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प्रसन्नता सूचकांक !

प्रसन्नता सूचकांक !

लो जी कर लो बात। हाल ही में वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स रिपोर्ट आई है। सुना आपने। अजी ! अपना इंडिया विश्व के सर्वाधिक दुखी देशों की सूची में 'अंडर-20' यानी कि सोलहवें पायदान पर है। कसम से ,जब से 'वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स रिपोर्ट आई है, तब से इसने हमारी सारी 'हैप्पीनेस' छीन ली है। वो इसलिए क्योंकि हमारे विशाल गणराज्य 'इंडिया' से तो पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और यहाँ तक कि कम्युनिस्ट चीन तक काफी अधिक सुखी है। और भैय्या जी ! जब पड़ौसी सुखी होते हैं तो हमारी तो जान जलती है। हमारे यहाँ पड़ौसी सुखी होते हैं तो दूसरे लोग(हमारे जैसे लोग) दुखी हो जाते हैं। हमारी तो जान तक जलने लगती है और जान जलती है तो भैय्या जी आदमी सुखी कैसे हो सकता है ? वैसे, जब जब भी दुनिया में पड़ौसी सुखी हुए हैं, तब तब हम लोग दुखी ही हुए हैं। दुनिया में कुछ भी हो, लेकिन पड़ौसी कभी भी सुखी नहीं होना चाहिए। अजी ! यह आम बात है यानी कि यह एक सामान्य सा ट्रेंड चलता आया है जी। वास्तव में, पड़ौसियों की जान जलती है तो इससे हमारी शान बढ़ती है और हम सुखी होते हैं। वो बहुत पहले आपने टीवी पर टीवी के लिए एक विज्ञापन तो देखा होगा न, 'मे कोज एन्वी'(ईर्ष्या का कारण हो सकता है)। पहले के जमाने में किसी के पास टीवी नहीं होता था(जब दूसरे लोग रंगीन टीवी खरीद कर लाते थे) तो लोग जलते थे। आज तो न जाने किस किस चीज,किस किस बात को लेकर जलते हैं। अजी ! जीवन में सारे सुख, पड़ौसियों के दुख से ही प्रतीत होते हैं। पड़ौसी के पास साइकिल हो और हमारे पास यदि कार हो तो हमारी प्रसन्नता बढ़ती है। लेकिन पड़ौसी के पास यदि आज मर्सिडीज है, तो हमारे चेहरों पर खीज ही खीज होती है। बहरहाल, हैप्पीनेस इंडेक्स में हैरानी की बात तो यह सामने आई है कि रूसी हमला झेल रहा यूक्रेन तक भी हमसे ज्यादा खुशहाल है। हद हो गई। उधर चीन तक भी हमसे ज्यादा खुश है। चीन इसलिए खुश है, क्यों कि इंडिया में उसका चायनीज़ माल धड़ाधड़ बिक रहा है। अजी ! इंडेक्स बता रही है कि फिनलैंड तो भारत से सवा सौ गुना अधिक खुश है। ये तो हद की भी हद हो गई। अजी ! फिनलैंड इसलिए खुश है क्योंकि वहाँ पर्यटक का बटुआ तक भी कभी चोरी नहीं होता और हमारे यहाँ तो 'बटुए' को पार करके 'बटुआ-चोर' मोगेंबो जितना प्रसन्न होते हैं। आज हमारे 'यहाँ कोई न ताला डाले, तो खाने के भी पड़ जाएंगे लाले। नहीं डालेंगे ताले तो सारा माल हो जाएगा चोर बाजार और चोरों के हवाले। चोर चोरी करके खुश हैं, शेष माल लुटाकर दुखी हैं। इसीलिए इंडिया हैप्पीनेस में डाउन है। बहरहाल, वो उस दिन यह लेखक अखबार पढ़ रहा था, अखबार में लिखा था-' सब कुछ अपने देश में रोटी नहीं तो क्या ? वादे लपेट लो जो लंगोटी नहीं तो क्या ?' अब नेता लोग जब वादे ही वादे लपेटेंगे तो आमजन की 'हैप्पीनेस' आखिर कैसे बढ़ेगी ? अजी ! हम तो कहते हैं कि आप इस प्रसन्नता रिपोर्ट(हैप्पीनेस रिपोर्ट) पर बिल्कुल भी मत जाओ। ये सब तो विकसित देशों के चोंचलें हैं। इन्हीं रिपोर्ट्स के बल पर विश्व पटल पर बनाते वे अपने घोंसले हैं। ये और कुछ भी नहीं सब के सब ढ़कोसले हैं। अजी ! मत रखो मन में अपने कोई भी दुख। आप तो 'सुखोई' से उड़ान में ही पा जाओ भरपूर सुख।
हमारे यहाँ तो कुछ लोग सुखोई में उड़ान भरकर और उसे देखकर ही प्रसन्न हो लेते हैं। और हमारे जैसे लोग जो 'सुखोई' में उड़ान नहीं भर सकते हैं, वो स्वप्न में ही सुखोई में उड़ान भरकर या अन्य लोगों को सुखोई में उड़ान भरते देखकर(मीडिया के माध्यम से) ही जिंदगी के 'काचे' (मजे काटना) काट लेते हैं। अजी ! हमारे यहाँ तो मेट्रो प्रमोटर्स ही यात्रियों को भरपूर सुख प्रदान कर देते हैं। बिकनी गर्ल ने प्रसन्नता बढ़ाई, लेकिन प्रसन्नता सर्वे पहले ही हो चुका था। इस बार पक्का हमारा नंबर प्रसन्नता में फर्स्ट आएगा। वैसे ,भारत की प्रसन्नता में और भी निश्चित रूप से इजाफा हो सकता था , अगर वो शख्स प्रसन्नता सर्वे के दिनों में मेट्रो के फर्श पर टेम्परेरी बेड पर जूते-जुराब और टी-शर्ट उतारकर सोता। वैसे इंडिया राजनेताओं की 'रेवडियां' से भी अपना प्रसन्नता सूचकांक बढ़ा सकता है जी। चुनावी समय चल रहा है।
चुनावी समय में नेताजी घर-घर,दर-दर जाकर राशन पर राशन बांट रहे हैं। मतदाताओं के मुंह पर प्रसन्नता बुलेट ट्रेन की भांति दौड़ रही है। अजी ! राजनेता आजकल वोट पर वोट छांट रहे हैं। राशन पर राशन बांटकर नेताजी प्रसन्नता सूचकांक बढ़ा रहे हैं। उस दिन एक गरीब ने पूछ ही लिया नेताजी आप सुबह से आठ-दस बार राशन बांटते हुए फोटो पर फोटो खिंचवा रहे हैं, क्या चुनाव आ रहे हैं ? नेताजी बोले चुनाव तो बहाना है, दरअसल इन चुनावों का मकसद वोटर्स के मुंह पर प्रसन्नता लाना है। हम नेताओं को अपनी कहाँ पड़ी है ? हम नेता तो 'सेवा' करते आए हैं। इन ' रेवड़ियों' में प्रसन्नता ही प्रसन्नता जड़ी पड़ी है।

-सुनील कुमार महला

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