प्रकृति का खूबसूरत पर्व है हरियाली अमावस्या
हमारा देश पर्व और त्योंहारों का देश है। विशेषरूप से सावन मास का लगभग प्रत्येक दिन कोई न कोई व्रत
त्योहार वाला होता है। सावन के पवित्र माह में आने वाली अमावस्या को हरियाली एकादशी के नाम से जाना
जाता है। इसे हरियाली अमावस्या, सावन अमावस्या और श्रावणी अमावस्या भी कहते हैं। इस बार श्रावण
मास की हरियाली अमावस्या 17 जुलाई को मनाई जाएगी। सावन की अमावस्या को हरियाली अमावस्या
कहा जाता है। सावन का महीना भगवान भोलेनाथ को अर्पित है। ऐसे में सावन माह की अमावस्या को भी
बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। उदया तिथि के आधार पर इस वर्ष हरियाली अमावस्या 17 जुलाई को मनाई
जाएगी। इस समय सर्वत्र बारिश वजह से धरती पर चारों ओर हरियाली छाई रहती है। चारों तरफ हरे पेड़-
पौधे नजर आते हैं। ऐसे में इस दिन पेड़-पौधों की विशेष रूप से पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन
पीपल और तुलसी की पूजा करने से जीवन की सभी समस्याएं दूर होती हैं। इस दिन पेड़ पौधे लगाने से
व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
वसुंधरा के हरित श्रृंगार के पावन पर्व हरियाली अमावस्या का हिंदू धर्म में बहुत अधिक महत्व होता है।
भारत की संस्कृति में प्राचीनकाल से पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है। हरियाली
अमावस्या का पर्व पर्यावरण के महत्व को भी बताता है। देश के कई भागों विशेषकर उत्तर भारत में इसे एक
धार्मिक पर्व के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के रूप में मनाया जाता है। इस दिन पेड़- पौधों की पूजा से कष्टों से
मुक्ति मिलती है। सावन के महीने में चारों तरफ हरियाली होती है। इसलिए पुराणों में भी हरियाली
अमावस्या को पर्यावरण संरक्षण के रूप में मनाने की परंपरा है द्य हमारी संस्कृति में वृक्षों को भगवान के
रूप में पूजा जाता है। इसके पीछे वृक्षों को संरक्षित रखने की भावना निहित है। पर्यावरण को शुद्ध बनाए
रखने के लिए ही हरियाली अमावस्या के दिन वृक्षारोपण करने की प्रथा बनी। हरियाली अमावस्या के दिन
पौधा लगाकर उसकी रखवाली करने, जल-खाद आदि देने से पुण्य की प्राप्ति होती है। मनुष्य अपने जीवन
में जितनी ऑक्सीजन लेता है और जब यहां से विदा लेता है, उसमें पौधों की मुख्य भूमिका होती है। इसलिए
हर व्यक्ति को हरियाली अमावस्या के दिन पौधा लगाना चाहिए। यह बारिश का मौसम है जिसमे कीट
पंतगों के कारण बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे समय नीम आदि वृक्षों के औषधीय गुणों के कारण
हरियाली अमावस के पर्व में उसकी डाल को घरों में रखा जाता है। मान्यता है यह गुणकारी वृक्ष केवल कीट
पतंगो से ही नहीं बल्कि बुरी आत्माओं से भी रक्षा करता है।
हरियाली अमावस्या पर पवित्र नदी में स्नान का भी बहुत अधिक महत्व होता है। मान्यता है हरियाली
अमावस्या के दिन स्नान और दान के अलावा पितरों की आत्मा की शांति के लिए दान, पूजा पाठ, ब्रह्मणों
को भोजन आदि कराना चाहिए। हरियाली अमावस्या के दिन पेड़ की पूजा की जाती है। इस दिन विशेष रुप
से पीपल और तुलसी के पौधे की पूजा करते हैं। पीपल के पेड़ में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास
माना जाता है। हरियाली अमावस्या पर पितरों के नाम से कुछ पौधे भी लगाए जाते है। इस दिन पीपल,
बरगद, केला और तुलसी के पौधे लगाना सबसे अच्छा मन जाता है।
शास्त्रों और पुराणों में इस अमावस्या को व्रत करने पर कई गुना फल प्राप्त होता है जो व्यक्ति के लिए मोक्ष
का द्वार खुलता है। हरियाली अमावस्या के दिन सुबह 5 बजकर 34 मिनट से सुबह 7 बजकर 17 मिनट
तक है। इसके बाद दूसरा मुहूर्त सुबह 9 बजकर 1 मिनट से सुबह 10 बजकर 44 मिनट तक शुभ समय है।
-बाल मुकुन्द ओझा