बढ़ रही हीट इंडेक्स, कैसे मिलेगी सक्सेस
ग्लोबल वार्मिंग आज संपूर्ण धरती के लिए एक बड़ा खतरा है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले दशक 2010-2019 के बीच मानव इतिहास में सबसे ज़्यादा ग्रीन हाउस गैस (जीएचजी) का उत्सर्जन देखा गया। यह अत्यंत गंभीर व संवेदनशील है कि वर्ष 2010-2019 तक के दशक में सभी तरह की ग्रीन हाउस गैस के लिए सबसे ज़्यादा औसत वार्षिक उत्सर्जन दर्ज किया गया। वर्ष 1990 के स्तर के मुक़ाबले 2019 में जीवाश्म ईंधन और उद्योगों से CO2 उत्सर्जन में असाधारण बढ़ोतरी देखी गई। इसमें 15 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड और प्रतिशत के मामले में 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जो कि सभी तरह की ग्रीन हाउस गैस में सबसे ज़्यादा और प्रतिशत के मामले में दूसरा सबसे ज़्यादा है। वास्तव में, ग्रीनहाउस प्रभाव या हरितगृह प्रभाव एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी ग्रह या उपग्रह के वातावरण में मौजूद कुछ गैसें वातावरण के तापमान को अपेक्षाकृत अधिक गर्म बनाने मदद करतीं हैं। इन ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाई आक्साइड, जल-वाष्प, मिथेन आदि शामिल हैं। बढ़ते औधोगीकरण, शहरीकरण, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, धरती के सीमित संसाधनों का असीमित तरीकों से दोहन,खनन, पर्यावरण संरक्षण के प्रति कम ध्यान, विकास और तकनीक को बढ़ावा कहीं न कहीं धरती की जलवायु व तापमान को निरंतर प्रभावित कर रहे हैं। हाल ही में एक्सडीआई यानी कि 'क्रॉस डिपेंडेंसी इनीशिएटिव' ने जलवायु परिवर्तन को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें जलवायु परिवर्तन के 'हैजार्डस' यानी कि खतरों से अवगत कराया गया था। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के 9 राज्यों समेत दुनियाभर के 2,600 राज्यों व प्रांतों पर जलवायु परिवर्तन का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। रिपोर्ट के आंकड़ें निश्चित तौर पर मानवजाति को चिंता में डालते हैं। यह अत्यंत ही गंभीर व संवेदनशील है कि भारत के 9 राज्यों पर बाढ़, जंगलों की आग, हीटवेव, समुद्र सतह के बढ़ने और लू जैसे गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं। बताया गया है कि शीर्ष पचास में भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, असम,राजस्थान, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब और केरल जैसे राज्य शामिल हैं। वर्ष 2050 तक विश्व के पचास राज्यों में भारत के नौ राज्यों को जलवायु परिवर्तन के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील बताया गया है। वास्तव में हीट इंडेक्स मानवजाति का ध्यान आज आकर्षित कर रहा है और करना भी चाहिए क्योंकि आज भारत के दक्षिणी भाग में स्थित राज्य केरल में भीषण गर्मी पड़ रही है, जबकि अभी मार्च का महीना ही चल रहा है। बताया जा रहा है कि केरल इन दिनों 54 डिग्री(हीट इंडेक्स) जैसी भीषण गर्मी का सामना कर रहा है। हालांकि केरल का तापमान 35 से 37 डिग्री सेल्सियस के बीच बताया जा रहा है। केरल में हवाओं में इन दिनों बहुत अधिक नमी हो गई है,जिसके कारण इंसान को हीट इंडेक्स महसूस होने लगा है।मौसम विभाग द्वारा मार्च के महीने में ही लू चलने की चेतावनियां दी जाने लगीं हैं, उत्तर भारत के पंजाब राज्य में भी पारा 30 डिग्री तक पहुंच गया है। ऐसे में जून जुलाई के महीनों में क्या होगा,यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। सबसे संवेदनशील व गंभीर बात तो यह है कि गोवा जैसे तटीय राज्य में भी लू चलने लगीं हैं और वहां स्कूलों में दोपहर की कक्षाएं बंद कर दी गई हैं। देश के कर्नाटक,कोंकण, सौराष्ट्र व कच्छ में भी लू का अलर्ट बताया गया है। वहीं तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश,तेलंगाना, ओडिशा के तापमान में भी मौसम के शुष्क रहने की आशंका व्यक्त की गई है। वास्तव में,
वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की उच्च सांद्रता पृथ्वी पर अधिक गर्मी बढ़ाने के लिए जिम्मेवार है। बढ़ती गर्मी को देखते हुए एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया ने राज्यों को एक एडवायजरी जारी की है जिसमें छत पर पक्षियों और घर के बाहर पशुओं के लिए पानी रखने को कहा गया है। यहाँ तक कि पोस्टर लगाकर लोगों को जागरूक करने, पशु-पक्षियों का ख्याल रखने की बात कही गई है। तापमान बढ़ने से ध्रुवों की बरफ लगातार पिघल रही है और वैज्ञानिक इस बात की आशंका जता रहे हैं कि इससे आने वाले समय में धरती के लिए खतरा बढ़ जाएगा और एक दिन ऐसा आएगा कि धरती जलमग्न होने का खतरा है। धरती का तापमान बढ़ने से अनेक वायरस सक्रिय हो सकते हैं। हाल ही में वैज्ञानिकों ने बताया है कि आर्कटिक क्षेत्र में तापमान बढ़ने से वहां की बरफ पिघलने से वहां 48000 साल पुराना 'जोम्बी' वायरस फिर से जिंदा हो गया। सच तो यह है कि तापमान बढ़ने से धरती पर गंभीर बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ेगा। इन दिनों जिस तरह पर्यावरणीय विसंगतियां(जलवायु परिवर्तन) पैदा हो रही हैं और जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम का मिजाज बदल रहा है, उससे धरती पर नई-नई बीमारियां पैदा करने वाले विषाणुओं के उत्पन्न होने की आशंका लगातार बनी रहती है। हो सकता है कि आज मानवजाति के समक्ष जो कोरोना, इंफ्लूएंजा व अन्य वायरसों का जो खतरा है, वह जलवायु परिवर्तन(बढ़ते तापमान) का ही कहीं परिणाम न हो। हमें चाहिए कि जलवायु परिवर्तन के बीच हम इन विषाणुओं को गंभीरता से लें। हमें यह चाहिए कि हम हमारी धरती के पारिस्थितिकीय तंत्र,जलवायु परिवर्तन व प्रकृति के अर्थशास्त्र के बीच हमारी जिम्मेदारियों व कर्तव्यों को बखूबी समझें। आज संपूर्ण विश्व में गर्मी में गर्मी अधिक पड़ती है और सर्दी में सर्दी अधिक पड़ने लगी है। प्रकृति आज लगातार असंतुलित होती जा रही है और इस प्राकृतिक असंतुलन का कारण प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं हम मनुष्य ही हैं, जिन्होंने मात्र अपने स्वार्थों, लालच को पूर्ण करने के लिए अपनी सीमाओं को लांघ दिया है। हम प्रकृति के साथ हर तरह से आज हस्तक्षेप कर रहे हैं। आज जगह जगह उधोग लगा दिए गए हैं, वायु, ध्वनि, मिट्टी, मृदा प्रदूषण हो रहा है। बढ़ती आबादी के कारण धरती पर हर कहीं आज कंक्रीट की विशालकाय दीवारें ही दीवारें खड़ी हो गई है। जीवों के प्राकृतिक अधिवासों, चरागाहों ,वनों में लगातार कमी आ रही है। जल का असीमित दोहन किया जा रहा है। जल को व्यर्थ बहाया जा रहा है। जल की बूंद बूंद की कीमत को हम नहीं समझ पा रहे हैं क्योंकि जल के बारे में एक आम सोच यह है कि जल धरती पर से कभी भी न खत्म होने वाला असीमित संसाधन है। हमारी यह सोच बहुत ही गलत है। बहरहाल, धरती का बढ़ता तापमान धरती के जीवों के लिए ठीक नहीं कहा जा सकता है, क्यों कि वैश्विक तापमान में वृद्धि से तूफान, बाढ़, जंगल की आग, सूखा और लू के खतरे की आशंका बढ़ जाती है। एक गर्म जलवायु में, वायुमंडल अधिक पानी एकत्र कर सकता है और बारिश कर सकता है, जिससे वर्षा के पैटर्न में बदलाव हो सकता है।मानव गतिविधियों, विशेष रूप से बिजली के वाहनों, कारखानों, उधोग धंधों और घरों में जीवाश्म ईंधन (यानी, कोयला, प्राकृतिक गैस, और तेल आदि) के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों को वायुमंडल में छोड़ा जाता है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ते शहरीकरण सहित अन्य गतिविधियां भी कहीं न कहीं बहुत सी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती हैं।बहरहाल, मौजूदा हालात समस्या की भयावहता की ओर लगातार इशारा कर रहे हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने की लाख कोशिशों के बावजूद धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन से कृषि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि हम यहाँ आंकडों की बात करें तो अमेरिका के ‘हार्वर्ड टी एच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ’ के अध्ययन के अनुसार वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड के लगातार बढ़ते स्तर के कारण दुनिया में 15 करोड़ अतिरिक्त लोगों में प्रोटीन की कमी के खतरे की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। अतः धरती के बढ़ते तापमान, जलवायु परिवर्तन को लेकर हम सभी को समय रहते सचेत होने की आवश्यकता है,इसमें कोई दो राय नहीं कि जलवायु परिवर्तन की समस्या ने आज के दौर में बहुत ही भयावह व खतरनाक रूप अख्तियार कर लिया है और आज इस समस्या से मुकाबला करना आसान नहीं है। इसके लिये हम सभी को मिलजुलकर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए अपने यथेष्ठ व नायाब प्रयास करने होंगे। अकेले सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर सकती है, क्यों कि ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन अकेले सरकार की ही विषय-वस्तु नहीं है, अपितु हम सभी की विषयवस्तु है।