वैश्विक जगत की सांस्कृतिक पहचान है हिंदी
हम हर साल 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाते है और इसे वैश्विक स्तर की भाषा बता कर गुणगान करते है। विश्व हिंदी दिवस की इस वर्ष की थीम हिंदी : पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम बुद्मिमत्ता तक रखी गई है। इसका उद्देश्य है कि हिंदी पारंपरिक रूप से एक भाषा होने के साथ तकनीक की दुनिया में भी आगे है। हम विश्व हिंदी दिवस जरूर मनाएं मगर वास्तविकता से मुहं नहीं मोड़े। हिंदी की सच्चाई जाने, उस पर मंथन करें ताकि जमीनी हकीकत से रूबरू हो सके। हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा है मगर अंग्रेजी के मुकाबले यह भाषा आज भी दोयम दर्जे से ऊपर नहीं उठ पाई है। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व आज भी कायम है। शिक्षा और रोजगार की बात करें तो अंग्रेजी के आगे हिंदी कहीं भी नहीं ठहरती। हमारी शिक्षा की बुनियाद अंग्रेजी पर टिकी है। हिंदी पढ़ने वालों को हिकारत की नजर से देखा जाता है। आजादी के 78 वर्षों बाद भी जनमानस की धारणा यह है कि हिंदी वाला चपरासी या बाबू बनेगा और अंग्रेजी जानने वाला अफसर। हम लाख कोशिशों के बाद भी इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते। सच तो यह भी है की हिंदी को अपने ही लोगों ने छला पग पग पर।
मोदी सरकार हिंदी को जन जन की भाषा बनाने की बात जरूर करती है मगर अंग्रेजी के प्रभुत्व को अपने 11 साल के शासन के बावजूद धराशाही नहीं कर पाई है। कम से कम हिंदी भाषी राज्यों में तो अंग्रेजी को कठोरता पूर्वक त्यागे। दुनियां भर में हिंदी का उपयोग और प्रचार प्रसार लगातार बढ़ रहा है मगर अपने ही देश में राज भाषा का आधिकारिक दर्जा पाने के बावजूद यह भाषा जनभाषा के रूप में स्थापित होने का अब भी इंतजार कर रही है। गाँधी के शब्दों में बात करें तो राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। बहरहाल 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस पर देशवाशियों को हिंदी की सार्थकता पर गहनता के साथ मंथन की जरुरत है। हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित किया गया था। विश्वभर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरुकता पैदा करने और इसे अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रस्तुत करने के लिए इस दिन को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिंदी को 2006 में आधिकारिक दर्जा और वैश्विक पहचान मिली। तत्पश्चात हर वर्ष 10 जनवरी को दुनिया भर में विश्व हिन्दी दिवस मनाया जाता है।
दक्षिण के प्रदेश अपनी निज बोली या भाषा को अपनाये इसमें किसी को आपत्ति नहीं है मगर राष्ट्रभाषा के स्थान पर अंग्रेजी को अपनाये यह हमे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं है। वे तमिल, कनड या बंगला को अपनाये हमे खुशी होगी मगर हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी थोपे तो यह बर्दाश्त नहीं होगा। भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। गांधी जी ने इसे जनमानस की भाषा भी कहा था । विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है हिन्दी। चीनी भाषा के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। भारत और अन्य देशों में 70 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते,पढ़ते और लिखते हैं। हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है। योग को 185 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिन्दी के लिए 129 देशों का समर्थन क्या नहीं जुटाया जा सकता। हिन्दी भाषा प्रेम, मिलन और सौहार्द की भाषा है। भारत की राष्ट्रीय चेतना की संवाहिका है। हिन्दी और इसकी बोलियाँ उत्तर एवँ मध्य भारत के विविध राज्यों में बोली जाती हैं। फिजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिन्दी बोलती है। विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों तथा सैंकडों छोटे-बड़े केंद्रों में विश्वविद्यालय स्तर से लेकर शोध के स्तर तक हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था हुई है। आज हिन्दी ने अंग्रेजी का वर्चस्व तोड़ डाला है। करोड़ों की हिन्दी भाषी आबादी कंप्यूटर का प्रयोग अपनी भाषा में कर रही हैं।
देशवासियों को विचार करना चाहिए कि जिस भाषा को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया हैै और जो जन जन की मातृभाषा है, उसी के बोलने वाले उसे इतनी हिकारत की निगाह से क्यों देखते हैं। हिंदी की इस दुर्दशा के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है इस पर गहनता से चिंतन और मनन की महती जरूरत है। हिंदी भाषी राज्यों की हालत यह है कि वहां शत प्रतिशत लोग हिंदी भाषी है मगर प्रदेश के बाहर से आए चंद अधिकारियों ने अपना कामकाज अंग्रेजी में कर मातृभाषा को दोयम दर्जे की बना रखा है। हम दूसरों को दोष अवश्य देते हैं मगर कभी अपने गिरेबान में झांककर नहीं देखते। सच तो यह है की जितने दूसरे दोषी है उससे कम हम भी नहीं है। हिन्दी हमारी मातृ भाषा है और हमें इसका आदर और सम्मान करना चाहिये।
आज आवश्यकता इस बात की है की हम देश की जन भाषा के रूप में हिंदी को अंगीकार करे। अपनी अपनी निज भाषा के साथ हिंदी को स्वीकार कर देश को प्रगति पथ और एक सूत्र में पिरोने के लिए अपने स्वार्थ त्यागे और देश के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा का परिचय दें।
- बाल मुकुन्द ओझा