ई-कचरा : आधुनिक युग की एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती
-सुनील कुमार महला
आज विज्ञान और तकनीक का युग है। विज्ञान और तकनीक के इस दौर में मोबाइल फोन, कंप्यूटर, लैपटॉप, टेलीविजन, चार्जर, बैटरी, प्रिंटर और अन्य विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन जब ये उपकरण पुराने हो जाते हैं या काम करना बंद कर देते हैं, तो इनसे ई-कचरा पैदा होता है। गौरतलब है कि खराब मोबाइल फोन के अलावा पुराने ईयरफोन, यूएसबी केबल, रिमोट, खिलौने, छोटे पंखे और बिजली से चलने वाले अन्य उपकरण भी ई-कचरे में शामिल हैं। आज धरती पर ई-कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है और यह पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी समस्या बन गया है। कहना ग़लत नहीं होगा कि यदि इन उपकरणों का समय पर सही तरीके से निपटान नहीं किया जाए, तो ये मिट्टी, पानी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं। बहरहाल, पाठकों को बताता चलूं कि पुराने और बेकार इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के सुरक्षित निपटान, पुनर्चक्रण और पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए हर साल 14 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय ई-कचरा दिवस मनाया जाता है। वास्तव में, इस दिवस को मनाने के पीछे का मुख्य उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि पुराने मोबाइल, छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, केबल और बैटरी को सामान्य कूड़े में फेंकने के बजाय उचित संग्रह केंद्रों तक पहुँचाना चाहिए, ताकि उनका सुरक्षित पुनर्चक्रण किया जा सके। इस दिवस की शुरुआत वर्ष 2018 में हुई थी। इसकी शुरुआत अपशिष्ट विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरण फोरम ने की थी। वास्तव में, यह एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है, जो विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक कचरे के उचित प्रबंधन और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस संगठन की स्थापना वर्ष 2002 में बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में हुई थी।
हाल फिलहाल, इसमें कोई संदेह या दोराय नहीं है कि विज्ञान और तकनीक ने हमारे जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इनसे जुड़े उपकरणों का गलत तरीके से निपटान पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या बन सकता है। इलेक्ट्रॉनिक कचरे में सीसा और पारा जैसे हानिकारक पदार्थ हो सकते हैं, जो मिट्टी और पानी को दूषित कर सकते हैं। दूसरी ओर, इसी कचरे में सोना, तांबा और एल्युमीनियम जैसी कीमती धातुएँ तथा कई उपयोगी पदार्थ भी पाए जाते हैं, लेकिन इन पदार्थों को पुनर्चक्रण के माध्यम से दोबारा प्राप्त किया जा सकता है। इससे जहां एक ओर प्राकृतिक संसाधनों की बचत होती है, वहीं पर नए कच्चे माल(रा-मैटिरियल) की आवश्यकता कम होती है। ई-कचरे को खुले में जलाने या असुरक्षित तरीके से तोड़ने से पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचता है। इसलिए देश के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को अधिकृत संग्रह केंद्रों या पंजीकृत पुनर्चक्रणकर्ताओं तक पहुँचाए और मनुष्यों, अन्य जीवों तथा प्रकृति के स्वास्थ्य की रक्षा में योगदान दे।
ई-कचरे की स्थिति:- विश्व और भारत-
संयुक्त राष्ट्र की ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर रिपोर्ट-2024 के अनुसार, वर्ष 2022 में दुनिया भर में लगभग 62 मिलियन टन यानी 6.2 करोड़ टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ। वैश्विक स्तर पर प्रति व्यक्ति औसतन 7.8 किलोग्राम ई-कचरा पैदा हुआ। चिंताजनक बात यह है कि कुल ई-कचरे में से केवल 22.3 प्रतिशत का ही औपचारिक रूप से संग्रह और पुनर्चक्रण किया गया। शेष लगभग 77.7 प्रतिशत ई-कचरे का उचित प्रबंधन नहीं हो सका और उसका बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्रों या कचरा भराव स्थलों तक पहुँच गया। इतना ही नहीं, आज हमारा देश भारत भी ई-कचरे की समस्या से गंभीर रूप से प्रभावित है। दुनिया में चीन और अमेरिका के बाद भारत को ई-कचरा उत्पन्न करने वाले प्रमुख देशों में तीसरे स्थान पर बताया जाता है। भारत में ई-कचरे की मात्रा के संबंध में लगभग 4.5 मिलियन टन यानी 45 लाख टन प्रतिवर्ष का आँकड़ा सामने आया है। उल्लेखनीय है कि हमारे देश में ई-कचरे का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले कबाड़ी और अन्य लोगों द्वारा संसाधित किया जाता है। उपलब्ध अनुमानों में यह हिस्सा लगभग 80 से 90 प्रतिशत तक बताया गया है। इस काम में सुरक्षा के उचित उपाय नहीं अपनाए जाने पर काम करने वाले लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है। ई-कचरे की बढ़ती मात्रा इस समस्या को और गंभीर बना रही है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2010 से 2022 के बीच ई-कचरे में हुई वृद्धि की दर उसके औपचारिक संग्रह और पुनर्चक्रण की वृद्धि दर से लगभग पाँच गुना अधिक रही। ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर-2024 के अनुमान के अनुसार, यदि यही स्थिति बनी रही, तो वर्ष 2030 तक दुनिया में ई-कचरे की मात्रा बढ़कर लगभग 82 मिलियन टन यानी 8.2 करोड़ टन प्रतिवर्ष हो सकती है।
ई-कचरा कम करने के लिए क्या करें?
भारत जैसे तेजी से डिजिटल होते देश में मोबाइल फोन, कंप्यूटर, घरेलू उपकरणों और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। इसलिए ई-कचरे को केवल सफाई की समस्या मानना उचित नहीं है। यह पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों की बचत, जनस्वास्थ्य और जिम्मेदारी के साथ उपभोग करने से जुड़ा विषय है। वास्तव में, ई-कचरे को कम करने के लिए हमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल सोच-समझकर करना चाहिए। मोबाइल फोन, लैपटॉप या अन्य उपकरणों में छोटी-मोटी खराबी आने पर उन्हें फेंकने के बजाय उनकी मरम्मत करानी चाहिए। केवल नया मॉडल आने या फैशन के कारण पुराने उपकरणों को बदलने से बचना चाहिए। पुराने मोबाइल, चार्जर, बैटरी, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं को सामान्य कूड़े में डालने के बजाय अधिकृत ई-कचरा संग्रह केंद्रों या संबंधित निर्माता की वापसी योजना के माध्यम से पुनर्चक्रण के लिए देना चाहिए।यदि कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अभी भी इस्तेमाल करने योग्य है, तो उसे जरूरतमंद व्यक्ति को देकर या दान करके उसका उपयोगी जीवन बढ़ाया जा सकता है। नए इलेक्ट्रॉनिक सामान की खरीदारी करते समय उसकी गुणवत्ता, टिकाऊपन और मरम्मत कराने की सुविधा का ध्यान रखना चाहिए। पुनर्चक्रण के लिए मोबाइल, कंप्यूटर या अन्य उपकरण देने से पहले उनमें मौजूद निजी जानकारी को सुरक्षित तरीके से मिटाना भी आवश्यक है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि ई-कचरे की समस्या का समाधान केवल सरकार या पुनर्चक्रण केंद्रों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें प्रत्येक नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण है। हमें कम खरीदने, उपकरणों का लंबे समय तक उपयोग करने, खराब होने पर उनकी मरम्मत कराने और बेकार होने पर उचित पुनर्चक्रण अपनाने की आदत डालनी होगी। हमारी छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ पर्यावरण को सुरक्षित रखने, प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ धरती देने में बड़ा योगदान दे सकती हैं। वास्तव में, हमें जरूरत के अनुसार कम से कम इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदना चाहिए, उन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल करना चाहिए, खराब होने पर मरम्मत करानी चाहिए और बेकार होने पर सही तरीके से उनका पुनर्चक्रण करना चाहिए।