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इधर चला मैं उधर चला

इधर चला मैं उधर चला

सुबह सुबह नेता रामलुभाया जी के घर पर रेडियो पर गाना बज रहा है-'इधर चला मैं उधर चला,जाने कहाँ मैं किधर चला,इधर चला मैं उधर चला,जाने कहाँ मैं किधर चला,अरे फिसल गया,ये तूने क्या किया...!' रामलुभाया जी गाना सुनकर बड़े ही आनंद व हर्ष की अनुभूति महसूस कर रहे हैं। गाना सुनते सुनते ही उन्होंने अपने नौकर झंडुलाल से कहा-'ये गीतकारों, संगीतकारों को भी राजनीति का कितना बड़ा अनुभव रहा होता है। कितना सटीक व सुंदर गाया है। लिरिक्स बड़े जोरदार हैं और हम राजनेताओं पर फिट बैठते हैं, क्योंकि हम राजनीतिज्ञ कभी इधर तो कभी उधर आते जाते रहते हैं न ! खैर, जो भी हो उधर संगीतकार, गीतकार 'इधर चला, उधर चला' गाकर और लिखकर प्रसिद्ध हो रहे हैं और इधर राजनेता कभी इस पार्टी में तो कभी उस पार्टी में शामिल हो कर प्रसिद्ध हो रहे हैं। वाकई इस गाने में राजनीति का फलसफा छिपा है।' तभी दूसरे नौकर ने रामलुभाया जी को चाय लाकर दी। रामलुभाया जी ने चाय की चुस्कियां लेते हुए अपने नौकर झंडुराम से कहा-'आज सत्तापत्तियों के साथ जुड़ने में ही राजनीतिक भविष्य है। सत्तापत्तियों के साथ जुड़कर लोकतंत्र को दीमक की भांति चाट लो। पांच साल में जो भी बने फिर जिंदगी भर उसके ठाठ लो। आ रहे हैं अब चुनाव अति निकट, समस्या नहीं रही है अब तनिक भी विकट। इस पार्टी से उस पार्टी में अब लेते हैं फटक। वहाँ जाकर टिकट लेंगे झटक। पहले वाली पार्टी इस बार बिल्कुल भी नहीं देगी हमें टिकट, और निर्दलीय जीतना तो है बहुत मुश्किल। अतः दूसरी (विपक्षी पार्टी) को ज्वाइन करना ही होगा इसका सही सटीक हल। मिलेगा विपक्षी पार्टी में अब मोटा फल। पहली पार्टी वाले लोग जाएंगे अब जल। आत्मा की आवाज़ के नाम पर या सिद्धांतों की दुहाई देकर अब तो उस पार्टी में चले जाएंगे। वहाँ जाकर सब्जबाग पर सब्जबाग हम दिखाएंगे। देश दल-बदल को भले ही समझे कोई बड़ी बीमारी। चुनावों के निकट दल बदलने की चढ़ी आज हर राजनीतिक दलों के नेताओं में खुमारी। नेता हर पांच साल में नया आशियाना ढ़ूढ़ते, नहीं है कोई ये(दल-बदल) नई प्रथा। दल-बदली है तो आज की राजनीति की असली कथा। आयाराम-गयाराम से दिल को बहलाना है। राजनीति का यही फसाना है। दल-बदल करने पर विपक्षी पार्टी वाले साफा,शॉल और फूलमालाएं पहनाते हैं। दम घुटने नहीं देते ऑक्सीजन सिलेंडर लगाते हैं। हमने दम घुटने की बात को लेकर ही तो अपनी पहली पार्टी छोड़ी थी। क्योंकि विपक्षी पार्टी में हमें दिख रही तिजौरी थी। अब हम फिर से हमारा ऑक्सीजन लेवल ठीक करने के चक्कर में हैं। यह आयाराम-गयाराम का जमाना है। हमें पार्टी, देश सेवा, समाज सेवा से क्या, हमें नेम,फेम और पैसे पर पैसा कमाना है। दल बदलेंगे तो विपक्षी पार्टी का, राज्य का, देश का शीर्ष नेता हमारा स्वागत करेगा। हमें भी पार्टी में महत्त्वपूर्ण स्थान तब मिलेगा। अब जनप्रतिनिधि जनता के प्रतिनिधि नहीं रहे। दल-बदलुओं को लेकिन यह बात कौन कहे ? अब हम भी कल से दूसरी पार्टी में जा रहे हैं, वो क्या है कि बहुत दिनों से हमारे लिए भी विपक्षी पार्टियों में शामिल होने के न्यौते आ रहे हैं। जय राम जी की।

-सुनील महला

 

 

 

 

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