मणिपुर की घटना से प्रधानमंत्री ही क्या सारा देश शर्मसार है
मणिपुर की घटना ने पूरे देश को शर्मसार कर दिया है। नेताओं से लेकर आम जनता तक, हर कोई इस घटना की कड़ी निंदा कर रहा है। मणिपुर में दो महिलाओं को नग्न कर घुमाने की इस घटना पर पीएम मोदी ने कड़ी कार्रवाई की बात कही, गृह मंत्री अमित शाह ने मणिपुर के सीएम को फोन लगाया। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सरकार से कहा कि अगर आप कुछ नहीं कर सकते तो हम करेंगे। इस बीच संसद के मानसून सत्र में भी इस पर जोरदार हंगामा हुआ। वीडियो सामने आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पीड़ा जताई है। उन्होंने कहा कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। वहीं मणिपुर के मुख्यमंत्री एन। बीरेन सिंह ने इस घटना को अमानवीय बताया है। साथ ही कहा कि अपराधी मौत की सजा के हकदार हैं।
मणिपुर में कुकी समुदाय की महिलाओं से दरिंदग का वीडियो वायरल होने के बाद पूरे देश में गुस्से का माहौल है। वीडियो में दिखाई दे रहा है कि महिलाओं को निर्वस्त्र कर वहशियों की भीड़ कानून, पुलिस और सरकार सबसे बेखौफ होकर घूम रही है। इस घटना से 140 करोड़ नागरिक शर्मसार हुए हैं, क्योंकि देश के जिस पूर्वोत्तर से सूरज उगता है वहां बेटियों का सम्मान डुबा दिया गया है। बता दें कि मणिपुर केस में पुलिस ने 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है।
पर इस समय लाख टके का सवाल यह है कि दोषी कौन है? मणिपुर की इंफाल घाटी के मैती बहुल थौबल जिले की वह भीड़, जिसके सामने दो महिलाओं को निर्वस्त्र किया गया या वो लोग जिन लोगों ने महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाई या उनके साथ सामूहिक बलात्कार में शामिल हुए? क्या कांगपोक्पी जिले की पुलिस दोषी नहीं है, जिसने 18 मई को एफआईआर दर्ज किया और ठीक दो महीने बाद वीडियो वायरल होने तक कोई कार्रवाई नहीं की? क्या थौबल जिले की पुलिस के सिर यह अपराध नहीं आएगा, जिसकी आंखों के सामने कुकी-जोमी समुदाय के एक पूरे परिवार को उजाड़ दिया गया?
घटना चार मई की है, जब वीडियो में दिख रही 20 साल की युवती की आंखों के सामने उसके पिता और भाई की हत्या कर दी गई और पूरा परिवार उजाड़ दिया गया। दोनों महिलाओं को आतातायी भीड़ पुलिस के हाथों से खींच कर ले गई और उनको निर्वस्त्र किया, उनके साथ बलात्कार किया। तो क्या वह पुलिस इस अपराध में शामिल नहीं मानी जाएगी, जिसके सामने यह अत्याचार हुआ? फिर किन दोषियों को तलाश किया जा रहा है? चीफ जस्टिस को कार्रवाई करनी है तो हाई कोर्ट से ही क्यों नहीं शुरू करते, जिसके एक आदेश के बाद हिंसा की शुरुआत हुई थी? प्रधानमंत्री को कार्रवाई करनी है तो मुख्यमंत्री से शुरू क्यों नहीं करते, जिसके राज में स्त्रियों के साथ ऐसी बर्बर और अमानवीय घटना हो रही है और जिसकी वजह से पूरी दुनिया के सामने भारत शर्मसार हो रहा है?
दो महिलाओं के साथ अमानवीयता का वीडियो सामने आने के 12 घंटे के बाद राज्य के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने अपनी पीठ थपथपाते हुए कहा कि इस मामले में पहली गिरफ्तारी हो गई है। यह कितने शर्म की बात है! चुल्लू भर पानी में डूब मरने की बात है कि घटना के 77 दिन के बाद राज्य का मुख्यमंत्री कह रहा है कि पहली गिरफ्तारी हुई है! क्या राज्य के मुख्यमंत्री को इस घटना की पहले से जानकारी नहीं थी? अगर जानकारी नहीं थी तो राज्य के सर्वोच्च प्रशासनिक प्राधिकार के नाते उनको पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं है। वीडियो में दिख रहे दरिंदों को गिरफ्तार करने से पहले थौबल और कांगपोक्पी जिले की समूची पुलिस फोर्स पर कार्रवाई करने की जरूरत है, जिन्होंने सब जानते बूझते कोई कार्रवाई नहीं की। जिस मैती बहुल थाना क्षेत्र की यह घटना है वहां के सभी पुलिसकर्मियों और प्रशासनिक अधिकारियों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए। जिस कुकी-जोमी बहुल थाना क्षेत्र में जीरो एफआईआर दर्ज हुई थी, उस थाना क्षेत्र के भी सभी पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को गिरफ्तार करके उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जाना चाहिए।
यह कोई सामान्य अपराध नहीं है, जिसमें दो-चार दोषियों की गिरफ्तारी हो और मामला रफा-दफा हो। यह समूचे सिस्टम के विफल होने की घटना है। अगर आप घटना की क्रोनोलॉजी सुनेंगे तब समझ में आएगा कि किस तरह से पूरे सिस्टम ने इस घटना को होने दिया और उसके बाद दबाए रखा। मणिपुर में तीन मई को कुकी और मैती समुदायों के बीच हिंसा की शुरुआत हुई थी। उसके अगले दिन चार मई को थौबल जिले के एक मैती बहुल इलाके में कुकी-जोमी समुदाय के एक परिवार के घर पर भीड़ ने हमला किया। परिवार के पांच लोग जान बचा कर भागे और पुलिस के पास पहुंचे। लेकिन भीड़ ने पुलिस के हाथों से उनको छीन लिया और दो पुरुष सदस्यों की मौके पर ही हत्या कर दी। उसके बाद दो महिलाओं को निर्वस्त्र करके पूरे गांव में घुमाया गया, उनके सम्मान को ठेस पहुंचाई गई और उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। किसी तरह से महिलाएं वहां से भाग कर कुकी-जोमी बहुलता वाले इलाके में पहुंचीं और पुलिस के पास जाकर मुकदमा दर्ज कराया। इस वारदात के 14 दिन तक किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। 18 मई को गांव के प्रमुख ने पुलिस को शिकायत दी। इस शिकायत के 34 दिन बाद 21 जून को मुकदमा कायम किया गया। और 29 दिन बाद जब वीडियो वायरल हुआ और बवाल मचा तो गिरफ्तारियां शुरू हुई । यदि यह वीडियो वायरल नहीं होती तो यह शर्मनाक घटना इतिहास बन कर रह जाती ।
इस घटना का वीडियो बनाया गया था और सैकड़ों लोग नंगी आंखों से इस घटना गवाह बने थे। फिर भी पूरे मणिपुर में मुर्दा शांति बनी रही। हैरानी की बात है कि शांति बहाली के प्रयास के लिए 29 मई को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मणिपुर के दौरे पर गए। वे कुकी और मैती दोनों समुदायों को राहत शिविरों में गए। क्या किसी ने उनको इस घटना के बारे में नहीं बताया? अगर नहीं बताया है तो अभी तक उन्होंने मुख्यमंत्री से लेकर पुलिस, प्रशासन और खुफिया पुलिस के लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की है?
संपूर्ण मानवता को शर्मसार करने वाली इस घटना की जानकारी हजारों लोगों को थी। पुलिस के लोग घटना के बारे में जानते थे। निश्चित रूप से राजनीतिक आकाओं को इसकी जानकारी होगी। लेकिन किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर मणिपुर में पिछले ढाई महीने से चल रही हिंसा समाप्त क्यों नहीं हो रही है? हिंसा कैसे समाप्त होगी, जब इस तरह की वीभत्स घटना पर भी पुलिस और प्रशासन आंखें बंद किए रहेगा? इससे अपराधियों के हौसले बढ़े और दूसरी ओर क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया की भावना भी प्रबल हुई। हिंसा भड़कने के दूसरे दिन हुई इस अमानवीय घटना की प्रतिक्रिया में न जाने कितनी हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया गया। अगर पुलिस ने उसी दिन कार्रवाई की होती और दोषियों को गिरफ्तार किया होता तो शायद हिंसा को रोकने में कामयाबी मिलती। लेकिन इस वीभत्स घटना को झूठे जातीय गर्व का चोला पहना दिया गया। इस्लामी देशों से लेकर अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी देशों में भी जातीय, नस्ली हिंसा होती है लेकिन ऐसी वीभत्स घटना उन देशों से भी सुनने को नहीं मिलती हैं।
पहली नजर में यह पुलिस और प्रशासन की विफलता दिखती है लेकिन असल में यह एक समाज के नाते पूरे देश की और हर नागरिक की विफलता है। जिस समाज में महिलाओं के साथ इस तरह की घटना होती है वह समाज कहीं से सभ्य कहे जाने लायक नहीं है। हम बलात्कार के दोषियों की रिहाई पर माला पहना कर उनका स्वागत करते हैं। हम स्त्रियों का यौन उत्पीड़न करने वाले को इसलिए बचाते हैं कि वह एक खास दल का सांसद है। फिर हम कैसे ऐसी घटनाओं से बच सकते हैं? हम कैसे एक समाज के रूप में विफल रहे हैं यह इस बात से भी पता चलता है कि सैकड़ों लोगों की जिस भीड़ के सामने इस शर्मनाक घटना को अंजाम दिया जा रहा था उस भीड़ में किसी की अंतरात्मा नहीं जागी। किसी ने आगे बढ़ कर उन स्त्रियों के शरीर पर एक कपड़ा नहीं डाला। यह सही है कि दो निर्वस्त्र स्त्रियां वीडियो में दिख रही हैं लेकिन असल में नंगे वे सैकड़ों लोग थे, जो उस भीड़ का हिस्सा थे। वे जीते जागते लोग थे लेकिन उनकी आत्मा मर चुकी थी। सोचें, उस समय उन स्त्रियों का मन कैसे चीत्कार रहा होगा? क्या वे धरती फट जाने की कामना कर रही होंगी या पूरी सृष्टि के नष्ट हो जाने की प्रार्थना कर रही होंगी? घटनास्थल के हजारों मील दूर आज जिन लोगों का सचमुच कलेजा फट रहा है वे भी उन महिलाओं की वास्तविक पीड़ा का अंदाजा नहीं लगा सकते हैं। यह पाप हम सब पर भारी है, सब इस पाप के भागीदार हैं, कोई क्षमा का हकदार नहीं है। मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर राज्य भारत माता के माथे की शोभा है । इनका लहूलुहान स्वरूप पूरे भारत को भीतर से पीड़ा पहुंचाता है इसलिए संसद से लेकर सड़क तक मणिपुर में संविधान का शासन स्थापित करने के प्रयास होने चाहिए। इसके लिए बहुत जरूरी है कि संसद में सभी काम रोककर पूरी बहस कराई जाये जिससे मणिपुर की जनता को यह सन्देश जाये कि उनके इस दुख में पूरा भारत और इसका हर राजनैतिक दल शामिल है। दुख की घड़ियों में हमारे लोकतन्त्र की यह परंपरा रही है कि सभी राजनैतिक दल राजनीति छोड़ कर केवल लोगों की बात करते हैं। गांधी बाबा हमें यही पढ़ा कर गये हैं जिनके सिद्धान्तों को आज पूरी दुनिया अपना रही है।
-अशोक भाटिया