हे प्रकृति! इतनी कठोर क्यों
हे प्रकृति ! इतनी कठोर क्यों हो गई
जो तबाही पर मजबूर हो गई
न जाने दोष किन लोगों का था
और सजा निर्दोषों ने पाई ।
हे प्रकृति ! तुम्हें ललकारा है
आधुनिकता के ठेकेदारों ने
पर्वत खोद डालें लालची लोगों ने
नदियों को पाटा स्वार्थी लोगों ने
जंगलों को काटा चंद लोगों ने
सजा भुगत रही है जनता सारी ।
हे प्रकृति ! कभी भूकंप ,
तो कभी सुनामी आई
तुफानों से भी जनता घबराई
बे मौसम हवा बरसात आई
धरा पर ओलों की चादर बिछाई
धरती पुत्रों पर घोर संकट लाई
खून पसीने से सिंची फसलें
तहस नहस कर मुस्कराई ।
हे प्रकृति ! निर्धनों का क्या होगा
हाथ से निवाला छीन गई
हलधर का सपना टूट गया
की जो मेहनत, सारी बेकार गई ।
किस्मत भी फिर से रूठ गई
कर्ज़ के सागर में जिंदगी डूब गई ।
हे प्रकृति ! पक्षियों ने कभी
तुम्हारा क्या बिगाड़ा था
बैठ डाल कलरव करते
चुगकर दाना ही खाया था
तेरे आगे किसी की न चल पाई
उन्हें मौत की नींद सुला गई ।
हे प्रकृति ! इतनी कठोर क्यों हो गई
जो तबाही पर मजबूर हो गई
न जाने दोष किन लोगों का था
और सजा निर्दोषों ने पाई ।
-हेमराज मीणा