्यावरण, हमारे समाज और हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ही फायदेमंद है। वास्तव में यह प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करती है, मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखती है, और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद करती है।वृक्षारोपण, वनों की कटाई रोकना और हरित क्षेत्र बढ़ाना तथा अवैध खनन पर रोक मरूस्थलीकरण रोकने की दिशा में अन्य महत्वपूर्ण कदम हैं। पारंपरिक भूमि उपयोग पर निर्भरता कम करने के लिए गैर-कृषि आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देना आवश्यक है। हमें इजराइल की ड्रिप सिंचाई को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। बेहतर सिंचाई विधियाँ, फसल चक्र और नियंत्रित चराई भी मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। इसके अतिरिक्त, सतत विकास और कुशल जल उपयोग को बढ़ावा देने वाली नीतियाँ महत्वपूर्ण हैं। इतना ही नहीं, स्थानीय समुदायों की भागीदारी से भूमि सुधार योजनाओं को लागू किया जा सकता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि नीतिगत सहयोग और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को बढ़ावा देकर मरूस्थलीकरण को रोका जा सकता है।

 

-सुनील कुमार महला

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