कुत्तों का मूड नहीं, इंसानों की जान मायने रखती है
देश की सर्वोच्च अदालत आजकल डॉग लवर और डॉग हेटर की सुनवाई में व्यस्त है। आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उससे होने वाले हादसों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने सुनवाई करते हुए कहा कि, यह मसला केवल कुत्तों के काटने तक सीमित नहीं है, बल्कि आम लोगों की सुरक्षा और सड़क दुर्घटनाओं से भी जुड़ा है। दोनों पक्ष अपनी अपनी दालीले पेश कर रहे है। अदालत में कुत्तों के पक्ष और विपक्ष में दिलचस्प और अनूठी बहस सुनने को मिल रही है। अदालत की टिप्पणियां भी इस दौरान सुनने को मिल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के खतरे पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि यह नहीं पढ़ा जा सकता कि कोई कुत्ता कब काटने के मूड में है और कब नहीं। बहस के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि कुत्ते सड़कों पर नहीं होते हैं तो सुप्रीम कोर्ट ने नाराज होते हुए कहा कि लगता है आपकी जानकारी पुरानी है। अदालत ने माना कि किसी भी व्यक्ति के लिए यह समझना संभव नहीं है कि कोई कुत्ता कब शांत रहेगा और कब अचानक आक्रामक हो सकता है। कुत्तों पर गुरुवार को भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी रही। पक्ष और विपक्ष के वकीलों ने अपना अपना पक्ष रखा।
गौरतलब है पिछले साल 7 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सरकारी दफ्तर और खेल परिसरों जैसे संवेदनशील स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाया जाए।
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में पिछले वर्ष कुत्तों के काटने के 37 लाख केस दर्ज हुए। इनमें 74 मौतें रेबीज से हुई। इस तरह दस हज़ार से अधिक लोग प्रतिदिन कुत्तों से काटने के शिकार हुए। हालाँकि कोर्ट के फैसलों का जानवर प्रेमी लोगों ने विरोध किया है।
देखा गया है देशभर के छोटे नगरों से लेकर बड़े मैट्रो शहरों में आवारा पशुओं के कातिलाना कहर की खबरें अकसर मीडिया में सुर्खियां बनती रहती हैं फिर भी उन पर लगाम नहीं कसी जा रही। सही तो यह है आवारा पशुओं का यह मुद्दा हमें देखने में छोटा लगता है लेकिन है बड़ा गंभीर। आवारा कुत्ते भी लोगों की नाक में कम दम नहीं करते। बच्चे तो उन के डर से घर से बाहर तक नहीं निकल पाते। अब तो शहरों में गाय भैंस या सांड़ ही क्यों, बंदरों का खौफ भी देखा जा रहा है। अस्पतालों में कुत्तों के अलावा बंदरों के काटने के बहुत से मामले सामने आने लगे हैं। आवारा पशुओं की समस्या पूरे देश में विकराल रूप ले रही है। आए दिन आवारा पशुओं की धमाचौकड़ी की चपेट में आकर निर्दोष लोग अपने हाथ-पैर तुड़वाने को मजबूर है तो वाहनों को भी नुकसान पहुंच रहा है। शहरी इलाकों में कुत्तों के साथ गायों के झुंड विचरण करते मिल ही जाएंगे। इस कारण न केवल लोगों को आने-जाने में दिक्कत होती है बल्कि सड़कों पर गंदगी फैलती है। इन पशुओं से एक्सीडेंट की भी समस्या बढ़ रही है। रात में मोहल्ले में गायों की लाइन लग जाती है और सुबह रोज गंदगी फैली रहती है जिसको साफ करने में घंटों समय लगता है। गायों तथा सांडों के बड़े झुंड, बाजारों, गलियों, मुख्य सड़कों तथा अन्य सार्वजनिक स्थलों पर सरेआम टहलते हुए राहगीरों के लिए खतरा बने हुए हैं।
आवारा पशुओं की भरमार एवं उनके आतंक के कारण रहवासियों को तरह-तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। आए दिन बाजार क्षेत्र में दुकानदारों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। बाजार क्षेत्र सहित सकरी गलियों में कुत्तों, साँडों व आवारा पशुओं का निरंकुश होकर घूमना लोगों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। इनके आपस में झगड़ने के कारण कई बुजुर्ग-महिलाएँ एवं बच्चे भी इनकी चपेट में आने के कारण चोटिल हो जाते हैं। कभी-कभार तो छोटे स्कूली बच्चे इन आवारा पशुओं के आपसी झगड़े को देख काफी भयभीत हो जाते हैं। अक्सर खाद्य व सब्जी आदि की दुकानों पर भी यह अपना मुँह मारते रहते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में समुचित सफाई नहीं होने और जगह-जगह कचरे के ढेर लग रहने से वहाँ आवारा मवेशियों का जमघट लगा रहता है। भयावह स्थिति तब बन जाती है, जब ये आवारा मवेशी मार्गों के किनारे लगे कचरे के ढेरों पर आपस में झगड़ते हैं। कई बार तो बाजार क्षेत्र में भी इनके आपस में झगड़ने से यातायात बाधित होता है। दिन हो या रात आवारा पशु सड़क पर झुंड बनाकर बैठ जाते हैं जिससे लोगों का निकलना मुश्किल हो जाता है। कई बार तो स्थिति ऐसी बन जाती है कि लोगों को वाहन रोककर इन्हें हटाना पड़ता है तब आगे का रास्ता खुलता है। आवारा पशुओं ने लोगों को परेशान कर दिया है। शहरी क्षेत्रों के मुख्य बाजार और कॉलोनियां के मार्गों पर जाकर अठखेलियां करने लगते हैं और दुर्घटना का कारण बनते हैं जिसके चलते प्रतिदिन कोई ना कोई दुर्घटना घटती रहती है। स्थिति रात के समय और भी घातक हो जाती है। इन आवारा पशुओं में से कुछ का रंग काला होने की वजह से किसी भी वाहन चालक के लिए दूर से इन्हे देख पाना बहुत मुश्किल होता है। कई वाहन चालक इनका शिकार बनकर मौत के मुंह में समा चुके हैं।
-बाल मुकुन्द ओझा