एक बार सियासी चौका मारेंगे नीतीशे कुमार
बाल मुकुंद ओझा
बिहार की राजनीति तीन लोक से न्यारी है। लोकनायक जयप्रकाश की जन्म और कर्म भूमि से एक बार
फिर अवसरवादी और सुविधावादी सियासत के विस्फोट की चर्चाएं मीडिया में गूंज रही है। बिहार के
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राष्ट्रीय राजनीति में आने की ख़बरों के साथ अफवाहों का बाजार गरमा उठा है।
2015 से लगातार बिहार के मुख्यमंत्री और पिछले एक डेढ़ साल से संयुक्त विपक्ष की आवाज बुलंद करने
वाले नीतीश कुमार एक बार फिर चर्चा में है। यह सर्वविदित है 2022 में एनडीए से अलग होने के बाद नीतीश
ने संयुक्त विपक्ष और वन टू वन उम्मीदवार की जोर शोर से पैरवी शुरू की थी। नीतीश कुमार चाहते थे कि
लोकसभा में सीटों के बंटवारे को लेकर जो भी फॉर्मूला हो उसका फैसला जल्द से जल्द हो, हालांकि इंडी
गठबंधन की चौथी बैठक में भी इस पर बात नहीं बनी। वे लगातार विपक्षी एकता की धुरी बने हुए थे। इंडी
अलायंस बनने के बाद से ही उन्हें अलग थलग किया जाता रहा है। विपक्षी अलायंस की अब तक चार बैठकें
हुई हैं, लेकिन न नीतीश की बात सुनी जाती है और न उनकी सलाह मानी जाती है। इससे वे बेहद नाखुश हैं।
हाल ही दिल्ली में हुई इंडि गठबंधन की बैठक में नीतीश के प्रयासों को दर किनार कर उन्हें दूध में मक्खी की
तरह निकाल फेंका। बैठक में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पीएम फेस के लिए कांग्रेस अध्यक्ष
मल्लिकार्जुन खरगे का नाम लेकर सब को चौंका दिया। आम आदमी पार्टी के नेता केजरीवाल सहित कुछ
अन्य नेताओं ने इसका समर्थन कर दिया। यहीं से विवाद शुरू हो गया और नीतीश प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़कर
वहां से निकल गए। हालांकि बाद में राहुल गाँधी ने नीतीश से फोन पर बात की बताते है। मगर सियासी
चर्चाओं में नीतीश की नाराजगी को लेकर बहुत सी बातें सुनी जाने लगी। नीतीश कुमार ने कभी इच्छा
जाहिर नहीं की लेकिन जेडीयू के नेता लगातार यह कह रहे हैं कि नीतीश से बेहतर विकल्प नहीं हो सकता
है। नीतीश अपने चौंका देने वाले फैसले के लिए जाने जाते है। इसीबीच नीतीश ने 29 दिसंबर को जनता दल
[ यू ] की बड़ी बैठक बुलाई है जिसे लेकर अफवाहों का बाजार गर्म हो उठा है। सूत्रों की मानें तो बैठक के बाद
राज्य में सियासी भूचाल आ सकता है। बताते है नीतीश की पार्टी के नेता इस बात पर भी खपा है की नीतीश
को गठबंधन का संयोजक नहीं बनाया। जबकि नीतीश शुरू से ही विपक्षी एकता की पिछली तीन बैठकों की
धुरी बने हुए थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नीतीश कुमार जितना इंडी अलायंस से खफा हैं, उससे कम
उनकी नाराजगी आरजेडी को लेकर नहीं है। आरजेडी के साथ रहते लोकसभा सीटों के बंटवारे में मुश्किलें आ
रही हैं। आरजेडी विधायकों की संख्या के आधार पर जेडीयू से अधिक सीटें सीटें चाहता है तो नीतीश सिटिंग
सीटों का हवाला देकर कम से कम 16 सीटों की मांग कर रहे हैं। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर यह
कहते नहीं थकते है कि नीतीश कुमार फिर पलटी मारेंगे। वे दावा करते हैं कि हरिवंश जैसे कुछ नेताओं को
नीतीश ने अपने एजेंट के तौर पर पहले से ही भाजपा के साथ लगा रखा है। अगर नीतीश एनडीए में लौटते हैं
तो सीटों को लेकर कोई समस्या शायद ही सामने आए। यह भी कहा जा रहा है नीतीश कुमार ललन सिंह को
जेडीयू के अध्यक्ष पद से हटा कर खुद पार्टी की कमान संभाल सकते है।
नीतीश के बारे में यह कहा जा रहा है की वे कभी किसी के सगे नहीं रहे। जॉर्ज फर्नांडिस के साथ समता पार्टी
बनाने के बाद उन्होंने जॉर्ज को किनारे करते देर नहीं की। शरद यादव को अपनी पार्टी की कमान सौंपकर
उन्हें हटा दिया। कालांतर में यही हाल प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह के साथ किया। प्रशांत को पार्टी का
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना कर छिटक दिया। राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे आरसीपी सिंह को भी पार्टी से निकालकर
धरती पर ला दिया। बताया जा रहा है जेडी यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष लल्लन सिंह की लालू यादव से नज़दीकी
होने से वे एकाएक ही असहज हो गए है और अब लल्लन को हटाकर खुद या अपने किसी विश्वासपात्र को
पार्टी की कमान सौंप सकते है।