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डीडवाना : सरकार की अनदेखी से लुप्त होते जा रहे पशु मेले

डीडवाना : सरकार की अनदेखी से लुप्त होते जा रहे पशु मेले

  • धीरे-धीरे खत्म हो रही मेलों की रौनक  
  • हजारों लाखों की संख्या में आने वाली पशुओं की संख्या हुई दो से ढाई हजार 

डीडवाना। जिला मुख्यालय के नागौर रोड मेला मैदान में पशु प्रदर्शनी मेले का आयोजन चल रहा है,इस मेले का झंडारोहण 7 सितंबर को हुआ है,एव मेले का समापन 12 सितंबर को हो चुका है, पशु मेले में पशु बहुत ही कम संख्या में आ रहे हैं,पिछले कई सालों से धीरे-धीरे पशुओं की संख्या कम होती जा रही है,एक समय में नागोरी बेल प्रसिद्ध हुआ करते थे, इन नागोरी बैलों की बिक्री सबसे ज्यादा होती थी, यूपी बिहार एमपी हरियाणा के लोग यहां से नागोरी बेल खरीद कर ले जाते थे, वहां पर इनको खेती में उपयोग करते थे,लेकिन अब धीरे-धीरे यह प्रचलन खत्म होता सा जा रहा है,सरकार की सख्ती सरकार की बेरुखी के चलते यह मेले अब लुप्त होते जा रहे हैं,पुष्कर में राजस्थान का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है,पुष्कर के बाद में अगर बात की जाए तो परबतसर पावोलाव डीडवाना नागौर मेड़ता में भी पशु मेले लगते हैं,यह भी राजस्थान में काफी प्रसिद्ध पशु मेले हैं, अब लुप्त होने की कगार पर यह पशु मेंले आ चुके हैं,जिस तरह सरकार की बेरुखी इन मेलों के ऊपर ध्यान नहीं देना इन मेलों को खत्म होने के कगार पर ले जा रहा है।

लुप्त होती जा रही संस्कृति- राजस्थान में लगने वाले यह पशु प्रदर्शनी मिले आमजन के लिए आकर्षण का केंद्र तो रहे ही है,साथ ही ये पशु मेले किसानों पशुपालकों एवं ग्रामीण अर्थ व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण आयोजन होते हैं,इन पशु मेलों में स्थानीय उत्पादक, हस्तशिल्प कलाकार अपने उत्पादों की बिक्री इन मेलों के माध्यम से करते थे,स्थानीय संस्कृति, लोक कला को जीवंत यह मेल रखते थे,जो धीरे-धीरे यह लुप्त होने की कगार पर आ रहे हैं।

सरकार की बेरुखी प्रशासन की अनदेखी का शिकार हुए मिले- पूरे राजस्थान भर में पशु मेले लगते हैं,यह पशु मेले धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर आ चुके हैं,कहीं ना कहीं इनमें सरकार की अहम भूमिका है,साथ ही स्थानीय प्रशासन की भी पूरी भूमिका है,जिस तरह यह मेले लगते हैं,लेकिन इन मेलों में सुरक्षा के अभाव में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में यह मेला अब लुप्त होने की कगार पर आ चुके हैं,मेलों में धीरे-धीरे लोगों का आवागमन भी कम हो रहा है,साथ ही पशु भी मेले में बहुत ही कम संख्या में आ रहे हैं,ऐसा ही अगर रहा तो कुछ ही समय में यह मेले पूरी तरह से लुप्त हो जाएंगे।

देशभर में प्रसिद्ध रहे नागोरी बैल- जिस तरह पशु मेले की बात की जाए तो इन पशु मेले में विभिन्न प्रकार के पशु आते हैं ,उनकी खरीदी भी होती रहती है,लेकिन धीरे-धीरे यह खरीदी भी कम हो रही है,साथ ही पशु भी आने बहुत ही कम हो चुके हैं,देश भर की अगर बात की जाए,तो देशभर में नागोरी बैल काफी ज्यादा प्रसिद्ध थे, नागोरी बैल की बिक्री सबसे ज्यादा हुआ करती थी,नागौरी नस्ल के बैल नागौर जिले में ही पाए जाते हैं,नागौर जिले में लगने वाले विभिन्न पशु मेले में इनकी बिक्री हुआ करती थी,नागोरी बैल की बिक्री की बात की जाए तो एक लाख से अधिक की राशि से इनकी बिक्री आरंभ हुआ करती थी, तीन-तीन लाख रुपए तक इन बैलों की बिक्री होती थी, इन बैलों को खेती के कार्य में उपयोग हेतु यहां से खरीद कर ले जाया जाता था,हरियाणा पंजाब मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश बिहार जैसे राज्यों में इनको ले जाया जाता था,लेकिन धीरे-धीरे नागोरी बैलों का प्रचलन खत्म सा होता जा रहा है,कहीं ना कहीं इसमें सरकार स्थानीय प्रशासन की पूरी अहम भूमिका है,वही नागोरी बैलों को बेचकर कई किसान अपनी बेटियों की शादी भी किया करते थे,एवं अन्य पारिवारिक कार्यक्रमों को भी नागोरी बैलों को बेचकर पूरा किया जाता था,लेकिन धीरे-धीरे धीरे-धीरे करते यह पूरे मेले लुप्त हो रहे हैं,नागोरी बैलों की भी बिक्री अब खत्म सी होती जा रही है,इतना ही नहीं अब पशुओं का आवागमन भी मेलों में कम हो चुका है। बैलों की बिक्री कम होने का मुख्य कारण*राजस्थान में लगने वाले पशु प्रदर्शनी मेमें में पशुओं की खरीददारी हुआ करती थी,जिनमें विभिन्न प्रकार के पशु इन मेलों में आते थे,जिनकी खरीददारी होती थी,वही नागौरी नस्ल के बैलों की भी खरीदारी हुआ करती थी,लेकिन सरकार के द्वारा राजस्थान में एक सिस्टम बनाया गया,इस सिस्टम के तहत राजस्थान से बाहर जाने वाले पशुओं पर रोक लगा दी गई, जिसके बाद से इन बैलों की बिक्री कम हो गई,साथ ही इस रोक के चलते राजस्थान से बाहर जाने वाले पशुओं को भी बॉर्डर पार नहीं करने दिया जाता है,जिसकी वजह से धीरे-धीरे यह मेले लुप्त हो रहे हैं, पशुओं की बिक्री भी खत्म होती जा रही है, नागौरी नस्ल के बैलों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है। डीडवाना में लगे पशु प्रदर्शनी मेले की बात की जाए तो यहां धीरे-धीरे पशुओं का आना कम हो चुका है,साल 2023 की बात की जाए,तो साल 2023 में मेले में 3840 पशु आए,जिनमें 2063 बैल 1053 ऊंट 430 ऊंटनी 289 पाडा 5 घोड़े आए,साल 2024 में 1686 ही पशु इस मेले में आए,इसी तरह साल 2025 में 2188 पशु मेले में आए जिनमें 119 बैल 23 घोड़ा घोड़ी 853 ऊंट 701 ऊंटनी 492 पाडा आए। इस मेले में इस बार बेलों की सबसे कम संख्या रही,वहीं ऊंट ऊंटनी की संख्या सबसे ज्यादा रही है।

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