भारत संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य बनेगा!
प्रधानमंत्री मोदी ने जी-20 के मंच से एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का आकार और ‘वीटो’ एकाधिकार के सुधारों और विस्तार का मुद्दा उठाया है। अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों, जापान के प्रधानमंत्री किशिदा और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक सरीखे विश्व-नेताओं ने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है। पैरवी और आग्रह भी किए गए हैं। यह समर्थन बीते कुछ वर्षों के दौरान निरंतर रहा है, लेकिन चीन भारत की सदस्यता के खिलाफ आक्रामक रहा है। चीन भूलता रहा है कि वह सुरक्षा परिषद में ‘वीटो’ अधिकार वाला स्थायी सदस्य है, तो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की ‘कृपा’ अथवा ऐतिहासिक गलती के कारण है। वास्तव में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का आकार और ‘वीटो’ एकाधिकार आज भी वही है, जो करीब आठ दशक पहले था।
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुतेरेस भी जी-20 सम्मेलन के दौरान उपस्थित थे, लेकिन उन्होंने बदलती विश्व-व्यवस्था के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में सुधारों और विस्तार की बात नहीं की। 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन किया गया था, ताकि देशों के बीच आपसी शांति, स्थिरता और सह-अस्तित्व का स्थायी भाव बरकरार रहे और युद्ध को नेपथ्य में धकेला जा सके। तब से लेकर आज तक कमोबेश सुरक्षा परिषद के पांच वीटोधारी देशों-अमरीका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन-में न तो कोई सुधार किया गया है और न ही यह संख्या बढ़ाई जा सकी है।
अलबत्ता 1965 में इतना विस्तार जरूर किया गया कि गैर-स्थायी सदस्यों की संख्या 10 कर दी गई। वे बारी-बारी से सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य बनाए जा सकते हैं। भारत भी इन देशों में शामिल है। रूस को सोवियत संघ के विघटन के बाद उसकी जगह स्थायी सदस्यता, वीटो समेत, दी गई। बहरहाल स्थायी सदस्य अपने ‘वीटो’ का दुरुपयोग भी करते रहे हैं। भारत के संदर्भ में चीन ‘अड़ंगेबाज’ बना रहा है, क्योंकि वह अमरीका और भारत के आतंकवाद-विरोधी प्रस्तावों पर ‘वीटो’ कर मसूद अजहर सरीखे खूंखार आतंकियों और इनसानियत के कातिलों को बचाता रहा है। इस तरह चीन अपने ‘कर्जदार दोस्त’ पाकिस्तान की किरकिरी से उसे बचाता रहा है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता का मामला बहुत लंबे समय से चला आ रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ में आखिरी जो सुधार हुए थे, वह 1963 में हुए. वह भी अस्थायी सदस्यता को लेकर किया गया था. पहले पांच स्थायी सदस्य (वीटो पावर के साथ) और छह अस्थायी सदस्य (बिना वीटो पावर के) होते थे, यानी कुल 11 सदस्य. इनकी संख्या को ही बढ़ाकर 15 किया गया। उसके बाद से ही लगातार भारत, जापान और ब्राजील जैसे देश इसमें रिफॉर्म यानी सुधार की बात कर रहे हैं, जिसके तहत भारत की स्थायी सदस्यता की भी बात होती है।
दरअसल संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में सुधारों को पारित करना ही टेढ़ी खीर है। जहां तक इसकी प्रक्रिया की बात है, तो संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली ही यह कॉल ले सकती है, कि इसमें सुधार किया जाए और उसके दो-तिहाई बहुमत के साथ ही यह संभव हो सकता है। साथ ही, वीटो पावर वाले जितने भी सदस्य हैं, यानी अमेरिकी, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के साथ चीन, इन पांचों देशों को भी राजी होना पड़ेगा। आज की तारीख में चीन को छोड़कर बाकी चारों देश इस बात पर राजी हैं। चीन ही भारत का सबसे बड़ा और मजबूत प्रतिद्वंद्वी है, वह नहीं चाहता कि भारत वीटो पावर के साथ आए।
हमारे देश को संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में दो-तिहाई बहुमत लाने में दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि पिछली बार जब भारत संयुक्त राष्ट्र का अस्थायी सदस्य बना था, तो उसे सबसे अधिक वोट मिला था। दिक्कत केवल चीन से है, क्योंकि वही भारत की राह में रोड़ा बनता है. जो 10 अस्थायी सदस्य होते हैं, वह हरेक साल बदलते हैं और पिछले साल भारत को यूएनएससी का प्रेसिडेंट होने का भी मौका मिला है। पिछली बार भी 150 से अधिक देशों ने भारत के पक्ष में वोटिंग दी थी। भारत को आम सभा में दिक्कत नहीं है। अभी भी भारत अफ्रीकन यूनियन को जी-20 में लाया है, तो अफ्रीका हो, एशिया हो, यूरोप हो, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो भारत को दुनिया में अधिकांश देशों का समर्थन मिला हुआ है। यही प्रधानमंत्री मोदी के 10 वर्षों की सफलता है। वैश्विक राजनीति में भारत का कद बढ़ा है और भारत भी बड़े संतुलन के साथ काम कर रहा है।
फिलहाला, रूस-यूक्रेन युद्ध हो, या रूस-अमेरिका के मतभेद हों, चीन-अमेरिका के बीच का तनाव हो, भारत ने अपना संतुलन बनाए रखा है। भारत एक ऐसे ‘मित्र देश’ के तौर पर उभरा है, जो बिना किसी गुट का सदस्य बने सबसे बात कर सकता है, सबको एक प्लेटफॉर्म पर ला सकता है। अभी खत्म हुए जी-20 सम्मेलन में भी यह देखा है, जहां तमाम विरोधी देशों और गुटों के बाद भी भारत एक सर्वसहमत घोषणापत्र ला सका है।
वहीं जापान, जर्मनी, भारत तो विश्व की सबसे बड़ी तीसरी, चैथी और 5वीं अर्थव्यवस्थाएं हैं। उनकी स्थायी भागीदारी को सुरक्षा परिषद में कैसे रोका जाता रहा है? आम सहमति के लिए इन देशों के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी देशों-पाकिस्तान, इटली, अर्जेन्टीना और दक्षिण कोरिया और अफ्रीकी संघ-की आवाज भी मिलाई गई है। हालांकि जी-4 के देश सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के पक्षधर हैं, जबकि आम सहमति के लिए जुड़े देश चाहते हैं कि गैर-स्थायी सदस्यों की सीटें बढ़ाई जाएं।
अफ्रीकी संघ चाहता है कि दो अफ्रीकी सीटें स्थायी रखी जाएं और उन्हें ‘वीटो’ अधिकार भी दिया जाए। जी-20 को जी-21 बनाना हो (उसमें 55 देशों के अफ्रीकन यूनियन को सदस्य बनाना) या दुनिया के अलग-अलग ब्लॉक्स में अपनी जगह और बात रखना, भारत यह काम बखूबी कर रहा है। भारत के अफ्रीका के साथ एक ऐतिहासिक संबंध भी हैं। हमारे साथ अफ्रीका के भी देश उपनिवेशवाद से पीड़ित रहे हैं। गांधी को लेकर हमारे और अफ्रीका के बीच मधुरता है और इंडियन डायस्पोरा भी कई अफ्रीकी देशों में बहुत अच्छा कर रहा है। चीन भी अफ्रीका को अपनी ओर खींचना चाहता है, लेकिन वह कर्ज के जाल में फंसाता है, देशों की संप्रभुता पर हमला करता है, लेकिन भारत ग्लोबल साउथ की आवाज है। अगर भारत वीटो पावर के साथ संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य बनता है तो वह एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका इत्यादि सभी की आवाज बनेगा, सारी दुनिया के विकासशील देशों की बात रखेगा।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले एक दशक में जो विकास हुआ है, उससे भारत की साख बढ़ी है, दूसरे देशों का भरोसा बढ़ा है और हमारी स्थिर राजनीतिक हालत और अर्थव्यवस्था की वजह से दूसरे देश भी भारत का समर्थन कर रहे हैं। चीन समूचा खेल बिगाड़ता रहा है, क्योंकि वह पाकिस्तान, इटली वाले ‘आम सहमति के लिए जुड़े’ देशों के साथ है। चीन और रूस की हरकतों से परेशान पश्चिमी देश तो चाहते हैं कि ब्राजील, भारत और जापान जैसे देशों को संयुक्त राष्ट्र में लाया जाए। उनका बस चले तो कल को भारत को ले आएं, चार देशों का पूरा समर्थन भी इनको हासिल है, लेकिन चीन उस राह में रोड़ा है। पश्चिमी देश जानते हैं कि भारत एक प्रजातांत्रिक देश है और दुनिया के लिए मददगार है सिरदर्द नहीं। इसलिए, इतना तो तय है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता जल्द मिलेगी। बहरहाल सुरक्षा परिषद को मौजूदा हालात और विश्व-व्यवस्था में प्रासंगिक बने रहना है, तो सुधारों और विस्तार की पहल करनी ही पड़ेगी। इस मसले पर गुटबाजी नहीं होनी चाहिए।