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आ रहा मानसून सीजन, डेंगू से रहें सतर्क

आ रहा मानसून सीजन, डेंगू से रहें सतर्क

भारत में मानसून की अवधि चार महीने यानी जून से सितम्बर मानी जाती है। यहां जून के महीने से लेकर जुलाई व अगस्त महीने तक सबसे ज्यादा वर्षा होती है और यह तो आप सभी को जानकारी होगी कि बारिश के महीने में बीमारियां अन्य दिनों की तुलना में हमेशा सबसे ज्यादा फैलती हैं। बारिश में मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है और मलेरिया व डेंगू जैसी बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया की लगभग आधी आबादी को अब हर साल होने वाले अनुमानित 100-400 मिलियन संक्रमणों के साथ डेंगू का खतरा है। डेंगू दुनिया भर में उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में पाया जाता है, ज्यादातर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में। जानकारी देना चाहूंगा कि जलवायु की दृष्टि से भारत उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु वाला प्रदेश है, इसलिए यहाँ डेंगू का खतरा अधिक है। यह भी जानकारी देता चलूं कि डेंगू बुखार भारत में हर वर्ष सैकड़ों लोगों की जान ले लेता है, इसलिए इससे बचाव बहुत ही जरूरी है। डेंगू से बचाव के क्रम में ही प्रत्येक वर्ष 16 मई को राष्ट्रीय डेंगू रोकथाम दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने के पीछे जो उद्देश्य निहित है वह यह है कि लोग डेंगू बुखार के प्रति जागरूक हों। आंकड़़ें बताते हैं कि कोरोना महामारी के बाद डेंगू के केसो में बढ़ोत्तरी देखने को मिली है। जानकारी देना चाहूंगा कि डेंगू को 'हड्डी तोड़ बुखार' के नाम से भी जाना जाता है। डेंगू बुखार के लक्षणों में तेज बुखार, शरीर पर दाने, सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द, थकान, जी मिचलाना, उलटी आना,दस्त होना, त्वचा पर लाल चकत्ते, जो बुखार आने के दो से पांच दिन बाद दिखाई देते हैं,हल्का रक्तस्राव (जैसे नाक से खून बहना, मसूड़ों से खून आना, या आसान चोट लगना),मांसपेशियों(मसल्स) और जोड़ों में दर्द आदि हो सकते हैं। कभी-कभी, डेंगू बुखार के लक्षण हल्के होते हैं और यह फ्लू या अन्य वायरल संक्रमण के लक्षण हो सकते हैं। छोटे बच्चों और जिन लोगों को पहले कभी संक्रमण नहीं हुआ है, उनमें बड़े बच्चों और वयस्कों की तुलना में हल्के मामले होते हैं। हालांकि, उनमें गंभीर समस्याएं विकसित हो सकती हैं। इनमें डेंगू रक्तस्रावी बुखार, तेज बुखार, लसीका और रक्त वाहिकाओं को नुकसान, नाक और मसूड़ों से खून बहना, यकृत का बढ़ना (लिवर बढ़ना) और परिसंचरण तंत्र या वाहिकातंत्र की विफलता जैसी दुर्लभ जटिलता शामिल है। कई बार लक्षण बड़े पैमाने पर रक्तस्राव, सदमा यहां तक कि मृत्यु तक में बदल सकते हैं। इसे डेंगू शॉक सिंड्रोम (डी.एस.एस.) कहा जाता है। कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों और दूसरी बार या बार-बार हो रहे डेंगू के संक्रमण वाले लोगों को डेंगू रक्तस्रावी बुखार विकसित होने का अधिक खतरा माना जाता है। गंभीर डेंगू बुखार तब होता है जब किसी व्यक्ति की रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और उनमें रिसाव होने लगता है। और आपके रक्तप्रवाह में थक्का बनाने वाली कोशिकाओं (प्लेटलेट्स) की संख्या कम हो जाती है। वास्तव में, डेंगू बुखार एक वेक्टर जनित रोग है जो मादा एडीज मच्छरों द्वारा फैलता है। ये मच्छर पीला बुखार, ज़ीका वायरस और चिकनगुनिया भी फैलाते हैं। डेंगू मच्छरों द्वारा फैलने वाला एक संक्रमण है जो फ्लू जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। जानकारी मिलती है कि यह चार अलग अलग वायरस के कारण होता है। वास्तव में, ये विषाणु उन विषाणुओं से संबंधित हैं जो वेस्ट नाइल संक्रमण और पीत ज्वर का कारण बनते हैं।हालांकि केन्द्रीय स्वास्थ्य परिवार और कल्याण मंत्रालय इस मच्छर जनित बीमारी की रोकथाम, इससे बचाव के तरीकों के बारे में समय समय पर जागरूकता फैलाने की पहल करता है लेकिन हमें भी देश के जागरूक नागरिक होने के नाते इससे बचाव करना चाहिए और देश के अन्य लोगों को भी इस एक प्रकार की महामारी से बचने के जागरूक करने में भूमिका का निर्वहन करना चाहिए। चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के बावजूद डेंगू बुखार मानवजात के लिए एक गंभीर खतरा बना हुआ है लेकिन जागरूकता, समय पर चिकित्सा करके इस खतरनाक मच्छर जनित बीमारी से हम स्वयं को इससे बचा सकते हैं। जानकारी देना चाहूंगा कि संक्रमित व्यक्ति के आसपास रहने से किसी को डेंगू बुखार नहीं हो सकता है। डेंगू बुखार मच्छर के काटने से फैलता है, जब संक्रमित मच्छर किसी अन्य व्यक्ति को काटता है, तो वायरस उस व्यक्ति के रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाता है और संक्रमण का कारण बनता है। बहरहाल, जानकारी देना चाहूंगा कि प्रतिवर्ष विशेषकर बारिश के मौसम के अनेक राज्यों में अब हर साल डेंगू का प्रकोप देखा जाने लगा है, सैकड़ों-हजारों लोग डेंगू से पीड़ित होकर अस्पतालों में भर्ती होते हैं, जिनमें से दर्जनों लोग मौत के मुंह में भी समा जाते हैं। हाल फिलहाल मानसून का मौसम शुरू होने वाला है, बीच बीच में मई माह में ही कहीं कहीं बारिश भी हो रही है, इसलिए हमें अभी से डेंगू के प्रति सतर्क हो जाना चाहिए, क्यों कि प्रतिवर्ष मानसून के बाद देशभर में डेंगू के कई हजार मामले सामने आते हैं। डेंगू की दस्तक के बाद डॉक्टरों व प्रशासन द्वारा आम जनता को कुछ हिदायतें दी जाती हैं, लेकिन बावजूद इसके हम सतर्कता नहीं बरतते और डेंगू का शिकार हो जाते हैं। वास्तव में कचरे और गंदगी के ढ़ेरों से भी मच्छर अधिक पनपने हैं, इसलिए हमें साफ सफाई की ओर पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। वैसे डेंगू के मामले में तो बचाव ही सबसे बड़ा हथियार माना गया है। बचाव ही उपचार है। इसीलिए बारिश के मौसम से पहले ही आमजन को इसके बारे में जागरूक करना बेहद जरूरी है क्योंकि उचित सावधानियां और सतर्कता बरतकर ही इस जानलेवा व खतरनाक बीमारी से बचा जा सकता है। घर की व आसपास के वातावरण की साफ-सफाई का ध्यान रखा जाना बेहद जरूरी है। हमारे घर या आसपास के क्षेत्र में डेंगू का प्रकोप न होने पाए, इसके लिए जरूरी है कि हम मच्छरों के उन्मूलन का विशेष प्रयास करें। गर्मी के दिनों में हम सभी कूलर का प्रयोग करते हैं, कूलर का पानी नहीं बदलने पर उसमें मच्छरों का प्रकोप हो जाता है और हम बीमार पड़ जाते हैं, इसलिए हमें यह चाहिए कि हम नियमित रूप से कूलर में पानी बदलते रहें। यदि कूलर में कुछ दिनों के लिए पानी का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं तो इसका पानी निकालकर कपड़े से अच्छी तरह पोंछकर कूलर को सुखा दें। खाली बर्तन, खाली डिब्बे, टायर, गमले मटके, बोतल इत्यादि में पानी एकत्रित न होने दें। घर के दरवाजों, खिड़कियों तथा रोशनदानों पर जाली जरूर लगवाएं ताकि घर में मच्छरों का प्रवेश न हो सके। हमें यह चाहिए कि हम पूरी बाजू के कपड़े पहनें और अपने हाथ-पैरों को अच्छी तरह से ढ़ककर रखें। मच्छरों से बचने के लिए मॉस्कीटो क्वाइल, मच्छर भगाने की मशीन आदि का प्रयोग कर सकते हैं। सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करना मच्छरों से बचाव का सबसे अच्छा, सस्ता, सरल, प्रभावी और हानिरहित उपाय है। हमें यह चाहिए कि हम अपने घर में या घर के आसपास पानी जमा न होने दें, क्यों कि जमा पानी के ऐसे स्रोत ही डेंगू मच्छरों की उत्पत्ति के प्रमुख कारक सिद्ध होते हैं। यदि कहीं पानी इकट्ठा हो तो हमें यह चाहिए कि हम उसमें केरोसीन ऑयल या पैट्रोल इत्यादि डाल दें ताकि वहां मच्छरों का सफाया हो जाए। हमें यह चाहिए कि हम पानी के बर्तनों, टंकियों, पानी के स्त्रोतों इत्यादि को अच्छी प्रकार से ढ़ककर रखें। चिकित्सक बताते हैं कि, डेंगू सीरोलॉजी टेस्ट (डेंगू आईजीजी और आईजीएम) - किसी व्यक्ति के वायरस के संपर्क में आने पर प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा उत्पादित एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए; प्राथमिक और द्वितीयक दोनों संक्रमणों के संपर्क में आने के कम से कम 4 दिन बाद किए जाने पर ये परीक्षण सबसे प्रभावी होते हैं। बहरहाल, डेंगू बुखार का कोई विशिष्ट उपचार नहीं है, क्योंकि डेंगू एक वायरस है। बचाव व सर्तकता सबसे बड़े उपचार हैं। वैसे किसी भी रोग से बचने के लिए हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होनी चाहिए, हमें पौष्टिक व संतुलित भोजन लेना चाहिए, स्वस्थ जीवनशैली का पालन करना चाहिए, योग प्राणायाम आज की जीवनशैली में आवश्यक रूप से शामिल करना चाहिए, इसके अलावा हमें स्वयं को हाइड्रेटेड रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि हमारे शरीर के अधिकांश तरल पदार्थों का उल्टी और तेज बुखार के दौरान ह्रास हो जाता है। तरल पदार्थों के लगातार सेवन से यह सुनिश्चित हो जाता है कि शरीर आसानी से डिहाइड्रेट नहीं होगा। हमें स्वच्छता पर भी पर्याप्त ध्यान रखना चाहिए। जीवन में स्वच्छता का अत्यधिक महत्व है, तब तो और भी ज्यादा जब हम स्वस्थ नहीं होते हैं। यहाँ जानकारी देना चाहूंगा कि डेंगू के उपचार में बहुत से लोग घरेलू नुस्खों का भी सहारा लेते हैं और इन नुस्खों में तुलसी का उपयोग बहुत फायदेमंद माना जाता है। इसके अलावा डेंगू हो जाने पर घरेलू नुस्खों में नारियल पानी का सेवन करना भी एक अच्छा व शानदार विकल्प है, जिसे शरीर में रक्त कोशिकाओं की कमी को पूरा करने में मददगार माना जाता है। नारियल पानी में काफी मात्रा में इलेक्ट्रोलाइट्स के अलावा बहुत सारे खनिज पदार्थ भी होते हैं। डेंगू के उपचार में विटामिन सी से भरपूर वस्तुओं का उपयोग भी बहुत लाभकारी माना गया है, जो शरीर के रोग प्रतिरोधी तंत्र को मजबूत बनाए रखती हैं। इसलिए डेंगू हो जाने पर विटामिन सी से भरपूर फलों का सेवन करना लाभकारी है। कुछ लोग बकरी के दूध व पपीता के पत्तों का प्रयोग भी डेंगू के इलाज में करते हैं। इन दोनों से प्लेटलेट्स की संख्या बढ़ जाती है। नीम के पत्तों का रस पीने से, कीवी फल के सेवन से प्लेटलेट्स और सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि होती है। नीम तो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली में भी सुधार करता है। वैसे डेंगू से पीड़ित अधिकांश लोगों में हल्के या कोई लक्षण नहीं होते हैं और ये लगभग 1-2 सप्ताह में ठीक हो जाते हैं। कभी-कभी, डेंगू गंभीर हो सकता है और मृत्यु का कारण बन सकता है। यदि सामान्य उपचार के बाद मरीज की स्थिति में कोई भी सुधार नजर नहीं आए या परेशानियां बढ़ती दिखें तो हमें यह चाहिए कि हम तुरंत अपने चिकित्सक या नजदीकी अस्पताल से सम्पर्क करें क्योंकि डेंगू के इलाज में लापरवाही मरीज की जिंदगी पर बहुत भारी पड़ सकती है। हमें डेंगू से सतर्क व सावधान रहना बहुत ही जरूरी व आवश्यक है।

-सुनील कुमार महला

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