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धौलपुर: धौलपुर का ऐतिहासिक नृसिंह बाग व मां राज राजेश्वरी मंदिर

धौलपुर: धौलपुर का ऐतिहासिक नृसिंह बाग व मां राज राजेश्वरी मंदिर

धौलपुर। कहते हैं कि धौलपुर की धरा पर भगवान कृष्ण के भी चरण पढे थे। महाभारत काल में भगवान स्वयं कालयवन राक्षस के पीछे-पीछे यहां आए थे। प्राचीन काल से ही धौलपुर जिला धर्मिक दृष्टि से समृद्ध रहा है। जिले भर में प्राचीन मंदिरों की बहुतायत है तथा आज भी ये मंदिर अपने गौरवशाली अतीत की हमें याद दिलाते रहते हैं। ऐसा ही एक मंदिर है जिला मुख्यालय के बीचों बीच नृसिंह बाग स्थित राजराजेश्वरी मंदिर। जिले के अधिकांश भक्तों तथा नई पीढी तक को तो ये भी नहीं पता है कि यहां भी कोई मंदिर है, जबकि संतर रोड से गड़रपुरा रोड पर शीघ्र पहुंचने के लिए लोग इसी रास्ते यानि महाराणा स्कूल से होकर आते जाते हैं। महाराणा स्कूल जिसे कि नृसिंह बाग के नाम से जाना जाता है, कई बीघा में समाहित है। चारों ओर परकोटे से घिरा यह बाग रियासत काल में धौलपुर के राजाओं द्वारा बनवाया गया। यह परिसर जिसमें कि राजराजेश्वरी मंदिर, मजार, नृसिंह मंदिर, ड्योढी के साथ एक विशाल हवेलीनुमा भवन आज भी हमें अपनी ओर आकर्षित कर देता है। इन भवनों के अलावा परिसर में कई बारहदरी भी थीं तथा पूरे नृसिंह बाग में सभी प्रकार के फूलों का प्लांटेशन था। पत्थरों के बीच नालियां पानी देने के लिए ही बनाई गई थी जिनका अस्तित्व आज भी देखा जा सकता है।

बुजुर्ग बताते है कि बाग के फूलों की खुशबू दूर-दूर तक फैला करती थी। बाग में कई फब्बारे भी थे। बाद में प्रशासन ने इस परिसर में कई कार्यालयों का निर्माण कराया। नृसिंह बाग में नृसिंह भगवान के मंदिर के पास ही मां राजराजेश्वरी का मंदिर स्थापित है जो कि प्रारम्भिक शिक्षा कार्यालय के बगल में है। जिले के बहुत ही कम लोगों को इस मंदिर के बारे में पता है। यह मंदिर रियासत काल में राजाओं की यज्ञशाला भी हुआ करती थी। यहां मां अपने अनौखे रूप में विराजमान है। मां दुर्गा की संगमरमर की मूर्ति अपने आप में अनूठी है। इस तरह को मूर्ति कम ही देखने को मिलती हैं। मां यहां शेर पर सवार है लेकिन वह एक तरफ बैठी हुई न होकर शेर की पीठ पर दोनों दिशाओं में पैर रख कर बैठी हुई है। रियासत काल में यहां खूब रौनक रहा करती थी। प्रत्येक त्योहार पर यहां कई कार्यक्रमों का आयोजन होता था। रियासत काल के बाद महाराजा हेमन्त सिंह इस मंदिर के पुजारी को पूजा के लिए प्रतिमाह कुछ राशि भेजते थे। यहां आकर मन को विशेष शान्ति का अनुभव होता है। भीड-भाड से दूर रहने वाले भक्तों को यह मंदिर खूब भाता है। इतिहास के जानकार मुकेश सूतैल बताते हैं कि मां राजराजेश्वरी जाट नरेशो की कुल देवी थी। रियासत काल में यह मंदिर राजाओं की यज्ञशाला थी।

यहां नवदुर्गाओं में विविध कार्यक्रमों का आयोजन धूमधाम से होता था। धौलपुर नरेश इन दिनों शतचण्डी यज्ञ कराते थे। इसके लिए देश भर से सैकडों विद्वान पण्डितों को नवदुर्गा स्थापना से तीन-चार दिन पहले धौलपुर बुलाकर परीक्षा ली जाती थीं तथा उन पण्डितों का चयन किया जाता था जो तांत्रोक्त शास्त्र से मां की नौ दिन तक आराधना किया करते थे। अंतिम दिन विशाल भण्डारा होता था जिसमें रियासत की समस्त जनता को निमंत्रित किया जाता था। धौलपुर नरेश उदयभान सिंह के शासनकाल में महाराज नवदुर्गाओं में प्रतिदिन पूजा-अर्चना करने आते थे तथा भण्डारे में स्वयं अपने हाथों भोजन परोसते थे। उनकी मेहमाननवाजी के किस्से आज भी याद किए जाते हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि जब पण्डित अपना भोजन खत्म करने को होते तो महाराज पंडितों से कहते थे कि अब जो भी एक लड्डू लेगा उसे 51 रूपएं तथा दो लड्डू लेने पर 251 रूपऐ मिलेंगें तो पण्डित जो पहले से ही महाराज की इस भावना से परिचित थे और इसी कारण भोजन भी कम करते थे और बाद में महाराज के हाथों कई लड्डू खाकर ईनाम ग्रहण करते। पुजारी बताते हैं कि रियासतकाल में महाराज ने उनके पूर्वज वंशी को इस मंदिर का जिम्मा सौंपा था तथा उसके बाद ईश्वरी प्रसाद ने यह जिम्मेदारी निभाई, उनकी मृत्यु के बाद पुजारी कन्हैया ने इस मंदिर की देखभाल की। लेकिन महंगाई के जमाने में अब यह जिम्मेवारी बहुत कठिन होती जा रही है। पुजारी बताते हैं कि रियासतकाल में तो यहां खूब धूमधाम रहती थी लेकिन अब यह मंदिर अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। वैसे देखा जाए तो यह मंदिर मां की आराधना करने वाले के लिए अनूठा है। यहां आकर भक्त अपने मन की बात मां को बताते हैं तो मां उनकी अदश्य सुनती है। भीड-भाड व कोलाहल से दूर होने के कारण यहां शान्ति से मां की आराधना की जा सकती है।

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