116 साल पहले विदेश में फहराया भारत का झंडा
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी उन चुनिंदा शख्सियतों में से एक भीकाजी कामा की आज 24 सितंबर
2023 को 162 वीं जयंती है। मैडम भीकाजी कामा उस शख्सियत का नाम है जिसने भारत के बाहर देश का
झंडा बड़े स्वाभिमान के साथ फहराया। भारतीय मूल की पारसी परिवार में जन्मी मैडम भीकाजी जी रुस्तम
कामा का जन्म 24 सितंबर 1861 को हुआ था। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में देशवासियों के साथ विदेशी मूल
के नागरिकों का भी बड़ा योगदान था। इनमें मैडम भीकाजी का नाम मुख्य है। 46 साल की पारसी महिला
भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टुटगार्ट में हुई दूसरी इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस में ये झंडा फहराया था।
यह भारत के आज के झंडे से अलग, आजादी की लड़ाई के दौरान बनाए गए कई अनौपचारिक झंडों में से
एक था। यह बात आजादी से चार दशक पहले की 1907 की है। 1907 में जर्मनी के शहर स्टुटगार्ट में
इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस का आयोजन किया जा रहा था। इस कांग्रेस में हिस्सा ले रहे सभी लोगों के
देशों का झंडा लगा हुआ था। लेकिन भारत के लिए ब्रिटिश झंडा था। मैडम कामा को यह स्वीकार नहीं था।
उन्होने एक नया झंडा बनाया और सभा में फहराया। भीकाजी कामा द्वारा बनाया झंडा आज के झंडे से
बिल्कुल अलग था। इसमें हरे, पीले और लाल रंग की तीन पट्टियां थीं। सबसे ऊपर हरा रंग था। जिसपर 8
कमल के फूल बने हुए थे। ये आठ फूल उस वक्त भारत के 8 प्रांतों को दर्शाते थे। बीच में पीले रंग की पट्टी
थी। पीली पट्टी पर वंदे मातरम लिखा था। सबसे नीचे नीले रंग की पट्टी थी जिस पर सूरज और चांद बने
थे पुणे की केसरी मराठा लाइब्रेरी में ये झंडा अब भी सुरक्षित रखा है। उन्होंने विदेश में रहकर भी भारतीय
क्रांतिकारियों की भरपूर मदद की थी। उनके ओजस्वी लेख और भाषण क्रांतिकारियों के लिए अत्यधिक
प्रेरणा स्रोत बने।
भीकाजी हमेशा ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी गतिविधियों में लगी रहती थी। वर्ष 1896 में मुम्बई में प्लेग फैलने
के बाद भीकाजी ने इसके मरीजों की सेवा की थी। बाद में वह खुद भी इस बीमारी की चपेट में आ गई थीं।
इलाज के बाद वह ठीक हो गई थीं लेकिन उन्हें आराम और आगे के इलाज के लिए यूरोप जाने की सलाह दी
गई। वर्ष 1906 में उन्होंने लन्दन में रहना शुरू किया जहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध भारतीय क्रांतिकारी
श्यामजी कृष्ण वर्मा, हरदयाल और वीर सावरकर से हुई। लंदन में रहते हुए वह दादाभाई नवरोजी की निची
सचिव भी थीं। दादाभाई नोरोजी ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स का चुनाव लड़ने वाले पहले एशियाई थे। जब
वो हॉलैंड में थी, उस दौरान उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर क्रांतिकारी रचनाएं प्रकाशित करायी थी
और उनको लोगों तक पहुंचाया भी। वे जब फ्रांस में थी तब ब्रिटिश सरकार ने उनको वापस बुलाने की मांग
की थी पर फ्रांस की सरकार ने उस मांग को खारिज कर दिया था। इसके पश्चात ब्रिटिश सरकार ने उनकी
भारतीय संपत्ति जब्त कर ली और भीखाजी कामा के भारत आने पर रोक लगा दी। उनके सहयोगी उन्हें
भारतीय क्रांति की माता मानते थे, जबकि अंग्रेज उन्हें कुख्यात् महिला, खतरनाक क्रांतिकारी,
अराजकतावादी क्रांतिकारी, ब्रिटिश विरोधी तथा असंगत कहते थे।
उनके सम्मान में भारत में कई स्थानों और गलियों का नाम उनके नाम पर रखा गया है। 26 जनवरी 1962
में भारतीय डाक ने उनके समर्पण और योगदान के लिए उनके नाम का डाक टिकट जारी किया था। भारतीय
तटरक्षक सेना में जहाजों का नाम भी उनके नाम पर रखा गया था। देश की सेवा और स्वतंत्रता के लिए सब
कुछ कुर्बान कर देने वाली इस महान महिला की मृत्यु 1936 में मुम्बई के पारसी जनरल अस्पताल में हुयी।