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भरतपुर में निर्दलीयों का दबदबा, 36 सीटों पर जीत; BJP-कांग्रेस पीछे

भरतपुर में निर्दलीयों का दबदबा, 36 सीटों पर जीत; BJP-कांग्रेस पीछे

भरतपुर. भरतपुर नगर निगम चुनाव के नतीजों ने राजनीतिक दलों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं। 65 वार्डों के सभी परिणाम सामने आ चुके हैं और निर्दलीय प्रत्याशी सबसे बड़े समूह के रूप में उभरे हैं। निर्दलीयों ने 36 वार्डों में जीत दर्ज की है। भाजपा 20 सीटों के साथ दूसरे और कांग्रेस महज 7 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही।

निर्दलीयों के खाते में कुल 36 सीटें यानी करीब 55.4 प्रतिशत वार्ड गए हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों को मिलाकर 27 सीटें ही मिलीं। इस तरह निर्दलीयों ने दोनों प्रमुख दलों की संयुक्त सीटों से भी 9 ज्यादा वार्ड जीत लिए। बसपा और RLP को भी एक-एक सीट मिली है।

इन नतीजों के बाद भरतपुर नगर निगम में बोर्ड गठन को लेकर निर्दलीय पार्षदों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। 36 निर्दलीय पार्षदों के साथ सबसे बड़ा समूह बनने के बावजूद बोर्ड की आगे की तस्वीर राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करेगी। भाजपा और कांग्रेस के लिए निर्दलीयों को साधना बड़ी चुनौती होगी।

रूपवास में भी निर्दलीयों का दबदबा

रूपवास नगर पालिका के चुनाव परिणामों में भी निर्दलीय प्रत्याशियों का प्रदर्शन मजबूत रहा। यहां 25 वार्डों में से 14 पर निर्दलीयों ने जीत दर्ज की। भाजपा को 9 और कांग्रेस को केवल 2 सीटें मिलीं।

रूपवास में भाजपा ने 19 वार्डों में प्रत्याशी उतारे थे, जबकि कांग्रेस ने 9 वार्डों में चुनाव लड़ा था। इसके बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार सबसे ज्यादा सीटें जीतने में सफल रहे।

73.13 प्रतिशत हुआ था मतदान

भरतपुर नगर निगम के 65 वार्डों और रूपवास नगर पालिका के 25 वार्डों के लिए मतगणना सुबह 8 बजे शुरू हुई। दोनों निकायों में 9 सितंबर को मतदान कराया गया था। भरतपुर नगर निगम में कुल 73.13 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था।

चुनाव के दौरान भाजपा ने भरतपुर में अपनी ताकत दिखाने के लिए प्रचार अभियान भी चलाया था। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने शहर में रोड शो किया था, जिसमें भाजपा के 57 प्रत्याशी भी शामिल हुए थे। इसके बावजूद चुनाव परिणामों में भाजपा 20 सीटों तक ही पहुंच सकी।

चुनाव के दौरान भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों को बाड़ेबंदी में भी रखा गया था। जैसे-जैसे नतीजे सामने आते गए, दोनों दलों की रणनीति और संभावित समीकरण बदलते रहे। अब भरतपुर नगर निगम में सबसे बड़ा सवाल यही है कि निर्दलीय पार्षद किस राजनीतिक खेमे के साथ जाते हैं और बोर्ड गठन की तस्वीर किस दिशा में जाती है।

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