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वह एक राजपूत ही हो सकता हैं

वह एक राजपूत ही हो सकता हैं

जब गायों की रक्षा के लिए कोई कबंध आतताइयों से लड़ रहा हो और अपनी तलवार से किसी फसल की तरह अधर्मियों के सिर काट रहा हो, वह राजपूत ही हो सकता हैं। जब मंदिरों में म्लेच्छों से निर्भय होकर पंडित पूजा कर रहा हो और बाहर कोई वीर देवालयों के रक्षार्थ अरियों से लड़कर अपना सिर युद्धभूमि में भूलकर आ गया हो,अपनी संगिनी से अंतिम भेंट करने,वह भी एक राजपूत ही हो सकता हैं। किसी के वचन पालन के लिए,जो समर आमंत्रण में विवाह के गठजोड़े काट दे,वह एक राजपूत ही हो सकता हैं। असहाय और अपमानित नारी की मर्यादा रक्षा के लिए कोई वीरवर कुकर्मियों के शीश को सरेराह लटका दे,वह एक राजपूत ही हो सकता हैं। दुर्गम और दुर्जेय समझे जाने वाले काबुल को जब कोई दुर्धर्ष,अपने पैरों तले रौंद दे,वह भी एक राजपूत हो सकता हैं। जब कोई स्वाभिमानी निज आत्मसम्मान के लिए,भरे दरबार में किसी असभ्य का वध कर दे और निजत्व की रक्षा के लिए आगरे के किले के बुर्ज से घोड़ा कुदवा दे,वह भी एक राजपूत हो सकता हैं। कोई इतिहास पुरुष श्मशान की धधकती आग में बाटियां सेंक रहा हो,जिसने अपना पूर्ण जीवन राजभक्ति में खपा दिया,वह विरला स्वामिभक्त एक राजपूत ही हो सकता हैं। मुग़ल बादशाह की धर्म परिवर्तन जैसी कट्टरता को अटक में जिस धर्मवीर ने निष्फल कर दिया ,वो जंगलधार बादशाह एक राजपूत ही हो सकता हैं। जब कोई शासक अपने पैतृक राज्य को छोड़कर अन्य राज्य की रक्षा के लिए केसरिया शाका करता हो,वह एक राजपूत ही हो सकता हैं। तराइन,चंदावर,चंदेरी,खानवा,सुमेल गिरी,हल्दीघाटी इत्यादि जैसी रणस्थली से यदि कोई वीर हर–हर महादेव जैसे युद्ध उद्घोष गूंजा रहा हो, वह एक राजपूत ही हो सकता हैं। जब रणथंभोर दुर्ग की प्राचीरें शरणागत की रक्षा के लिए जिसकी गाथा सुना रही हो,वह शीशदानी एक राजपूत ही हो सकता हैं। अनगिनत मन्दिर और किलों को बनाने वाले जिस शासक को,इतिहास में स्थापत्य कला का जनक कहा गया, वह भी एक राजपूत हो सकता हैं। जिस बलिष्ठ शरीर के अस्सी घावों को देखकर शत्रु कम्पायमान हो जाए और जिस हिंदू जाति के सेनानायक के विराटता को देखकर मुग़ल युद्ध को जिहाद घोषित कर दे,वह एक राजपूत ही हो सकता हैं। जब वन और गिरियों पर जिस स्वाधीनता सेनानी ने सर्वोच्च सत्ता को चुनौती देकर स्वत्व को जीवंत रखा और राजस्थान को जिसने अपने नाम से अमिट पहचान दी,वह एक राजपूत ही हो सकता हैं। जब हल्दीघाटी युद्ध में स्वामी पर आए प्राणसंकट को खुद पर लेकर ,महाराणा के मुकुट को पहनकर और आक्रांताओं से लड़कर वीरगति को प्राप्त हो जाए,वह राजपूत ही हो सकता हैं। 400 वर्षों के काल में महमूद सालार से लेकर मोहम्मद गौरी तक धूल चटाने वाले वाले भारत राष्ट्र के प्रतिपाल,कोई राजपूत ही हो सकता हैं। सन सत्तावन की क्रांति में जिस बूढ़े राजा को पलंग पर जीवन के अंतिम समय व्यतीत करने थे,वह समय उस क्रांतिवीर ने अंग्रेजों से लोहा लेने में लगा दिया। वह बिहारी सिंह एक राजपूत ही हो सकता हैं। जिस बंजर मरूधरा को नहर निर्माण से हरित कर दे, वह भागीरथ भी एक राजपूत हो सकता हैं।

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