सियासी प्रयोगों की जननी बिहार में फिर नीतीश का खेला
प्रयोगों की धरती बिहार एक बार फिर सब की निगाहों पर है। नीतीश ने दो बार भाजपा और दो
बार लालू से हाथ मिलाकर प्रयोग की आंधी को थमने नहीं दिया। अब तीसरी बार भाजपा से
हाथ मिलाकर प्रयोग को आगे बढ़ा रहे है। लोकनायक जयप्रकाश और जननायक कर्पूरी ठाकुर की
जन्म और कर्म भूमि से अवसरवादी और सुविधावादी सियासत के विस्फोट की चर्चाएं मीडिया में
गूंज रही है। बिहार में सियासी घमासान के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एक बार फिर
एनडीए में शामिल होने की खबरे मीडिया में चटकारे लेकर सुनी जा रही है। नीतीश अगस्त
2022 में भाजपा से नाता तोड़ने के बाद अपने पूर्व चिर प्रतिद्वंद्वी लालू प्रसाद की पार्टी राजद
के नेतृत्व वाले महागठबंधन में शामिल हो गए थे। उस वक्त नीतीश ने भाजपा पर जद(यू) में
विभाजन की कोशिश करने का आरोप लगाया था। अब कहा जा रहा है नीतीश का फिर लालू से
मोह भंग हो गया है और वे आजकल में आरजेडी से अलग होकर भाजपा के साथ मिलकर
सरकार बनाएंगे।
लालू और नीतीश दोनों समाजवादी आंदोलन की उपज है। लालू और नीतीश दोनों ही लोहिया,
जेपी और कर्पूरी के अनुयायी होने का दावा करते है। दोनों ही नेता कई बार एक हुए और फिर
अलग हो गये। बिहार में समाजवादी आंदोलन जब भी परवान चढ़ा तभी नेताओं की महत्त्वाकांक्षा
ने आंदोलन को जबरदस्त क्षति पहुंचआई। समाजवादी एक बार फिर अपने मायावी प्रदर्शन को
दोहरा रहे है। आइये, आज हम बिहार के समाजवादी आंदोलन की चर्चा करते है। बिहार में भारत
छोड़ो आंदोलन में समाजवादी नेताओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। जय प्रकाश नारायण, रामनंदन
मिश्रा, बसावन सिंह, सूरज नारायण सिंह, कर्पूरी ठाकुर रामानंद तिवाड़ी बीपी मंडल के जीवनकाल में
समाजवादी आंदोलन कई चरणों से होकर गुजरा। मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडिस और शरद यादव जैसे अन्य
राज्यों के समाजवादी नेताओं को भी बिहार से राजनीतिक जीवनदान मिला था। लोहिया की मृत्यु के बाद
कर्पूरी ठाकुर सबसे बड़े समाजवादी नेता के रूप में उभरे और उन्होंने बिहार की पिछड़ी जातियों के युवाओं
को संगठित किया। लोहिया के बाद रामानंद तिवारी और भोलाप्रसाद सिंह के साथ वे बिहार की समाजवादी
राजनीति के प्रमुख केंद्र बन गए। 1952 से आठवें दशक तक मृत्यु पर्यन्त कर्पूरी ठाकुर दो बार मुख्यमंत्री
और एक बार उपमुख्यमंत्री रहे। इसी दौरान रामविलास पासवान ,लालू यादव और नीतीश कुमार सरीखे
युवा कर्पूरी ठाकुर की अंगुली पकड़ कर युवा समाजवादी के रूप में उभरे। 1974 में जेपी आंदोलन के दौरान
छात्र नेता के रूप में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आठवें दशक में कर्पूरी ने चौधरी चरण सिंह के साथ
मिलकर लोकदल नेता के रूप में पिछड़ों की राजनीति शुरू की। रामविलास पासवान, लालू यादव और
नीतीश बाद में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व को चुनौती देने लगे और इसके साथ बिहार में यादव , कुर्मी और
दलितों की राजनीति शुरू होगई। इस तरह लालू यादव और नीतीश कुमार की राजनीति दरअसल उसी
प्रक्रिया को आगे ले गई जिसे कर्पूरी ठाकुर ने शुरू किया था। दोनों ने अपनी-अपनी राजनीतिक
आवश्यकताओं के अनुरूप, कर्पूरी ठाकुर की विरासत पर कब्जा जमाने की कोशिश की। बाद में कर्पूरी ठाकुर
के अनुयायियों समेत समाजवादी नेता अलग-अलग पार्टियों में बिखर गए। जनता पार्टी और जनता दल
का प्रयोग असफल होने के बाद नवें दशक में लालू , नीतीश और पासवान ने अलग होकर पिछड़ों और
दलितों की राजनीति शुरू करदी। लालू के बिहार पर दस साल तक एक छत्र राज के बाद नीतीश ने बीजेपी के
साथ मिलकर लालू को उखाड़ फेंका। इस बीच लालू चारा घोटाले में फंस गए। लोक सभा चुनाव में नीतीश
नरेंद्र मोदी के सांप्रदायिक एजेंडे को मुद्दा बनाकर बीजेपी से अलग हो गये। लोकसभा चुनाव में मोदी की
लोकप्रियता के आगे नीतीश और लालू परास्त हो गए। मगर 2015 का विधान सभा चुनाव उन्होंने लालू
और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बना कर लड़ा और बीजेपी को बिहार से खदेड़ने में सफल हुए। लालू के
दोनों बेटों के साथ मिलकर नीतीश ने सरकार बनाई। 20 महीने तक यह सरकार चली और साल 2017 में
नीतीश कुमार ने फिर से पलटी मारी और बीजेपी के खेमे में चले गए। .साल 2022 में नीतीश ने फिर पलटी
मारी और आरजेडी के साथ मिलकर महागठबंधन बना लिया। अब एक बार फिर नीतीश कुमार बीजेपी के
साथ आने के लिए पलटी मारने वाले हैं।
- बाल मुकुंद ओझा