भाजपा का गुजरात मॉडल कर्नाटक में कितना सफल होगा ?
कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगानेवाली भाजपा भी अछूती नहीं है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में 25 से अधिक मंत्रियों, विधायकों और सांसदों के रिश्तेदारों को टिकट देकर भाजपा ने संकेत दिया है कि फार्मूला आगे भी अपनाया जा सकता है। नतीजों के बाद पता चलेगा कि मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के रिश्तेदारों का राजनीतिक भविष्य क्या होगा? राजनीतिक जानकार कह रहे हैं कि भाजपा ने ‘गुजरात मॉडल’ की तर्ज पर कर्नाटक में भी पूर्व मुख्यमंत्री सहित कई मंत्रियों और विधायकों के टिकट काटे लेकिन भरपाई रिश्तेदारों को टिकट देकर की।कर्नाटक में फैसला भाजपा की परिवारवाद पर राजनीतिक लाइन से विपरीत रहा। पार्टी ने 25 से ज्यादा मंत्रियों, विधायकों और सांसदों के करीबी रिश्तेदारों को टिकट देकर दक्षिण का एकमात्र किला बचाने की चाल चली है। हालांकि, टिकट वितरण के बाद भाजपा में मची भगदड़ ने आलाकमान को भी चिंता में डाल दिया। डैमेज कंट्रोल के लिए पार्टी ने आखिरकार मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के जीतने में सक्षम करीबी रिश्तेदारों को टिकट दिया।भाजपा को टिकट वितरण के बाद पार्टी नेताओं की बगावत से बड़ा झटका लगा । भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार, पूर्व उपमुख्यमंत्री जगदीश सावदी पार्टी से बगावत कर कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। कांग्रेस ने इन दोनों लिंगायत नेताओं को टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा है। राजनीति में अक्सर ऐसा देखा गया है कि चुनाव के समय प्रत्याशी नहीं बनाए जाने पर कई नेता यहां तक कि वर्षों तक पार्टी और सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर रहे नेता भी पार्टी के साथ बगावत करने में जरा भी संकोच नहीं करते।
यह केवल कर्नाटक में नहीं हुआ है। कमोबेश हर राज्य में ऐसे हालात सभी दलों में बनते हैं। भाजपा ने गुजरात में जरूर नए चेहरों का क्रांतिकारी फॉर्मूला अपनाया था। इस राज्य में भाजपा को बगावत का सामना नहीं करना पड़ा और चुनाव परिणामों में ऐतिहासिक जीत हासिल हुई। भाजपा चुनाव में नए चेहरों पर दांव लगाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। टिकट नहीं मिलने के बाद पार्टी से बगावत की बढ़ती प्रवृत्ति से सवाल उत्पन्न हो रहा है कि क्या रिटायरमेंट राजनीति में भी जरूरी हो गया है? राजनीति में सांसद और विधायक को पेंशन तो मिलती है। नए चेहरों को मौका तभी मिलेगा जब पुराने चेहरे जगह खाली करेंगे। राजनीति में स्वेच्छा से तो बिरले ही जगह खाली करने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं। राजनीति क्या केवल सत्ता तक सीमित हो गई है? इसका जनसेवा से कोई लेना-देना नहीं है? अगर सत्ता में अवसर नहीं मिलता तो क्या पार्टी, संगठन, विचारधारा और जनसेवा के लिए काम करने का कोई औचित्य नहीं बचता?
युवा भारत की राजनीति में युवाओं का टोटा ही दिखाई पड़ता है। राजनीति पर कब्जा अधिकतर बुजुर्गों ने कर रखा है। राजनीतिक जोड़-तोड़ से सत्ता की राजनीति में हिस्सेदारी सुनिश्चित करना राजनीतिक सफलता का पैमाना बन गया है। राजनीतिक दलों के सामने भी यह एक संकट बना हुआ है कि चुनाव के समय प्रत्याशी चयन में नए और पुराने चेहरों के बीच में संतुलन कैसे स्थापित किया जाए? जब पेंशन प्राप्त करने वाले सभी वर्गों में रिटायरमेंट की सुनिश्चित व्यवस्था है तो फिर पेंशनभोगी राजनेताओं के मामले में रिटायरमेंट की व्यवस्था क्यों नहीं होना चाहिए? इस बारे में राजनीतिक दलों को सुधार की प्रक्रिया शुरू करने की जरूरत है। संसद या विधानसभाओं में सदस्यता के लिए एक समय सीमा निश्चित की जानी चाहिए। सरकारों में मुख्यमंत्री या मंत्री के रूप में काम करने के लिए भी समय सीमा का निर्धारण अवश्य किया जाना चाहिए। जब अस्तित्व हमें परिवर्तन और नयापन का हर दिन संदेश देती है, नूतनता ही जीवन का क्रम है तो फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था में नूतनता के लिए प्रयास क्यों नहीं किए जाने चाहिए?
कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास पर नजर डाली जाए तो 1985 के बाद कर्नाटक में मतदाता सत्ता में पार्टी को दोबारा लाने के खिलाफ रहे है। भाजपा की बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोपों की कमी नहीं है। कांग्रेस की ओर से 40% कमीशन की सरकार के रूप में प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। कर्नाटक स्टेट कांट्रैक्टर्स एसोसिएशन ने भी भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। यद्यपि भाजपा ने सबूत मांगते हुए ऐसे आरोपों का खंडन किया है। सबूत अब तक ना तो कांग्रेस की ओर से और ना ही ठेकेदारों की ओर से दिए जा सके हैं।भाजपा डबल इंजन सरकार की उपलब्धियों पर जनादेश उनके पक्ष में आने के लिए आश्वस्त है। कर्नाटक में सोशल इंजीनियरिंग राजनीति को पूरी तरह से प्रभावित करती है। राज्य में वोकालिंगा और लिंगायत कम्युनिटी ओबीसी है। एससी और एसटी वर्ग भी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भाजपा ने मुस्लिम आरक्षण समाप्त कर इन समुदायों को आरक्षण देकर बड़ा दांव चला है।
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर्नाटक में पहले जोर-शोर से दिखाई पड़ रहा था लेकिन चुनाव के दौरान अब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को पिछले पायदान पर डाल दिया गया है। यहां चुनाव में ना तो हिजाब मुद्दा है और ना ही मैसूर के शासक टीपू सुल्तान और वीर सावरकर का मुद्दा चुनाव में उठाया जा रहा है। भाजपा डेवलपमेंट वर्सेज अपिजमेंट की पॉलिटिक्स पर फोकस कर रही है।भाजपा के सामने संकट बगावत के कारण पैदा हुआ है। लगभग 20 विधानसभा सीटों पर भाजपा को बगावत का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा ने राजनीति में शुद्धिकरण के लिए दागी नेताओं, राजनीतिक खानदानों और टिकटों पर बैठे डेडवुड को खत्म करने के लिए टिकट वितरण के अंतिम समय में अभियान चलाया। अगर यह अभियान पहले चला दिया गया होता और ऐसे नेताओं को पार्टी से अलग कर दिया गया होता तो शायद भाजपा को बागी नेताओं का इतना प्रभाव नहीं भुगतना पड़ता।
भाजपा के प्रमुख लिंगायत चेहरों के कांग्रेस में जाने से भाजपा की संभावना को नुकसान पहुंचने की आशंका लगती है। वैसे भी भाजपा ने राज्य में कभी भी साधारण बहुमत हासिल नहीं किया है। लिंगायत समुदाय परंपरागत रूप से भाजपा का समर्थक माना जाता है। कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को सार्वजनिक रूप से अपमानित कर पद से हटाया था। वह लिंगायत समुदाय से आते थे। उसके बाद से कांग्रेस का लिंगायतों में प्रभाव सीमित हुआ था। अब भाजपा के लिंगायत नेताओं को पार्टी में शामिल कर कांग्रेस लिंगायत समुदाय के साथ अपने रिश्तों को सुधारने की कोशिश कर रही है।आरक्षण के संबंध में भाजपा ने जो दांव चला है उसका उसे राजनीतिक लाभ हो सकता है। कर्नाटक चुनाव में गुजरात के अमूल डेयरी का मुद्दा भी राजनीतिक रूप ले चुका है। यह मामला भाजपा के लिए सेल्फगोल जैसा दिखाई पड़ रहा है। अमूल के प्रोडक्ट राष्ट्रीय पहचान के रूप में पूरे देश में उपयोग किए जा रहे हैं। कर्नाटक राज्य में स्थानीय डेरी के प्रोडक्ट नंदिनी के मुकाबले अमूल डेयरी के प्रोडक्ट को उतारने के प्रयासों को कांग्रेस और जेडीएस ने चुनावी मुद्दा बनाया है।कर्नाटक में हंग असेम्बली की स्थिति में जेडीएस किंगमेकर की भूमिका में आ सकती है। पिछले चुनाव में भी जेडीएस किंगमेकर बनने के बदले किंग ही बन गई थी। कर्नाटक में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में फिर वही राजनीतिक उठापटक का माहौल देखना पड़ सकता है।
राजनीति में रिटायरमेंट के लिए अभी तक कोई कानून नहीं है। राजनीतिक दल टिकट वितरण में नए चेहरों को अवसर देते हैं लेकिन यह पर्याप्त नहीं होता है। कांग्रेस में तो बुजुर्ग नेताओं का बोलबाला है लेकिन भाजपा नए चेहरों को कुछ ज्यादा प्राथमिकता देती दिखाई पड़ती है। इसके कारण कई बार उसे बगावत से भी दो-चार होना पड़ता है। किसी भी सशक्त राजनीतिक दल के लिए जरूरी है कि एक निश्चित सिद्धांत और विचारधारा पर निर्णय किए जाएं। निर्णयों को क्रियान्वित करने के लिए अगर संगठन को चुनावी राजनीति में कुछ नुकसान भी उठाना पड़े तो उसके लिए राजनीतिक दलों को तैयार रहना चाहिए।कर्नाटक के चुनाव परिणाम दागी और खानदानी चेहरों को राजनीति में अवसर नहीं देने की रणनीति को सही और गलत साबित करने वाले भी साबित होंगे। चुनाव सुधार की प्रक्रिया में नए सिरे से इस तरह के कानून बनना चाहिए कि एक निश्चित समय अवधि के बाद कोई भी राजनेता ना तो चुनाव लड़ सकता है और ना ही सरकार में किसी पद पर रह सकता है। लोकतंत्र के सिस्टम में पारदर्शिता के लिए बदलाव और नवीनता बुनियादी जरूरत है। अगर इस जरुरत पर ध्यान नहीं रखा गया तो सिस्टम को सड़ने से कोई रोक नहीं पायेगा।
-अशोक भाटिया