क्षेत्रीय दलों की गोलबंदी : कितनी खरी कितनी खोटी
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की मानहानि मामले में सजा और लोकसभा सदस्यता ख़ारिज
होने के बाद विपक्षी दल गोलबंद हो रहे है। इसी बीच क्षेत्रीय दलों ने भी अपनी एकजुटता
प्रदर्शित की है। कांग्रेस के नेतृत्व में मोदी सरकार का विरोध करने वालों में क्षेत्रीय दलों की
महत्वपूर्ण भूमिका है। क्षेत्रीय दल आगामी लोकसभा चुनावों के मधे नज़र अपने लाभ हानि का
आकलन करने में लगे है जो समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के ताज़ा बयान से
साफ़ झलकता है। राहुल के वीर सावरकर के बारे में दिए बयान पर शिवसेना उद्धव गुट के
सुप्रीमों उद्धव ठाकरे ने गहरी नाराजगी जाहिर की है जिस पर कांग्रेस ने भविष्य में सोच समझ
कर बयान देने की बात कही है। इससे स्पष्ट है कांग्रेस क्षेत्रीय पार्टियों को नाराज करने की
स्थिति में नहीं है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता दीदी पहले से ही कांग्रेस से खपा है हालाँकि
राहुल की सांसदी छीने जाने के मसले पर कांग्रेस के आंदोलन का साथ दे रही है। कमोवेश यही
स्थिति कुछ अन्य क्षेत्रोय दलों की है।
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि 2024 के आम चुनावों में भारतीय जनता
पार्टी को हराने के लिए कांग्रेस को विभिन्न राज्यों में संबंधित क्षेत्रीय दलों का समर्थन करना
चाहिए। अब समय आ गया है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को आगे रखे और भाजपा को हराने के
लिए क्षेत्रीय दलों का समर्थन करे। इसी के साथ देश में आगामी लोकसभा चुनाव के गुणा – भाग
के साथ क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की भूमिका की चर्चा भी होने लगी है। वर्तमान में देश के अनेक
प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों की सरकारें है जो राष्ट्रीय फलक में अपना प्रभाव रखती है। इस समय
आंध्र, तेलंगाना, तमिलनाडु, बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, प बंगाल, दिल्ली और पंजाब में क्षेत्रीय
दलों की सरकार है जहाँ लोकसभा की 200 से अधिक सीटें है। भारत में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों
के साथ क्षेत्रीय दलों के निर्माण का अपना विशेष इतिहास है। देश में आज़ादी के बाद से ही
क्षेत्रीय दलों ने अपना वर्चस्व स्थापित करना शुरू कर दिया था। जैसे जैसे राष्ट्रीय दल कमजोर
हुए वैसे वैसे क्षेत्रीय दल बढ़ते गए। विशेषकर कांग्रेस और जनता पार्टी से निकल कर अनेक
नेताओं ने अपने क्षेत्रीय दल बना लिये। आज अनेक राज्यों में इन क्षेत्रीय दलों की अपनी सरकारें
है। जो मज़बूती से कार्य कर रही है। एक बार देवेगौड़ा के नेतृत्व में क्षेत्रीय दलों के गठजोड़ की
केंद्र में सरकार बन चुकी है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में क्षेत्रीय दलों की सरकार में
प्रमुख भूमिका रही है।
पंजाब में अकाली दल, जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस, केरल में मुस्लिम लीग और तमिलनाडु में द्रविड़
दल इनमें सबसे पुराने है। देश के अधिकांश प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों ने अपना प्रभुत्व जमा लिया है। इनमें
शिरोमणि अकाली दल, नेशनल कांफ्रेंस, डी एम.के, अन्ना डी.एम.के, तेलुगू देशम, असम गण परिषद,
झारखंड मुक्ति मोर्चा, आरजेडी, जनता यूनाइटेड, तृणमूल कांग्रेस, लोकदल,जेडी एस समाजवादी पार्टी,
बसपा, शिव सेना [दोनों गुट], राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, मिजोरम नेशनल फ्रंट, नागा नेशनल डेमोक्रेटिक
पार्टी, मणिपुर पीपुल्स पार्टी, महाराष्ट्र गोमातक पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, सिक्किम संग्राम परिषद,
बीजू जनता दल, वाईएसआर कांग्रेस, भारत राष्ट्र समिति, केरला कांग्रेस जननायक जनता पार्टी
आदि।आम आदमी पार्टी ने क्षेत्रीय दल से राष्ट्रीय दल का दर्ज़ा हासिल कर लिया है। इस समय दिल्ली और
पंजाब में आप की सरकारें है।
आज अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकारें सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। 1967 में 8 राज्यों में क्षेत्रीय
दलों की सरकारें थीं। वर्तमान में प.बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीसा, बिहार में क्षेत्रीय दलों
की सरकार स्थापित है। क्षेत्रीय दलों की यह खासियत है की इसके प्रमुख नेता ही पार्टी के कर्णधार होते है।
पार्टी के हाई कमान भी स्वयं होते है। बंगाल में ममता, उड़ीसा में नवीन पटनायक, तेलंगाना में केसीआर,
आंध्र में जगन मोहन रेड्डी, तमिलनाडु में स्टालिन अपनी पार्टी के प्रमुख होने के साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री
भी है। इसके अलावा जो क्षेत्रीय दल इस समय सत्ता में नहीं है उनके सुप्रीमों भी एक ही व्यक्ति है और उनके
दल में उनकी तूती बोलती है। यूपी में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, महाराष्ट्र में एनसीपी
प्रमुख शरद पवार, शिवसेना [ बाला साहेब ] प्रमुख उद्धव ठाकरे, जम्मू कश्मीर में फारुख अब्दुला, पंजाब
में अकाली दल प्रमुख बादल, कर्णाटक में जेडी एस के देवेगौड़ा अपनी अपनी पार्टी के सर्वेसर्वा है। ज़्यादातर
क्षेत्रीय पार्टियां व्यक्ति आधारित हैं और एक व्यक्ति या उसके परिवार से संचालित हो रही हैं। यह स्थिति
लोकतंत्र के लिए दुखदायी कही जा सकती है।
देश के प्रमुख राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के बाद सरकार के
गठन में क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण बने रहने की संभावना है। उन्होंने कहा कि देश में फिलहाल
छोटी पार्टियों का दौर समाप्त होने की कम ही उम्मीद है।
-बाल मुकुन्द ओझा