जोधपुर : सुख़न सराय में ’आनन्दी’ पर सार्थक चर्चा
जोधपुर। रिवायत ने थियेटर सेल के साथ मिलकर शुरू किया गया कहानियों पर चर्चा का कार्यक्रम ‘सुखन सराय‘ में इस बार गुलाम अब्बास की वेश्याओं और नगरपालिका के टकराव वाली कहानी ‘आनंदी‘ पर खुलकर चर्चा हुई। किसी ने इसकी प्रासंगिकता पर प्रश्न किया। किसी ने कहानी में संवाद की कमी को इंगित किया। कोई इसमें सजावट से नाखुश था तो अधिकतर ने पुरूष की दोहरी मानसिकता को दोषी ठहराया। कभी फिल्म अभिनेता के हवाले आये तो कभी फिल्मी गीत का भी उल्लेख हुआ। इस तरह नगर के साहित्यकारों और सुधि पाठकों के बीच हुई इस चर्चा में सहमति-असहमति के बीच आनंदी कहानी के चरित्र और चरित्रहीनता को ले कर अलग-अलग विचार सामने आये। बीच बीच में प्रसंगवश शेर भी पढ़े जाते रहे जिससे बात रोचकता के साथ आगे बढ़ती रही। परिचर्चा की सार्थकता ये रही की युवाओं ने सक्रिय भागीदारी निभाई और साथ ही वरिष्ठ साहित्यकरों ने भी अपने-अपने विचार खुलकर रखे। इस प्रकार शहर में यह जो नया सिलसिला शुरू हुआ है इससे ना सिर्फ युवा पीढी साहित्य पठन की ओर बढ़ती दिख रही है बल्कि पढ़ने के साथ-साथ चिन्तन-मनन की ओर भी प्रेरित हो रही है। पद्मश्री शाइर और चिंतक शीन काफ निज़ाम ने इस बार भी पूरे समय उपस्थित रह कर युवाओं का हौसला बढ़ाया और समय≤ पर परिचर्चा की दिशा को कहानी पर केंद्रित किया, साथ ही अपने कई प्रश्नों से उपस्थितजन को कहानी के मर्म तक पहुंचने के संकेत छोड़े। कहानी के चरित्र पर बार-बार आये सवाल पर निज़ाम ने अपना दृष्टिकोण यह कह कर रखा कि पूरी कहानी ही चरित्र है। सड़क की लंबाई के प्रश्न को वक्ताओं के विवेक पर छोड़ते हुए यह बताया कि कहानी को कैसे पढ़ा जाना चाहिये। सुप्रसिद्ध कहानीकार डॉ. हरीदास व्यास ने कहा कि ‘आनंदी‘ कहानी में आदमी के विरोधाभास हैं। साहित्य का आउटपुट ही ध्वनि है इस कहानी में कोई साहित्यिक ध्वनि सुनाई नहीं देती लेकिन इस कहानी ने कई संगठनों के मुंह पर ताले लगा दिये इसलिये यह कहानी अविस्मरणीय है। शाइर एवं राजस्थान उर्दू अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष डाॅ. निसार राही ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कहानीकर ने अपने ख़याल को अमली जामा पहनाया है। पूरी कहानी में ज़बान और भाषा पर ज़ोर है जिस्म की नुमाईश पर ज़्यादा ज़ोर है, रूह पर नहीं। कहानियों में विशेष रुचि से पढ़ने वाले पाठक अनिमेष जोशी के अनुसार कहानी के पैटर्न पर पाश्चात्य हवालों से बात करते हुए कहा कि कहानी को कहानी के रूप में पढ़ना चाहिये ना कि उसके लेखक व शीर्षक के आधार पर, मैं इस कहानी से जुड़ नहीं पाया, लेखक को कहानी में शीर्षक को खोलना चाहिये था, वहीं कार्यक्रम संयोजक, शाइर और उर्दू व्याख्याता डॉ. इश्राकुल इस्लाम माहिर ने ‘आनंदी‘ कहानी की प्रासंगिकता को शहरों के नाम बदलने, बाज़ार और घोड़े की पीड़ा से साबित करने की कोशिश की, वहीं सांप और चमगादड़ के आपसी सम्बन्धों, मुहावरों, समय के साथ शब्दावली में बदलाव और गीदड़ को बतौर प्रतीक कहानी की घटनाओं और वर्तमान की घटनाओं से जोड़ने के साथ-साथ कई प्रश्न भी उठाये। शाइर मुहम्मद अफजल जोधपुरी ने कहानी पर बात करते हुए कहा कि हक़ीक़त मैं जो दाग़ हमारे भीतर लगे हुऎ हैं। इंसान उनसे लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पता इसलिये बाहर वाली चीजों को अपने से दूर खदेड़ देता है। कवि एवं रंगकर्मी राकेश मूथा ने चर्चा में भाग लेते हुए बताया कि जिस दौर में यह कहानी लिखी गई उस दौर की यह एक अलग कहानी ही नहीं बल्कि आधुनिकतम कहानी थी, ये कहानी न वेश्या के ऊपर न आप के ऊपर है यह सिर्फ एक दृश्य है। यह कहानी पाठक को खुद से मिलाती है। कहानीकर का यही काम है। थियेटर सैल के निदेशक डाॅ. हितेन्द्र गोयल ने कहानी के कथ्य और प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाए। रंगकर्मी मज़ाहिर सुलतान ज़ई ने बताया कि आनन्दी नामी बस्ती मात्र समस्या का स्थान परिवर्तन बताता है लेकिन बुराई को ज्यों का त्यों क़ायम रखता है, व्याख्याता ज़ाहिद हुसैन चुन्दड़ीगर ने कहा कि कहानी जहां से शुरू हुई वापस वहीं पर आकर ख़त्म होती है। कवि कुलदीप सिंह भाटी के अनुसार समाज के उपेक्षित लोग ही समाज का निर्माण करते हैं। कवयित्री डॉ.मनीषा डागा की चर्चा इस कहानी के निचोड़ तक पहुंचने की सार्थक कोशिश है। कहानीकर वीना चूण्डावत ने बताया कि कहानी में स्त्रियों की ताक़त बहुत अच्छी लगी कवि नवीन बोहरा पंछी ने कहानी में नगर पालिका के सदस्यों में संवेदना की कमी को उजागर किया साथ ही कहानी में बेसवाओं के संवाद की कमी बताई। तहज़ीब के सेक्रेटरी नफ़ासत अहमद ने प्रश्न उठाया कि क्या अच्छाई और बुराई साथ नहीं रह सकती? कहानी में किरदारों का रिपीटेशन नहीं हुआ है। कवि गौतम गट्स ने अनुभव किया कि कहानी आख़िर में फिर से शुरू हो जाती है। राजेश कल्ला ने यूरोपीय लेखकों के साथ इंतिज़ार हुसैन और क़ुर्रतुल ऐन हैदर का ज़िक्र करते हुए कहा कि कहानी तो अपने आख़िरी पैराग्राफ से शुरू होती है। चर्चा में हिमांशु किरण शर्मा ने कहानी को सामाजिक पाखंड पर समयातीत व्यंग्य बताया जो सिर्फ बाज़ार को अलग रखने की कोशिश है। युवा रंगकर्मी चंदन शर्मा के अनुसार ‘आनंदी‘ इंसान के दौहरे नेचर को दिखाती है। परिचर्चा में युवा रंगकर्मी मयूर ने सबसे पहले ‘आनंदी‘ की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाया तो एडवोकेट सुरभि ने कहानी में आये ‘हुस्नाबाद‘ और ‘हसनाबाद‘ के प्रतीकात्मक रूप पर चर्चा करते हुए बीच-बीच में कई प्रश्नों के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस मौक़े पर बुजुर्ग शाइर और अफ़साना निगार हबीब कैफ़ी, वरिष्ठ रंगकर्मी महेशचंद्र माथुर, नौजवान शाइर वसीम बैलिम, आकाशवाणी के गोपाल सिंह चौहान, तेजस्वी एवं मुहम्मद यशफा सहित कई सुधि जन मौजूद रहे। कार्यक्रम के अंत में डॉ. इश्राक़ुल इस्लाम माहिर ने सभी का शुक्रिया अदा किया।