आदिवासी उत्थान के लिए मिशन मोड में काम कर रही मोदी सरकार
एक साल से विपक्षी दल वपक्षी एकता के चक्कर में मीटिंगों और सीटिंगों व राजनीतिक टूरिज्म में लगे है यहाँ तक कि अपने राज्यों की कल्याणकारी योजनाओं कोभी भूल गए है वही प्रधानमंत्री मोदी विकास कार्यों में ध्यान लगा कर 2024 की तैयारी में मग्न हैं ।
आज़ाद भारत में 1951 की जनगणना के बाद से आदिवासियों को अलग से गिनना बंद कर दिया गया। भारत की जनगणना 1951 के अनुसार आदिवासियों की संख्या 9,91,11,498 थी, जो 2001 की जनगणना के अनुसार 12,43,26,240 हो गई। यह देश की जनसंख्या का 8।2 प्रतिशत है। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के मुताबिक देश के 30 राज्यों में कुल 705 जनजातियां रहती हैं। वहीं झारखंड में 86 लाख से अधिक आदिवासी हैं।संस्कृत विचारकों ने अपने लेखों में आदिवासियों को अत्विका और वनवासी लिखा है। महात्मा गांधी ने आदिवासियों को गिरिजन (पहाड़ पर रहने वाले लोग) कह कर पुकारा है। भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए ‘अनुसूचित जनजाति’ पद का उपयोग किया गया है। भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में भीलाला, धानका, गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, बोडो, कोल, भील, कोली, फनात, सहरिया, संथाल, कुड़मी महतो, मीणा, उरांव, लोहरा, परधान, बिरहोर, पारधी, आंध, टाकणकार आदि शामिल हैं।आदिवासी मुख्य रूप से भारतीय राज्यों झारखंड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में बहुसंख्यक हैं और गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक हैं, जबकि भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों जैसे मिजोरम में बहुसंख्यक हैं। इन्हें भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में ‘अनुसूचित जनजातियों’ के रूप में मान्यता दी गई है।आदिवासियों की बड़ी संख्या होने के बावजूद उन्हें आज भी वो सम्मान नहीं मिला था जिसके वो हक़दार है । प्रधानमंत्री मोदी की सरकार इस समय आदिवासियों के उत्थान के लिए कार्य कर रहे हैं ।
इसी साल 16 फरवरी को मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में “आदि महोत्सव” का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि “पहले जो खुद को दूर-सुदूर समझता था अब सरकार उसके द्वार जा रही है, उसको मुख्यधारा में ला रही है। आदिवासी समाज का हित मेरे लिए व्यक्तिगत रिश्तों और भावनाओं का विषय है। 21वीं सदी का नया भारत ‘सबका साथ सबका विकास’ के दर्शन पर काम कर रहा है।” प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि आदिवासी समाज के विकास से ही “सबका विकास” सधेगा और इसी कारण केंद्र सरकार बीते कुछ वर्षो ने आदिवासी जनजातीय समाज के लिए मिशन मोड में काम कर रही है ताकि उनके जीवन के सभी आयामों को बेहतर किया जा सके।
सामाजिक गौरव के अतिरिक्त जीवन स्तर से जुड़े मुद्दों का अध्ययन करें तो पायेंगे कि जनजातीय लोगों का जीवन स्तर पहले से अच्छा हुआ है। शिक्षा के मोर्चे पर प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक में आदिवासी बच्चों का इनरोलमेंट बढ़ा है। 2004 से 2014 के बीच केवल 90 ‘एकलव्य स्कूल’ खुले थे, जबकि 2014 से 2022 तक मोदी सरकार ने 500 से ज्यादा ‘एकलव्य स्कूल’ स्वीकृत किए जिनमें से 400 से ज्यादा स्कूलों में पढ़ाई शुरू भी हो चुकी है और एक लाख से ज्यादा जनजातीय छात्र इन स्कूलों में पढ़ाई भी करने लगे हैं। आदिवासी युवाओं के सामने शिक्षा के मैदान में सबसे बड़ी चुनौती भाषा की होती आई है लेकिन अब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा में पढ़ाई का विकल्प भी खोल दिया गया है। जिस कारण आदिवासी बच्चे, आदिवासी युवा अपनी भाषा में पढ़ सकेंगे। स्वास्थ्य सुविधाओं में “आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना” में करीब 91।93 लाख आयुष्मान कार्ड के लाभार्थी जनजातीय वर्ग से ही हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 68 लाख जनजातीय लोग प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत आवास के लिए पंजीकृत हैं, जिनमें लगभग 63 लाख आवास मंजूर हो चुके हैं। इनमें से भी 47।17 लाख आवासों का निर्माण पूरा हो चुका है। इसके अतिरिक्त स्वच्छता मिशन के तहत 2014-2015 से लेकर अभी तक जनजातीय वर्ग के 1।47 करोड़ घरों में शौचालय का निर्माण हुआ है। अगले तीन वर्षों में 3।5 लाख आदिवासी छात्रों वाले 740 एकलव्य माडल आवासीय विद्यालयों के लिए 38,800 शिक्षकों और सहायक कर्मचारियों की केंद्रीय रूप से भर्ती की जाएगी। इसके अतिरिक्त अब 5 छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत 2500 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक बजट के साथ प्रत्येक वर्ष 30 लाख से अधिक छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती है।
इसके अतिरिक्त व्यापारिक उत्कर्ष का भी सुनहरा दौर दस्तक दे रहा है। देश के अलग-अलग राज्यों में तीन हजार से अधिक ‘वन धन विकास केंद्र’ स्थापित किए गए हैं। लगभग 90 लघु वन उत्पादों पर सरकार MSP दे रही है। 80 लाख से ज्यादा सेल्फ हेल्फ ग्रुप आज अलग-अलग राज्यों में काम कर रहे हैं जिसमें सवा करोड़ से ज्यादा सदस्य जनजातीय समाज से हैं और इनमें भी बड़ी संख्या महिलाओं की है। मोदी सरकार का जोर जनजातीय कला को प्रमोट करने, और युवाओं के कौशल को बढ़ाने पर भी है। देश में नए जनजातीय शोध संस्थान खोले जा रहे हैं। इन प्रयासों से जनजातीय युवाओं के लिए उनके अपने ही क्षेत्र में नए अवसर बन रहे हैं। इसी कारण आज भारत के जनजातीय समाज द्वारा बनाए जाने वाले उत्पादों की मांग ना केवल भारत में लगातार बढ़ रही है बल्कि ये विदेशों में भी निर्यात किए जा रहे हैं। ट्राइबल प्रोडक्ट्स ज्यादा से ज्यादा बाजार तक आयें, इनकी पहचान बढ़े, इनकी डिमांड बढ़े, केंद्र सरकार इस दिशा में भी लगातार काम कर रही है।
बीते 8-9 वर्षों में आदिवासी समाज से जुड़े आदि महोत्सव जैसे कार्यक्रम देश के लिए एक अभियान बन गए हैं। आज़ादी के अमृत महोत्सव में आदि महोत्सव ने देश की आदि विरासत की भव्यता को पेश किया। भिन्न-भिन्न कलाएं, भिन्न-भिन्न कलाकृतियां! भांति-भांति के स्वाद, तरह-तरह का संगीत, ऐसा लगा जैसे भारत की अनेकता, उसकी भव्यता, कंधे से कंधा मिलाकर एक साथ खड़ी हो गई। आदि महोत्सव में जनजातीय संस्कृति, शिल्प, खान-पान, वाणिज्य और पारंपरिक कला को प्रदर्शित किया गया। जिससे आदिवासी समुदाय की समृद्धि के द्वार खुले।
आज भारत के पारंपरिक, और ख़ासकर जनजातीय समाज द्वारा बनाए जाने वाले प्रॉडक्ट्स की डिमांड लगातार बढ़ रही है। पूर्वोत्तर के प्रॉडक्ट्स विदेशों तक में एक्सपोर्ट हो रहे हैं। बांस से बने उत्पादों की लोकप्रियता में तेजी से वृद्धि हो रही है। आदिवासी उत्पाद ज्यादा से ज्यादा बाज़ार तक आए, इनकी पहचान बढ़े, इनकी डिमांड बढ़े, सरकार इस दिशा में भी लगातार काम कर रही है।
देश के अलग-अलग राज्यों में 3 हजार से ज्यादा वनधन विकास केंद्र स्थापित किए गए हैं। 2014 से पहले ऐसे बहुत कम, लघु वन उत्पाद होते थे, जो MSP के दायरे में आते थे। अब ये संख्या बढ़कर 7 गुना हो गई है। अब ऐसे करीब 90 लघु वन उत्पाद हैं, जिन पर सरकार मिनिमम सपोर्ट एमएसपी प्राइस दे रही है। 50 हजार से ज्यादा वनधन स्वयं सहायता समूहों के जरिए लाखों जनजातीय लोगों को इसका लाभ हो रहा है। 80 लाख से ज्यादा स्वयं सहायता समूह, सेल्फ़ हेल्प ग्रुप्स, इस समय अलग-अलग राज्यों में काम कर रहे हैं। इन समूहों में सवा करोड़ से ज्यादा ट्राइबल मेम्बर्स हैं। इसका भी बड़ा लाभ आदिवासी महिलाओं को मिल रहा है।
सरकार का जोर जनजातीय आर्ट्स को प्रमोट करने, जनजातीय युवाओं के स्किल को बढ़ाने पर भी है। इसी वजह से बजट में पारंपरिक कारीगरों के लिए पीएम-विश्वकर्मा योजना शुरू करने की घोषणा भी की गई है। पीएम-विश्वकर्मा के तहत आर्थिक सहायता दी जाएगी, स्किल ट्रेनिंग दी जाएगी, प्रॉडक्ट की मार्केटिंग के लिए सपोर्ट किया जाएगा। इसका बहुत बड़ा लाभ आदिवासी समुदाय के युवाओं को भी होने वाला है। देश में नए जनजातीय शोध संस्थान भी खोले जा रहे हैं। इन प्रयासों से ट्राइबल युवाओं के लिए अपने ही क्षेत्रों में नए अवसर बन रहे हैं।
देश में राष्ट्रीय जनजाति अनुसंधान संस्थान खोला गया। इन प्रयासों से ट्राइबल युवाओं के लिए अपने ही क्षेत्रों में नए अवसर बन रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन के अनुरूप जून 2022 में राष्ट्रीय जनजाति अनुसंधान संस्थान की शुरुआत की गई। देश में कई जनजाति अनुसंधान संस्थान हैं, लेकिन जनजातीय समाज की विविधताओं को जोड़ने के लिए कोई राष्ट्रीय लिंक नहीं था और पीएम मोदी के विजन के अनुरूप बनाया गया यह संस्थान इसी लिंक का काम करेगा।
वर्ष 2022 आदिवासी समाज के उत्थान की दृष्टि से मील का पत्थर साबित हुआ। मोदी सरकार ने देश को पहला आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू दिया। आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू ने 25 जुलाई 2022 को भारत के 15वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण किया। इसके साथ ही वह देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बन गईं। राष्ट्रपति मुर्मू, जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की उम्मीदवार थी, उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में यशवंत सिन्हा के खिलाफ भारी अंतर से जीत हासिल की। 20 जून, 1958 को स्वर्गीय बिरंची नारायण टुडू के घर जन्मीं द्रौपदी मुर्मू ओडिशा के सबसे दूरस्थ और अविकसित जिलों में से एक से हैं। अपने बचपन में आने वाली प्रतिकूलताओं के बावजूद, मुर्मू ने अपनी शिक्षा पूरी की और 1994-1997 तक बिना वेतन के श्री अरबिंदो इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर, रायरंगपुर में मानद सहायक शिक्षक के रूप में सेवा करके अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की। मुर्मू ने 1997 में एक पार्षद के रूप में अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की। द्रौपदी मुर्मू ने वर्ष 2015 में झारखंड के राज्यपाल के रूप में शपथ ली और 2021 तक इस पद पर रहीं। झारखंड के राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल में भी, मुर्मू का नाम पहली महिला राज्यपाल के साथ-साथ पहली ओडिया महिला और आदिवासी नेता के रूप में भी जाता है।
वित्त वर्ष 2022-23 के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय के लिए 8451 करोड़ रुपये के बजट परिव्यय में 927 करोड़ की उल्लेखनीय वृद्धि की गई, जबकि वित्त वर्ष 2021-22 के लिए बजट परिव्यय 7524।87 करोड़ रुपये का रहा था। इस प्रकार, इसमें 12।32 प्रतिशत की बढोततरी की गई। अनुसूचित जनजाति घटक के रूप में 87,584 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई, जबकि इससे पिछले वर्ष यह राशि 78,256 करोड़ रुपये रही थी। अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए 41 केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा यह राशि आवंटित किए जाने की आवश्यकता है।
अशोक भाटिया,