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हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ

हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ

वो क्या हुआ मेरे एक परिचित डाक्टर के पिता को दिल का दौरा पड़ा. जब तक उन्हें घर के लोग संभाल पाते. वे इस दुनिया को अलविदा कह गए. मैं उन डाक्टर से मिलने गया. स्वभाविक है वे बहुत दुखी थे. उनके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. अभी इन डाक्टर की शादी भी नहीं हुई. परिवार बहुत गरीबी से गुजरा. मेरे सांत्वना देने पर डाक्टर कुछ सहज हुए उन्होंने मेरे समक्ष दो पीड़ाएं जाहिर की. कहने लगे -"पिता ने कड़े परिश्रम से मुझे डाक्टर बनाया. मै चाहता था उन्हें शानदार और गौरवपूर्ण बुढापा दूं. उन्होंने अत्यंत भावुकता के साथ कहा यदि अंतिम समय मैं उनके पास होता. उन्हें कभी जाने नहीं देता. मैं देर तक उन्हें ढाढस बंधाता रहा. और मन ही मन कुछ विचार भी करता रहा. आम तौर पर जब हम किसी के यहां ऐसे कठिन समय पर जाएं तो प्रायः मौन ही उत्तम अभिव्यक्ति हुआ करती है.
समाजिक जीवन में हर अवसर के लिए कतिपय शिष्टाचार तय किये गये हैं. किसी के यहां मृत्यु पर शोक व्यक्त करने जाने पर भी लोग मूर्खतापूर्ण प्रश्न कर बैठा करते हैं. किसका उपचार चल रहा था. क्या दवाईयां चल रही थी. क्या क्या जुम्मेदारी छोड़ गए हैं. और तो और कुछ मूर्ख लोग वारिसनामे आदि तक की बात भी छेड़ बैठते हैं. इससे कई बार शोक का वातावरण खीज का सबब बन जाता है. इसीलिए कहा जाता है कि इस तरह की परस्थितियों में मौन सबसे बड़ी चीज है.
अब मैं क्या कहता. वे कुछ अधिक ही दुखी थे. मेरा फ़र्ज़ बनता था कि कुछ कहूं. ऐसे समय के लिए मेरे मन ने कहा रामचरितमानस की थोड़ी भीतरी यात्रा की जाय. हमारे पास यह एक ऐसा अद्भुत ग्रंथ है जिसमें हर तरह की समस्याओं का हल सुझाया गया है. प्रसंग भी मुझे स्मरण हो आया. मैंने विनम्र शब्दों में कहा- "डाक्टर हमारे धर्म ग्रंथ महज़ कागज़ पर छपी हुई पंक्तियां नहीं हैं. वे हमें जीने की राह दिखाती हैं. खासकर जीवन की विकट घड़ी में हमें ढाढस बंधाती हैं. मैं बोला-डाक्टर एक चौपाई सुनिए-
"होई सो जोई राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा "! डाक्टर साहब राम ने जो रचा है, वो होकर रहता है. इसे लेकर कोई तर्क- कुतर्क कहां तक उचित है. जीवन देने और लेने का काम ईश्वर के आधीन है. एक डाक्टर किसी को उपचार देकर स्वस्थ कर सकता है. मगर आयु भगवान देता है. आयु पूरी हो गई तो उसे जाना ही होता है. देखिये यदि जीवन अपने हाथ में होता तो हर डाक्टर वैद्य एवं उनके माता पिता व दूसरे परिजन स्वयं इस दुनिया में हमेशा के लिए कायम न रहते.
मैंने उन्हें बताया भगवान राम को क्या मालूम नहीं था कि हमारे पिता दशरथ हमारा वियोग सहन नहीं कर पाएंगे. राम को ज्ञात था कि उनके साथ लक्ष्मण और प्राणों से भी प्रिय बहू सीता जी के वन चले जाने पर पिता जीवित नहीं रह पाएंगे. मगर उन्होंने तो जिस कार्य के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया था, उसे पूरा करना था. यही नहीं कुलगुरु मुनि वशिष्ठ जी त्रिकालदर्शी थे. उन्हें सब कुछ ज्ञात था. वे राम को वन जाने से सख्ती से मना कर सकते थे. फिर आगे देखिये जब दशरथ जी गौलोकवासी हुए तब वशिष्ठ जी वन में रथ दौड़ा सकते थे. राम अभी बहुत दूर नहीं गए थे. मगर वे जानते थे इससे राम की मर्यादा भंग होगी. उनका व्रत टूटता था. सो उन्होंने तत्काल भरत के ननिहाल कैकेय के लिए तेज़ धावकों को भेजा. उन्हें यह समझा कर भेजा कि उन्हें महाराज दशरथ जी की मृत्यु का समाचार नहीं देना है. इतना ही कहना है कि उन्हें शीघ्र अतिशीघ्र अयोध्या लौटने को कहा गया है. वर्णन आता है कि जब भरत अपने भाई शत्रुघ्न के साथ अयोध्या के निकट आने को हुए. बुरे बुरे अपशगुन होने लगे. कुत्ते और शियार बहुत ही भद्दे तरीके से रूदन कर रहे थे. अयोध्या की ओर से हर समय उनचास प्रकार की सुगंधित शीतल वायु बहा करती थी. मगर आज हवा सुहानी नहीं थी. उसमें से शीतलता गायब थी. सुगंध भी कहीं खो गई थी. उन्होंने शत्रुघ्न से कहा- "भाई आज वातावरण कुछ अलग नहीं लग रहा क्या"...
दोनों भाईयों ने जब अयोध्या नगरी में प्रवेश किया तो जो नगरवासी उनके सम्मान में बिछ जाते थे. आज वही लोग उन्हें नजरअंदाज़ कर मुंह फेरकर निकल रहे थे. भरत को आश्चर्य भी हुआ और किसी आशंका से उनका मन विचलित हो उठा. इस अवसर के लिए गौस्वामी तुलसी दास जी ने एक मार्मिक चौपाई कही है-
" लागति अवध भयावनी भारी, मानहु कालरात्रि अंधियारी,
घर मसान परिजन जनु भूता, सुत हित मीत मनहुँ जमदूता".
" इसका भावार्थ है- आज भरत जी को अयोध्या बहुत भयावह लग रही थी. ऐसा लगता था जैसे अंधियारी कालरात्रि हो. घर स्मशान की तरह लग रहे थे, परिवार के लोग भूतों की भांति प्रतीत हो रहे थे, और पुत्र, हितैषी और मीत यमदूत की तरह दिखाई दे रहे थे.
भरत जी जब महलों में प्रवेश करते हैं और उन्हें ज्ञात होता है कि पिता नहीं रहे. वे ऐसे शोक के समय भी माता कैकेयी पर बरस पड़ते हैं. माँ के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जैसा कि एक भारतीय पुत्र अपनी माँ के लिए कभी नहीं कर सकता. भरत जैसा संस्कारी बेटा तो कभी भी ऐसा नहीं कह सकता है. मगर सत्य यह है कि जब समय विपरीत होता है तब कुछ भी हो सकता है. तब भरत जी अपने कुलगुरु वशिष्ठ जी के पास जाकर उनके चरणों में गिर पड़े. उन्हें बुरी तरह रोते देख मुनि वशिष्ठ जी भरत जी को ढाढस बंधाते हैं. वे कहते हैं कि मनुष्य को विपरीत समय में भी संयम, धैर्य, शांति और विवेक नहीं खोना चाहिये. और यहां वह जगत प्रसिद्ध चौपाई कही गई है-
" सुनहि भरत भावी प्रबल, बिलखी कहेहु मुनिनाथ,
हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ !"

 

 

 

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