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40 दिन नहीं नहाए, 27 किलो वजन बढ़ाया

40 दिन नहीं नहाए, 27 किलो वजन बढ़ाया


1998 में आई फिल्म चाइना गेट में डाकू जगीरा के एक डायलॉग ने सिनेमाघरों में खूब तालियां बटोरी थीं। जगीरा बने मुकेश तिवारी की ये पहली फिल्म थी। सामने नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, अमरीश पुरी, परेश रावल, कुलभूषण खरबंदा और डैनी जैसे दिग्गज कलाकार थे और मुकेश एकदम नए। इतने दिग्गजों के सामने एक अकेला विलेन, लेकिन सब पर भारी।

ऐसी थी मुकेश तिवारी की फिल्मों में एंट्री। खूंखार विलेन के रोल से करियर की शुरुआत करने वाले मुकेश ने गोलमाल के वसूली भाई के रोल से अपनी एक अलग छवि बनाई। आज वो फिल्मों में स्थापित कलाकार हैं, लेकिन इस मुकाम तक की जर्नी काफी मुश्किल रही।

मुकेश ने जगीरा की भूमिका के लिए 27 किलो वजन बढ़ाया और 40 दिन बिना नहाए गुजारे। इस यादगार भूमिका के बाद भी सफर आसान नहीं था। एक साल तक उन्हें कोई दूसरा रोल नहीं मिला। फिर गंगाजल में बच्चा यादव की भूमिका ने इन्हें बड़ी पहचान दिलाई।

आज की स्ट्रगल स्टोरीज में एक्टर मुकेश तिवारी की कहानी, उन्हीं की जुबानी….।

बचपन का सफर कैसा रहा?
मेरा जन्म मध्य प्रदेश के सागर में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। पिता जी पेशे से ठेकेदार थे। घर पर कभी खाने-पीने की दिक्कत नहीं हुई, लेकिन कार में घूम सकें, इतनी हैसियत भी नहीं थी। कॉलेज तक मैं भी साइकिल से ही गया हूं। ये बहुत खुशनुमा दौर था।
उस वक्त कॉन्वेंट स्कूल का बहुत क्रेज था, घरवालों ने मेरा एडमिशन वहां करा दिया। घर का सबसे छोटा था इसलिए हर कोई चाहता था कि मेरी पढ़ाई अच्छे स्कूल से हो।

कॉन्वेंट स्कूल और घर के कल्चर में बहुत फर्क था। घर पर हम बुंदेलखंडी बोलते थे और स्कूल में इंग्लिश बोलना जरूरी होता था। इस अंतर की वजह से मैं स्कूल के माहौल में ढल नहीं पा रहा था। इसका असर मेरी तबीयत पर भी पड़ा, मैं बहुत बीमार पड़ गया। ये बात तब कि है जब मैं फर्स्ट या सेकेंड क्लास में था।

एक दिन ये सारी बातें अपनी मां को बताईं। उन्हें मेरी ये परेशान समझ में आई। फिर कॉन्वेंट स्कूल से निकालकर मेरा एडमिशन नगर पालिका के लाल स्कूल में करा दिया। यहां पर बैठने के लिए हम अपने साथ टाट पट्टी भी ले जाते थे, जिस पर बैठ कर पढ़ाई करते थे। हालांकि यहां का माहौल मेरे लिए सही था।

एक्टिंग से कब जुड़े?
क्लास 6 में मैं जब गवर्नमेंट स्कूल में था, तब यहां पर जिंदगी का पहला स्किट परफॉर्म किया था। इसे करने के दौरान मुझे लगा कि ये वो जरिया है कि जिससे मैं लोगों के सामने अपनी भावना को अच्छे से व्यक्त कर पा रहा हूं। हालांकि इसके बाद भी मन में ये ख्याल कहीं नहीं था कि इसी को मैं अपना करियर बनाऊंगा।

8वीं क्लास में मुझे हबीब तनवीर का नाटक देखने का मौका मिला। ये 2 घंटे का नाटक था, जिसमें 100 लोग शामिल थे। उसे देखकर मैं शॉक्ड रह गया। 2-3 दिन ढंग से सो नहीं पाया। एहसास हुआ कि इतनी भी खूबसूरत कोई चीज होती है। इस नाटक को देखने के बाद फैसला किया मैं भी अपना फ्यूचर इसी में बनाऊंगा।

लोगों का कहना था कि मैं डॉक्टर या इंजीनियर बनूं, लेकिन मुझे पता था कि एक्टिंग के अलावा मैं कुछ भी नहीं कर सकता। वजह ये भी थी कि मैं पढ़ाई में भी अच्छा नहीं था। सिर्फ इतनी पढ़ाई करता था कि पास हो सकूं।

कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि एक्टिंग का प्लान बनाने से पहले मुकेश का रुझान क्रिकेट की तरफ था और उन्होंने अंडर-12, अंडर-15 और अंडर-19 में क्रिकेट खेला था। जब मैंने उनसे ये सवाल किया तो उन्होंने कहा- ये सारी बातें बेबुनियाद हैं। बच्चों की तरह मैंने भी क्रिकेट खेला है, लेकिन अंडर-12 या 19 नहीं खेला है। तमाम न्यूज साइट पर छपी हुई ये खबर गलत है।

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