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विनोबा भावे के भुदान एवं सर्वोदय में सबका विकास संभव

विनोबा भावे के भुदान एवं सर्वोदय में सबका विकास संभव

-ः ललित गर्ग
जब कोई राष्ट्र आर्थिक समृद्धि, तकनीकी प्रगति और वैश्विक प्रतिष्ठा की ओर बढ़ता है, तब उसके सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है-क्या विकास केवल भौतिक उपलब्धियों का नाम है अथवा मनुष्य के भीतर नैतिकता, करुणा, सह-अस्तित्व और जिम्मेदारी का विकास भी उसका अनिवार्य हिस्सा है? आज भारत ‘नया भारत’, ‘विकसित भारत’ और ‘समृद्ध भारत’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में आचार्य विनोबा भावे का जीवन और चिंतन हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण की सबसे मजबूत नींव मनुष्य का चरित्र है। 11 सितंबर को विनोबा भावे की जयंती है। उनका मूल नाम विनायक नरहरि भावे था। वे महात्मा गांधी के निकट सहयोगी, स्वतंत्रता सेनानी, चिंतक, अध्यात्मद्रष्टा और सर्वोदय आंदोलन के प्रणेता थे। लेकिन उन्हें केवल गांधीजी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी के रूप में देखना उनके विराट व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। विनोबा की अपनी स्वतंत्र वैचारिक भूमि थी। वे संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम से प्रेरित थे, भगवद्गीता उनके जीवन का आध्यात्मिक आधार थी और समाज-परिवर्तन उनके चिंतन का व्यावहारिक पक्ष।
विनोबा का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने आध्यात्मिकता को समाज की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा। भूदान आंदोलन इसका अद्भुत उदाहरण है। वे गाँव-गाँव पैदल गए और भूमिधरों से अपनी भूमि का एक हिस्सा भूमिहीनों के लिए दान करने का आग्रह किया। यह केवल भूमि का हस्तांतरण नहीं था, बल्कि स्वामित्व की मानसिकता से साझेदारी की चेतना की ओर बढ़ने का प्रयास था। आगे चलकर भूदान से ग्रामदान की अवधारणा विकसित हुई-‘सारी भूमि गोपाल की।’ इसमें आर्थिक न्याय के साथ सामाजिक समरसता और नैतिक उत्तरदायित्व का संदेश छिपा था। विनोबा का विश्वास था कि समाज को केवल कानूनों से नहीं, अंतरात्मा के जागरण से बदला जा सकता है। यही दृष्टि उन्हें सर्वोदय तक ले गई-ऐसा समाज जिसमें विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और किसी के उत्थान की कीमत दूसरे के शोषण से न चुकानी पड़े। चंबल के डाकुओं को आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करना उनके नैतिक नेतृत्व की शक्ति का प्रमाण था। उनके भीतर ऐसा विश्वास था कि मनुष्य मूलतः परिवर्तनशील है, आवश्यकता उसके भीतर की अच्छाई को जगाने की है।
विनोबा भावे और अणुव्रत आंदोलन के प्रणेता आचार्य तुलसी के बीच भी इसी नैतिक चेतना की गहरी साम्यता थी। जब आचार्य तुलसी ने अणुव्रत आंदोलन के माध्यम से व्यक्ति-निर्माण और नैतिक जागरण का अभियान प्रारंभ किया, तब अनेक राष्ट्रीय व्यक्तित्वों ने उनके प्रयासों को सहयोग और समर्थन दिया। विनोबा भावे उनमें प्रमुख थे। दोनों महापुरुष समय-समय पर मिलते रहे और देश के निर्माण में नैतिक मूल्यों की अनिवार्यता पर गंभीर विचार-विमर्श करते रहे। उनकी दृष्टि में राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था तभी स्वस्थ हो सकती है, जब उनका संचालन नैतिक मनुष्य के हाथों में हो। दोनों की पदयात्राओं में भी एक आत्मीय जुड़ाव दिखाई देता है। पदयात्रा उनके लिए केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने का माध्यम नहीं थी, वह जन-संपर्क, जन-जागरण और आत्म-संपर्क की साधना थी। विनोबा कहा करते थे कि पैदल चलने से धरती का स्पर्श होता है और प्रकृति के साथ संबंध गहरा होता है। उनके विचारों की यह अनुभूति मुझे स्वयं भी हुई। अणुव्रत आंदोलन के प्रणेता आचार्य तुलसी के साथ अनेक वर्षों तक पैदल चलने का अवसर मिला। मैंने अनुभव किया कि पैदल यात्रा केवल शरीर को गतिशील नहीं करती, वह मन और मस्तिष्क के बंद द्वार भी खोलती है। रास्ते में मिलने वाला सामान्य व्यक्ति भी शिक्षक बन जाता है और जीवन स्वयं एक खुली पाठशाला बन जाता है।
मेरे परिवार का विनोबा भावे से जुड़ा एक प्रसंग आज भी मेरे लिए अत्यंत भावपूर्ण है। मेरे पिता स्व. श्री रामस्वरूप गर्ग और माता स्व. श्रीमती सत्यभामा गर्ग सर्वोदय कार्य से जुड़े हुए थे। वर्ष 1959 में विनोबा भावे पदयात्रा करते हुए अजमेर आए। उन्हें जानकारी मिली कि उनकी कार्यकर्त्री सत्यभामा गर्ग कैंसर से पीड़ित हैं और जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही हैं। वे उनसे मिलने इमली मोहल्ले की संकरी गलियों से होते हुए तीसरी मंजिल तक गए और उन्हें अपना आशीर्वाद दिया। यह घटना बताती है कि विनोबा का नेतृत्व केवल बड़े मंचों और आंदोलनों तक सीमित नहीं था। वे व्यक्ति के दुख को अपना दुख मानने वाले करुणाशील संत थे। इसी क्रम में अजमेर के निकट हटूंडी में आयोजित सर्वोदय सम्मेलन का प्रसंग भी उल्लेखनीय है। मेरे पिता सर्वोदय के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उस सम्मेलन में वे आचार्य तुलसी के शिष्य मुनि राकेश कुमार जी को भी लेकर गए। वहां विनोबा भावे के साथ उनकी लंबी और सार्थक चर्चाएँ हुईं। यह केवल दो विचारधाराओं का संवाद नहीं था, बल्कि उस समय के दो नैतिक प्रवाहों का मिलन था-सर्वोदय की सामाजिक चेतना और अणुव्रत की व्यक्तिगत नैतिक साधना। दोनों का लक्ष्य अंततः एक ही था-मनुष्य बदले, समाज बदले और राष्ट्र नैतिक शक्ति के आधार पर आगे बढ़े।
विनोबा का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि महान व्यक्तित्वों का मूल्यांकन उनकी उपलब्धियों के साथ उनकी मानवीय सीमाओं और ऐतिहासिक संदर्भों में भी होना चाहिए। आपातकाल के दौरान उनके ‘अनुशासन पर्व’ संबंधी कथन ने उनके सार्वजनिक जीवन पर प्रश्न भी खड़े किए। किंतु किसी एक राजनीतिक प्रसंग से उनके पूरे जीवन के सामाजिक, आध्यात्मिक और रचनात्मक योगदान को नकारना उचित नहीं होगा। महापुरुषों को मूर्ति बनाकर पूजना जितना आसान है, उनके विचारों को आलोचनात्मक समझ के साथ जीवन में उतारना उतना ही कठिन। विनोबा ने अपने जीवन के अंतिम चरण में जैन धर्म की संलेखना-संथारा की भावना से प्रेरित होकर भोजन और दवा का त्याग किया और 15 नवंबर 1982 को देह का परित्याग किया। उनका जीवन कर्म, चिंतन, त्याग और लोकमंगल की निरंतर यात्रा था।
आज भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत कर रहा है। डिजिटल क्रांति, आधारभूत संरचना, स्टार्टअप, विज्ञान और तकनीक हमें नई ऊंचाइयों तक ले जा रहे हैं। लेकिन विकसित भारत का वास्तविक अर्थ तब पूरा होगा, जब विकास के साथ विवेक भी बढ़े, संपन्नता के साथ संवेदना बढ़े और अधिकारों के साथ कर्तव्यबोध भी मजबूत हो। यही वह स्थान है जहां विनोबा आज भी हमारे समकालीन बन जाते हैं। भूदान आज भूमि से आगे बढ़कर संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग का संदेश बन सकता है। ग्रामदान आज सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय विकास की प्रेरणा बन सकता है। सर्वोदय आज ‘सबका विकास’ को केवल नारे से आगे ले जाकर सामाजिक समरसता का आधार बन सकता है और अणुव्रत की चेतना आज सार्वजनिक जीवन में चरित्र, संयम और नैतिक अनुशासन की आवश्यकता को रेखांकित कर सकती है। विनोबा जयंती पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके जीवन को इतिहास की पुस्तक में बंद न करें, बल्कि नए भारत के चरित्र-निर्माण की परियोजना से जोड़ें। भारत को विकसित बनाने के लिए हमें केवल तेज गति से चलने वाली अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि सही दिशा में चलने वाला मनुष्य चाहिए। विनोबा की पदयात्रा का यही सबसे बड़ा संदेश है-राष्ट्र की यात्रा बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होती है।
भारत तभी सशक्त होगा जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्मान और अवसर पहुंचे। यह विचार महात्मा गांधी के ‘अंत्योदय’, विनोबा भावे के ‘सर्वोदय’ और दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ की पुनर्स्मृति कराता है। आधुनिक भारत की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि विकास के लाभ समाज के सभी तबकों तक समान रूप से नहीं पहुंचते। अमीर-गरीब की खाई बढ़ती जा रही है। यदि इस खाई को नहीं भरा गया, तो राष्ट्र की प्रगति अधूरी रह जाएगी। इस तरह विनोबा जाति की संकीर्ण दीवारों को तोडऋना चाहते थे, वे कहा करते थे “जाति का भेद मिटेगा तो समाज में भाईचारा और सहयोग की भावना पनपेगी।” वास्तव में जातिवाद केवल सामाजिक समस्या नहीं बल्कि मानसिकता का रोग है। जब तक समाज इसे स्वीकार करता रहेगा, तब तक सच्चा विकास संभव नहीं। विनोबा चरित्र क्रांति के साथ-साथ विचार-क्रांति के पुरोधा रहे। उनके द्वारा स्थापित सर्वोदय साहित्य भंडार तथा आचार्य तुलसी द्वारा स्थापित आदर्श साहित्य संघ जैसे संस्थानों ने नैतिक और प्रेरणादायक साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल ज्ञान का प्रसार नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और मानवीय मूल्यों का संवर्धन भी रहा है। वर्तमान समय में जब तकनीकी साधनों का विस्तार हुआ है, तब भी इन्हीं महापुरुषों के योगदान के कारण पुस्तकों की उपयोगिता और महत्ता में कोई कमी नहीं आई है।

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