सरकारी खरीद नहीं होने से किसान हो रहे हैं परेशान
लक्ष्मणगढ़ । धरतीपुत्र की उपज की सरकारी खरीद अभी तक शुरू नहीं होने से कृषक वर्ग काफी परेशान है ।
किसानों को पहले बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने मारा और अब सरकारी तंत्र कर रहा है नुकसान एमएसपी से कम दाम पर व्यापारियों को गेहूं बेचने के लिए मजबूर हैं किसान। 15 अप्रैल को अनाज मंडी में हर तरफ खुले में रखे गए गेहूं को देखा तो पहले यहां के हालात को समझने की कोशिश की पता चला कि गेहूं की सरकारी खरीद ही नहीं हो रही है, जिसकी वजह से इतना अनाज खुले में पड़ा हुआ है। किसान अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मंडी में फसल बेचने को मजबूर है ।पल-पल बदलते मौसम के समय ऐसी स्थिति किसानों के लिए बहुत चिंताजनक है। क्योंकि, पहले से भीगे गेहूं पर अगर फिर बारिश पड़ी हो नुकसान का अंदाजा लगाना मुश्किल होगा।
राज्य सरकार द्वारा एक अप्रैल से एमएसपी पर खरीद शुरू करने का कार्य शुरू हो जाता है। लेकिन, 15 दिन बीतने के बाद भी ग्राउंड पर खरीद नहीं शुरू हो सकी है। बहरहाल कुछ जगहों पर नमी की वजह से गेहूं खरीद न होने की खबर सुनी थी। एमएसपी पर गेहूं खरीद के लिए 12 फीसदी तक नमी मान्य होती है।
ऐसे में यह बात तो खारिज हो जाती है कि नमी ज्यादा होने की वजह से खरीद बंद है। यहां पर एमएसपी पर बेचने के लिए ट्रॉलियों से लगातार गेहूं लाया जारहा है। लेकिन अनाज खरीद केंद्र शुरू नहीं होने से धरतीपुत्र किसान को मजबूरी में अनाज की बिक्री मंडी में करनी पड़ रही है।
इसका मतलब यह है कि जहां पर खरीद का विकल्प नहीं है वहां पर किसानों को एमएसपी से ऊपर दाम मिलने की बात छोड़िए एमएसपी भी नहीं मिल रहा है। केंद्र सरकार ने नई फसल आने से ठीक पहले ओपन मार्केट सेल स्कीम के तहत रियायती भाव पर गेहूं बेचकर उनका नुकसान किया फिर बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि और अब गुणवत्ता को लेकर खरीद के नॉर्म्स बदलने के नाम पर उनका नुकसान हो रहा है।
एक किसान ने कहा कि पैसे की मजबूरी में काफी किसानों ने 2020से2075 रुपये प्रति क्विंटल पर अपना गेहूं व्यापारियों को बेचा है। किसानों को घरेलू आवश्यकता एवं अगली फसल के लिए पैसे चाहिए 15 दिन निकल गए है। लेकिन सरकारी खरीद नहीं हुई इसलिए व्यापारियों को गेहूं बेचने वाले किसानों को सीधे तौर पर नुकसान हो रहा है। अब तो गेहूं में नमी भी ज्यादा नहीं है फिर खरीद क्यों नहीं शुरू हो रही है यह बड़ा सवाल है। अनाज को सुरक्षित रखना किसानों के लिए बड़ी चुनौती है।
ऐसा बताया जा रहा है कि अधिकारियों की वजह से देर हो रही है । उन्हें न किसानों से मतलब है और न आढ़तियों से...उन्हें तो सिर्फ अपनी सैलरी से मतलब है।