त्योहारी सीजन में महंगाई ने फिर दिखाए अपने तेवर
बाल मुकुन्द ओझा
त्योहारी सीजन की शुरुआत से पहले ही महंगाई का तड़का शुरू हो गया है। रक्षा बंधन और जन्माष्टमी के बड़े त्योहारों के अवसर पर महंगाई की मार रसोई पर पड़ने से लोगों के घरों का बजट गड़बड़ा गया है। चालू वर्ष में जनता को झटके पर झटके लग रहे हैं। अमेरिका - ईरान इजरायल युद्ध के चलते LPG गैस के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई। पेट्रोल- डीजल भी महंगा हुआ और अभी जनता थोड़ा संभलने की कोशिश कर ही रही थी कि महंगाई डायन का एक और बम फूट गया। चीनी, अरहर दाल और चावल के साथ-साथ आलू-प्याज के दाम भी तेजी से बढ़ गए हैं। रसोई का बजट गड़बड़ा गया है। चीनी के बाद अब दाल-चावल से लेकर सब्जियों के दामों में भी आग लग गई है। एक महीने में चीनी 20 रुपये महंगी हो चुकी है। तो वहीं प्याज और सब्जियों के दाम भी आसमान छू रहे हैं। आलू और प्याज के अलावा हरी सब्जी के दाम काफी बढ़ गए हैं। खाने-पीने की चीजों और रोजमर्रा की जरूरत के सामान महंगे होने से त्योहारों के सीजन में आम आदमी के घर का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक लगातार बारिश और बाढ़ के कारण सब्जियों की सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे बाजार में इनकी कीमतों में भारी तेजी देखने को मिल रही है। अचानक दाम बढ़ने का असर मिठाइयों व अन्य खाद्य सामग्री के साथ चाय-नाश्ते और घर के बजट पर भी पड़ रहा है। हालांकि केंद्र सरकार ने चीनी के शुल्क मुफ्त आयात को मंजूरी दी है। बावजूद इसके फिलहाल बाजार में बढ़े दाम चिंता का कारण बने हुए हैं।
आम आदमी पर महंगाई का बोझ एक बार फिर बढ़ गया है। अभी चीनी और प्याज के रेट आसमान पर पहुंचे हैं। इसका असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ा है। प्याज से लेकर खाद्य वस्तुओं के दामों का आकाश छूना हैरानी की बात है। इस दौरान खुफिया तंत्र, कृषि विपणन बोर्ड की बाजारों में सक्रियता बढ़ाकर जमाखोरों तथा कालाबाजारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करने के आदेश जारी करने चाहिए। न तो बढ़ती कीमतों का फायदा कृषक को मिलता है और न ही घटती कीमतों का फायदा उपभोक्ता को मिलता है। इसका लाभ जमाखोर, कालाबाजारी करने वाले उड़ा ले जाते हैं।
जब तक कालाबाजारी, मुनाफाखोरी और जमाखोरी पर सरकार रोक नहीं लगाती महंगाई बढ़ती रहेगी। देश में जितनी भी समस्याएं हैं चाहे, महंगाई हो, जमाखोरी, मुनाफा-खोरी अथवा काला बाजारी इन सबकी जड़ों में भ्रष्टाचार रूपी दीमक लगा हुआ है, जिसका पोषण व संरक्षण राजनीतिक लोग करते हैं। सरकार किसी भी दल की आ जाए यह काले कारनामें बन्द नहीं हो सकते क्योंकि सत्ता बदलते ही बेईमान लोगों की आस्था भी बदल जाती है। इनके सुर भी बदल जाते हैं। इसलिए कोई परिवर्तन नहीं आता। हालात जस के तस ही रहते हैं।
जब बढ़ती कीमतों का लाभ किसानों तक और घटी हुई कीमतों का लाभ उपभोक्ताओं तक न पहुंच रहा हो तब जाहिर है कि इन दोनों के बीच में ही कहीं गुम होने लगा है क्योंकि इन दोनों के बीच बाजार रहता है। ऐसे में बाजार की भूमिका पर संदेह किया जाना स्वाभाविक है। बाजार में किसी खाद्य वस्तु के मनमर्जी से ऐंठे जा रहे दाम लचर प्रशासनिक व्यवस्था का संकेत देते हैं। ऐसे में स्थानीय प्रशासन बाजार पर कड़ी नजर रखे। कारकों को चिन्हित कर दंड की व्यवस्था अंततरू निश्चित ही अच्छे परिणाम देगी। लेकिन उससे पहले जरूरी है कि किन तरीकों से इन कारकों का सही पता लगाया जा सकता है।
देश में महंगाई का उतार-चढ़ाव आर्थिक मायने में किसानों एवं उपभोक्ताओं को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। महंगाई के उतार-चढ़ाव में लाभ से परे किसानों की व्यथा उपभोक्ताओं के समान ही है क्योंकि महंगाई के अर्थशास्त्र में सरकार की भूमिका निष्प्रभावी है। महंगाई के संदर्भ में सरकार की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि वह महंगाई दर को नियंत्रित नहीं कर सकती। उसका काम यह बताना नहीं है कि महंगाई के कम-ज्यादा से किसको कितना फायदा पहुंचा है। आवश्यकता है कि सरकार बढ़ती महंगाई के अर्थशास्त्र से सबक ले और बढ़ती महंगाई पर अंकुश लगाने का प्रयास करे।
खाद्य पदार्थ महंगे हो या सस्ते इसका लाभ न तो किसान को मिलता है और न ही उपभोक्ताओं को। मंडियों में बैठे बिचौलियों की इसमें चांदी होती है। प्याज, टमाटर आदि किसान से सस्ते में लिये जाते हैं और दुकानों पर आते ही इनका दाम चौगुणा हो जाता है। इसमें कमीशनखोरों का भारी कमीशन होता है। इसके नियंत्रण की सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है। इसका सबसे अच्छा हल तो यह है कोई ऐसी योजना बनाई जाये जिसमें किसानों के उत्पादन सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचे ताकि बिचौलियों से मुक्ति मिल सके।