आरटीएच बिल के विरोध में कोटा में अनशन जारी
कोटा. आरटीएच बिल पारित होने के बाद सरकार की संवेदनहीनता से चिकित्सकों के आंदोलन की आग में चिकित्सकों, विभिन्न कर्मचारियों और जनता की मुश्किलों में कमी होती नजर नहीं आ रही। अब रेजिडेंट डॉक्टर्स के हड़ताल में आने से संभाग के सब बड़े अस्पतालो में चिकित्सा सेवाएं ठप्प रही। गुरुवार को चिकित्सकों की हड़ताल और धरने में व्यापार महासंघ से राकेश जैन और सचिव अशोक माहेश्वरी ने भी शिरकत की और चिकित्सकों की चिंताओं को साझा किया। डॉ. अशोक शारदा ने बताया कि डॉ. नीलम खंडेलवाल के अनशन के तीसरे दिन मेडिकल कॉलेज के चिकित्सा दल ने निरीक्षण किया और उन्हें अनशन तोड़ने की सलाह दी, जिस पर उन्होंने प्रतिरोध जताया और हड़ताली चिकित्सको ने सरकारी दल को लौटा दिया। गुरुवार को उनके साथ डॉ ललित गोयल, डॉ अनुराग चित्तौड़ा और गौरव जैन भी अनशन पर बैठे। डॉ. संजय जायसवाल ने बताया कि चिकित्सा मंत्री के कोटा आगमन के कार्यक्रम को देखते हुए आज सभी चिकित्सकों ने काले कपड़े और साड़ियां पहन रखी थी। ऐन वक्त पर चिकित्सा मंत्री ने अपना कार्यक्रम निरस्त कर दिया, जिसकी सूचना मिलने पर चिकित्सकों ने नारों से आसमान गूंजा दिया। उन्होंने कहा कि दिन भर अनशन स्थल विज्ञान नगर एलिवेटेड रोड के नीचे सद्भावना चौक पर चिकित्सकों का हुजूम लगा रहा। डॉ. अमित व्यास ने कहा कि संबोधित करते हुए चिकित्सकों ने समझाया कि सरकार की और से लगातार झूठ बोला जा रहा है कि पहले चिकित्सको की सहमति बन गई थी, इस संदर्भ में बताया गया कि चिकित्सकों के सुझावों पर हामी भरने के बाद भी बार-बार सरकार द्वारा उनके सुझावों को अनदेखा किया गया और इस कारण से सरकार और ब्यूरोक्रेसी से चिकित्सकों का विश्वास टूट गया है और उनको ये पूरा यकीन है कि भविष्य में नियमों की आड़ में उनके अधिकारों का हनन किया जाएगा। विभिन्न चिकित्सकों ने अपना मत प्रकट करते हुए सरकार की विभिन्न संगठनों के बीच आपसी फूट डालने की नीति पर रोष प्रकट किया। डॉ. केवलकृष्ण डंग ने कहा कि 75 साल में भी चिकित्सा सेवा मुहैया करा पाने में सरकार की विफलता पर भी जन मानस का ध्यानाकर्षण किया और सरकार को चिकित्सा सेवा को प्राथमिकता पर बजट आवंटन की अनुशंसा की। सरकार से जन मानस को साफ हवा, पानी, आवास, मानसिक स्वास्थ्य उपलब्ध करवाने की मांग भी की गई। बिल की विवेचना में बताया गया कि ये बिल स्वास्थ्य का अधिकार नहीं है क्योंकि इसमें जनता को निरोगी रखने के बारे में कोई जिम्मेदारी या प्रावधान नहीं है। ये बिल चिकित्सा का अधिकार भी नही है, क्योंकि ऐसा होता तो इसे सिर्फ उन स्थानों पर लागू किया जाता जहां सरकारी सेवाओं की उपलब्धता नही है। चिकित्सको के अनुसार ये बिल चिकित्सा सेवा प्रदाता चुनने का अधिकार है जिसमे एक और सरकारी अस्पतालों को आधारभूत संरचना, मशीनों, रखरखाव, बिजली पानी, वेतन, दवाओ आदि का भुगतान सार्वजनिक फंड से किया जाता है, दूसरी ओर निजी क्षेत्र द्वारा ये खर्च खुद वहन किया जाता है, फिर भी दोनो ने भुगतान बराबर है, अत: अगर सरकार को आरटीएच बिल ला कर निजी अस्पतालों का सरकारी करण करना ही है तो ये निजी अस्पतालों के खर्चे भी सरकार वहन करे या उनका पुनर्भरण करें।
- पहले निजी क्षेत्र में आधुनिक उपकरण आते हैं फिर सरकारी में
डॉ विवेक गुप्ता ने कहा कि पिछले 30 वर्षों में निजी क्षेत्र चिकित्सा में विकास और प्रगति की मशाल ले कर आगे चलता रहा है, लगभग सभी आधुनिक उपकरण और तकनीक पहले निजी क्षेत्र में आती हैं, फिर सरकारी में। उन्होंने इस बिल से निजी अस्पतालों की गुणवत्ता पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव की भी बात की और समझाया कि सरकारी सेवाओं से असंतुष्ट जनता के इलाज के लिए इस कानून के बाद राज्य में कोई जगह नही बचेगी इन कारणों से उन्होंने इस बिल को राज्य सरकार का राइट टू किल बताया। राज्य भर से भी आंदोलन में तेजी के समाचार हैं। इसी बीच सरकार ने रेजिडेंट डॉक्टर्स पर वापस लौटने के लिए दबाव की रण नीति के तहत अनैतिक रूप से उनकी बर्खास्तगी की चेतावनी दी। आगामी रूपरेखा के बारे में बताया गया की आरटीएच वापस लिए जाने तक आंदोलन जारी रहेगा।