कम उम्र में लड़कियों की शादी – असम सरकार के मॉडल का देशव्यापी जरुरत
भारतीय राजनीति अपनी स्थापना के समय से ही इतने गूढ़ तरीके से उलझी रही है कि किसी भी सरकार के लिए समाज सुधार वाले निर्णय लेना आसान नहीं रहा है। जाति, मजहब की दीवारें अक्सर इन निर्णयों को ऐसी खाई में धकेल देती हैं कि उनके पुनर्जन्म की कोई गुंजाइश नहीं रहती। लीग से हटकर चलना भारतीय राजनीति में एक चुनौती की तरह है, जिससे राजनेता बचते आए हैं या ऐसा करके अपनी सत्ता बचाते आए हैं। हालांकि इस स्थिति में साल 2014 के बाद से कुछ बदलाव की आहट गाहे-बगाहे कानों में गूंजती रही है। कुछ समय से इस मामले के केंद्र में हैं असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा।
मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा का नाम असम बाल विवाह के खिलाफ सख्त एक्शन लेने के लिए एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। पुलिस ने यहां बाल विवाह करने वालों के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है। असम पुलिस ने इस बार बाल विवाह करने वाले 1000 लोगों को एक साथ गिरफ्तार किया है। सीमावर्ती राज्य असम में मुख्यमंत्री हिमंता विस्वा सरमा की खास पहल पर राज्य की पुलिस बाल विवाह रोकथाम अधिनियम के तहत बाल विवाह करने वालों के खिलाफ सख्त एक्शन ले रही है।
सोशल मीडिया साइट एक्स पर हिमंता सरमा लिखते है कि बाल विवाह के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई में असम पुलिस ने एक विशेष अभियान में 1000 से अधिक आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जो सुबह के शुरुआती घंटों में शुरू हुआ है। उनके अनुसार सामाजिक खतरे से संबंधित मामलों में गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ने की संभावना है क्योंकि ऑपरेशन अभी भी जारी है। 11 सितंबर को, सरमा ने असम विधानसभा को बताया था कि पिछले पांच वर्षों में बाल विवाह से संबंधित मामलों में कुल 3,907 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें से 3,319 यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम, 2012 (POCSO) के तहत आरोपी बनाए गये हैं।
गौरतलब है कि इसी साल के फरवरी महीने में बाल विवाह के खिलाफ व्यापक मुहिम के तहत असम में 1,800 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। राज्य मंत्रिमंडल ने 23 जनवरी को यह फैसला किया था कि बाल विवाह के दोषियों को गिरफ्तार किया जाएगा और साथ ही व्यापक जागरूकता अभियान भी चलाया जाएगा। इस घोषणा के एक पखवाड़े से भी कम समय में पुलिस ने बाल विवाह के 4,004 मामले दर्ज किए थे। राज्य के विभिन्न हिस्सों में गिरफ्तारियां की गई थीं, जिनमें 136 गिरफ्तारियां धुबरी में हुई हुई थीं, जहां सबसे अधिक 370 मामले दर्ज हुए थे। इसके बाद बारपेटा में 110 और नागांव में 100 गिरफ्तारियां हुई थीं।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने लोगों से ‘‘इस कुरीति से मुक्ति’’ के लिए सहयोग एवं समर्थन की अपील की थी। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार, असम में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर सर्वाधिक है और बाल विवाह इसका प्रमुख कारण रहा है। राज्य में दर्ज विवाह में से 31 प्रतिशत मामले निषिद्ध आयुवर्ग के हैं।
असम सरकार ने यह कदम क्यों उठा रही है? इसे समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर नजर डालना बेहद अहम है। बीते साल मई माह में आई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) की रिपोर्ट के अनुसार- असम में 20 से 24 वर्ष की उम्र की 31 प्रतिशत से ज्यादा ऐसी महिलाएं हैं जिनकी शादी 18 वर्ष की उम्र से पहले ही कर दी गई।
वहीं, इस मामले में राष्ट्रीय औसत तकरीबन 23 प्रतिशत है। असम में 11।7 फीसदी लड़कियां कम उम्र में गर्भवती हो रही हैं। यह आंकड़े बड़ी संख्या में होने वाले बाल विवाह का जीते-जागते गवाह हैं। राज्य के सीमावर्ती जिले धुबड़ी में आंकड़ा और भी भयावह है, जहां 50 फीसदी शादियां कम उम्र में हो रही हैं। ऐसे में लड़कियां कम उम्र में मां बनने को मजबूर हैं। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया की ओर से 2022 में जारी आंकड़ों के अनुसार असम, देश में सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु दर वाला राज्य है, जबकि शिश मृत्यु दर के मामले में यह तीसरे नंबर पर है।
दरअसल राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक, असम में मातृ और शिशु मृत्यु दर की उच्च दर है, बाल विवाह इसकी सबसे अहम वजह में गिनी जाती है क्योंकि राज्य में रजिस्टर्ड मैरिज में औसतन 31 फीसदी शादी के लिए प्रतिबंधित उम्र में रजिस्टर्ड हैं। वहां के डीजीपी के अनुसार अपने कम उम्र के बच्चों की शादी करने वाले परिवारों के सदस्यों के अलावा, पुलिस 'पुरोहितों' और 'काजियों' को गिरफ्तार कर रही है , जिन्होंने धार्मिक संस्थानों में इस तरह की शादी की रस्में निभाईं।उन्होंने कहा कि गिरफ्तारियां परिवार के सदस्यों, बाल कल्याण समिति, स्थानीय लोगों और पुलिस कर्मियों से मिली जानकारी के सत्यापन के बाद की गई हैं। सिंह ने कहा, 'हम कानून के अनुसार काम करेंगे, उचित जांच करेंगे और चार्जशीट दाखिल करेंगे।'वैसे बाल विवाह रोकने के लिए देश में बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 लागू है, जिसे 2007 में लागू किया गया था। इस कानून के अनुसार, शादी की उम्र लड़कों के लिए 21 और लड़कियों के लिए 18 तय की गई है। कानून का उल्लंघन करने के लिए दो वर्ष सश्रम कारावास और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है।
वहीं महिलाओं को यह रियायत है कि दोषी पाए जाने पर भी उन्हें जेल नहीं होगी। पुराने कानून में जमानत मिलने की संभावना रहती है। पॉक्सो एक्ट जुड़ने से ऐसा नहीं हो पाएगा।इस बीच दरअसल मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 28 जनवरी को पहले ही कहा था कि अगले 5-6 महीनों में हजारों पतियों को गिरफ्तार किया जाएगा क्योंकि 14 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध बनाना अपराध है, भले ही वह कानूनी तौर से विवाहित पति ही क्यों न हो। कई (लड़कियों से शादी करने वाले पुरुष) को आजीवन कारावास हो सकती है।'
हाल ही में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट सामने आई थी जिसमें कहा गया था कि मातृ और शिशु मृत्यु दर बहुत अधिक है। इसकी एक प्रमुख वजह बाल विवाह है। इसके बाद राज्य सरकार ने बाल विवाह करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था और पुलिस को प्रथा के खिलाफ अभियान चलाने के लिए भी कहा गया था।दरअसल 14 से ज्यादा और 18 साल से कम उम्र की लड़की से शादी करने पर बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के तहत कार्रवाई की जाएगी।
असम सरकार ने बाल विवाह रोकने के लिए सभी 2,197 ग्राम पंचायत सचिवों को बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत बाल विवाह रोकथाम अधिकारी के रूप में नामित किया है। ये अधिकारी ही पॉक्सो एक्ट के उन मामलों में शिकायत दर्ज कराएंगे, जहां लड़की की उम्र 14 साल से कम है।अगर आंकड़ों के आईने में देखें तो असम सरकार का फैसला स्वागतयोग्य प्रतीत होता है। कुछ समाजसेवी संगठनों ने भी इसे सराहा है। हालांकि दूसरी तरफ एक तबका ऐसा भी है जो इस फैसले को संदेहास्पद दृष्टि से देख रहा है। राज्य के कुछ हिस्सों में इस फैसले के खिलाफ लोग धरना-प्रदर्शन में भी जुट गए हैं। इन्हें आशंका है कि मुस्लिमों को परेशान करने के लिए इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है।
दरअसल, मुस्लिम समुदाय में बाल विवाह का प्रचलन अधिक है। हालांकि मुस्लिमों को वोट बैंक के रूप में देखने वाले राजनीतिक दल इस तथ्य को सिरे से नकार देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करने से उनका वोट बैंक उनसे छिटक जाएगा और सत्ता की चाबी उनसे दूर हो जाएगी। असम में फैसले के विरोध के पीछे भी यही राजनीतिक कारण है।यह देश का दुर्भाग्य है कि कई बार ऐसे फैसलों का भी विरोध किया जाने लगता है जो कि समाज के हित में हों।
अधिकांश मामलों में राजनीतिक नफा-नुकसान देखकर पार्टियां बेवजह विरोध में उतर आती हैं, जबकि इस फैसले के देशहित में दूरगामी परिणाम होंगे। गौरतलब है कि यहां पर बीते साल हुए एक देशव्यापी आंदोलन का जिक्र करना लाजिमी है। इस आंदोलन का नाम था ‘बाल विवाह मुक्त भारत’। नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने इस आंदोलन की शुरुआत 16 अक्टूबर, 2022 को की थी। देशभर के करीब 500 जिलों में 70,000 से ज्यादा महिलाओं ने बाल विवाह के विरोध में मशाल जुलूस निकाला था।
महिलाओं की इतनी बड़ी हिस्सेदारी इस बात का सुबूत है कि बाल विवाह के दुष्परिणामों से देश चिंतित है।आंदोलन से देशभर में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से दो करोड़ से ज्यादा लोग जुड़े थे। जो लोग यह मानते हैं कि देश में बाल विवाह कोई समस्या नहीं है और बहुत ही छोटे स्तर पर या कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में ही बाल विवाह होता है, उनके लिए ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ आंदोलन को जानना जरूरी है।
जरूरत है कि असम सरकार के फैसले को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाए और बाल विवाह की बुराई को खत्म करने के लिए सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चला जाए। सरकार किसी विशेष राजनीतिक दल की हो सकती है लेकिन बेटियां तो हमारी हैं। आखिर एक बेटी से कैसे उसका भविष्य छीना जा सकता है? कैसे उनके सपनों की उड़ान को रोका जा सकता है। यदि बेटियों का कम उम्र विवाह नहीं होगा तो वे भी उच्च शिक्षा हासिल कर सकती हैं, रोजगार हासिल कर सकती हैं, रोजगार दे सकती हैं।
इस तरह से वे देश की आर्थिक प्रगति में अपना अमूल्य योगदान दे सकती हैं। पढ़ी-लिखी और सशक्त बेटियों से आने वाली पूरी पीढ़ी की तकदीर बदल जाएगी। इसलिए असम सरकार के फैसले का समर्थन करना ही न्यायोचित है। साथ ही अन्य राज्य सरकारों को भी हेमंत बिस्वा सरमा के फैसले से सीख लेनी चाहिए और बाल विवाह जैसी बुराई के अंत के लिए कदम उठाना चाहिए।
ध्यान देने योग्य बात है कि असम से पहले कर्नाटक में भी भाजपा सरकार ने सख्त कानूनी प्रावधान के जरिये बाल विवाह पर अंकुश लगाया है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का कहना है कि कर्नाटक सरकार ने राज्यव्यापी अभियान चला कर 11 हजार से ज्यादा बाल विवाह रोके थे और 10 हजार से ज्यादा बाल विवाह जोड़ों को पकड़ा था । उनका मानना है कि असम में भी राज्यव्यापी अभियान का बड़ा असर होगा। दरअसल राज्यव्यापी अभियान की जरुरत है । अभी तक केवल भाजपा शासित राज्यों में अभियान चला है जबकि अन्य राज्यों की सरकारें खामोश हैं।