फर्जी एनकाउंटर न्याय प्रणाली की विफलता है !
कुख्यात माफिया सरगना अतीक अहमद के बेटे असद और शूटर गुलाम के झांसी में उत्तर प्रदेश एसटीएफ के साथ मुठभेड़ में मारे जाने का समाचार आश्चर्यजनक नहीं है। पिछले दिनों खुद अतीक अहमद को एनकाउंटर में मार दिए जाने की आशंका जताई जा रही थी, ऐसी ही आशंका खुद अतीक अहमद ने भी व्यक्त की थी।
संदेहास्पद परिस्थितियों में घटित इस घटना को कुछ लोग फर्जी एनकाउंटर बता रहे हैं, यदि सचमुच यह फर्जी एनकाउंटर है तो संवैधानिक एवं न्यायिक नजरिए से यह अनुचित है तथा अपराध की श्रेणी में आता है।
आश्चर्य की बात है कि कथित फर्जी मुठभेड़ में मारे गए अतीक अहमद के बेटे असद और शूटर गुलाम के प्रति जनसामान्य में न तो कोई आक्रोश है और ना कोई हमदर्दी बल्कि जनमानस इस एनकाउंटर को लेकर प्रसन्न और संतुष्ट नजर आ रहा है। वस्तुतः गुंडा तत्वों की गुंडागर्दी आतंक से आमजन बेहद भयाक्रांत था। इसके अलावा ऐसे अपराधियों को पकड़ कर उन पर मुक़दमा चलाना ट्रायल के बाद बिना सजा पाये इनका बेदाग छूट उठ जाना आम आदमी के भरोसे को न्याय प्रणाली से कम क्रिया है। हाल ही में जयपुर बम ब्लास्ट, जिसमें 71 निर्दोष व्यक्ति मारे गए थे, उसके आरोपियों को राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा रिहा किया जाना एक मिसाल है। इससे हमारी न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठते हैं, जिसमें दशकों गुजर जाने पर भी हत्यारों को सजा नहीं मिल पाती व उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया जाता है। यह स्थितियां कथित फर्जी एनकाउंटर को जनमानस की नजरों में जायज ठहराती है और पुलिस और सुरक्षा बलों को कानून अपने हाथ में लेकर इंसाफ करने की मनोवृति को मान्यता प्रदान करती है। ऐसे कथित फर्जी एनकाउंटर न्याय प्रणाली के बारीक सूरखों को रेखांकित करते हैं जिसमें छनकर खूंखार अपराधी सजा पाए बिना छूट जाते हैं। वास्तव में हमारा इंसाफ करने का नाकारा सिस्टम नकली एनकाउंटर और कानून हाथ में लेने की प्रवृत्ति को एक प्रकार की जन स्वीकृति दिलाता है और यही हमारी न्याय व्यवस्था की वास्तविक विफलता है।
-कैलाश जैन