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डॉ. आंबेडकर जयंती : लोग मुझे याद करेंगे, मेरे मरने के बाद

डॉ. आंबेडकर जयंती : लोग मुझे याद करेंगे, मेरे मरने के बाद

बाल मुकुन्द ओझा
आज 14 अप्रैल को पूरा देश डॉ भीम राव आंबेडकर की 135 वीं जयंती मना रहा है। देश में आज सर्वाधिक चर्चा बाबा साहेब आम्बेडकर की हो रही है। जब भी डॉ. आंबेडकर की जयंती आती है, समाजवादी चिंतक डॉ राम मनोहर लोहिया का यह कथन मन-मस्तिष्क में घूमने लगता है कि, ''लोग मुझे याद करेंगे लेकिन मेरे मरने के बाद’’। आज के सन्दर्भ में बात करें तो लोहिया का यह कथन बाबा साहेब पर सौ प्रतिशत सटीक बैठता है।
दलितों के मसीहा माने जाने वाले डॉ भीमराव आंबेडकर आजकल सियासी संग्राम के सबसे चर्चित केंद्र बिंदु बने हुए है। जिसे देखो वह बाबा साहेब का सबसे बड़ा भक्त और अनुयायी होने का दावा कर रहा है। विशेषकर देश में लोकसभा अथवा किसी भी राज्य में विधानसभा चुनाव आते ही सियासी पार्टियां आंबेडकर को केंद्र बिंदु में रखकर अपना चुनावी अभियान संचालित कर रही है। सियासी पार्टियों की नज़र एक मुश्त दलित वोटों पर रहती है। आजकल सियासत में डॉ आंबेडकर का नाम लेना एक फैशन हो गया है। भीमराव आंबेडकर को लोग भारत के संविधान का निर्माता के रूप में जानते है मगर आंबेडकर का जयकारा लगाने वाले बहुत से लोग यह नहीं जानते है कि 1952 में हुए देश के पहले लोकसभा चुनाव में वे बुरी तरह हार गए थे। यही नहीं कांग्रेस ने 1954 में भंडारा लोकसभा के लिए हुए उपचुनाव में भी आंबेडकर को एक बार फिर हराया। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जीते जी डॉ आंबेडकर की बात लोगों ने नहीं सुनी थी और आज जिसे देखो वह उनके आदर्शों पर चलने की बात कह रहा है। आश्चर्य की बात तो यह है इनमें वो लोग और पार्टी भी शामिल है जिन्होंने लोकसभा में जाने से आंबेडकर को रोक दिया था। आज के दिन हमें उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर चर्चा और मंथन के साथ उनके विचारों और आदर्शों को सही मायने में अंगीकृत करने की जरुरत है।
आंबेडकर नेहरू के प्रधानमंत्रित्व में बनी देश की पहली अंतरिम सरकार में कानून मंत्री थे। कांग्रेस से मतभेद के चलते 27 सितंबर, 1951 को उन्होंने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। विडंबना तो यह है उनको हराने वालों में कांग्रेस पार्टी मुख्य थी जो आज बात बात में डॉ आंबेडकर का नाम जपने से नहीं थकती। यही नहीं रजनीतिक नेताओं को सिर्फ चुनाव के वक्त ही डॉ अंबेडकर की याद क्यों आती है। आंबेडकर को 29 अगस्त, 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। उनकी अध्यक्षता में दो वर्ष, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ। आंबेडकर को भारतीय संविधान का शिल्पकार कहा जाता है। करोड़ों शोषितों, वंचितों दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को सम्मानीय जीवन देने के लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा। वे नौ भाषाओं के जानकार थे। इन्हें देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां मिली थीं। इनके पास कुल 32 डिग्रियां थीं। 1990 में, उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था।
बाबा साहेब आंबेडकर के नाम से मशहूर डॉ भीमराव अंबेडकर भारत ही नहीं अपितु विश्व के प्रमुख नेता, विचारक, शिक्षाविद और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाने जाते है। गाँधी की आलोचना के बावजूद वे गाँधी को प्रिय थे। अंबेडकर महात्मा गाँधी के सच्चे अनुयायी थे। डॉ अंबेडकर ने समाज से छुआछूत को मिटाने के लिया सतत संघर्ष किया जिसका परिणाम है की समाज में समरसता का सन्देश गया। भीमराव आंबेडकर जयंती के मनाने के पीछे मूल कारण लोगो में समानता के अधिकारों का विकास हो और सबका साथ सबका विकास हो। आंबेडकर के कार्यो से प्रभावित होकर अब संयुक्त राष्ट्र में भी इनकी जयंती मनाया जाने लगा है। संयुक्त राष्ट्र ने भीमराव आंबेडकर को विश्व का प्रणेता कहकर उनके सम्मान में संबोधित किया है जो की हर भारतियों के लिए एक गर्व की बात है। मगर आज उनकी यह प्रेरणा कुछ खास वर्ग तक सीमित हो कर रह गई है।
बाद के दिनों में आंबेडकर कांग्रेस से अलग हो कर अपनी राजनैतिक पार्टी बनाई मगर उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद देश का एक बड़ा वर्ग आंबेडकर से बेहद प्रभावित है और उन्हें देश को जोड़ने वाले प्रखर सेनानी के रूप में मानता है। आंबेडकर जयंती पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी की हम उनके बताये मार्ग पर चलने का संकल्प लेकर देश में सच्चे अर्थों में समता और समानता का संदेश घर घर घर पहुंचाकर देश को सामाजिक और आर्थिक रूप से सुढ़ृड़ बनायें।

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